कहानी- सभीता से निर्भया तक ...

कहानी- सभीता से निर्भया तक 5 (Story Series- Sabhita Se Nirbhaya Tak 5)

“देखो तो शैतान को. कैसे आंखों से शरारत टपक रही है.” दादी ने मुझे बांहों में समेट लिया और बात को आगे बढ़ाया, “उस ज़माने में हम लोग प्यार होने का समय ही नहीं देते थे. उसके बाद तेरे बाबा तेरे पापा का रिश्ता लेकर तेरे नाना के घर पहुंच गए. उन्हें एक पढ़ी-लिखी बहादुर बहू चाहिए थी.”
“धत तेरे की…” मेरी मायूसी एक बार फिर सबके चेहरे पर मुस्कान ले आई.

“और तेरी मां! उनकी बात सुनेगी? बड़ी मज़ेदार है!” मां ने दादी को पहले आंखों से मना किया, फिर मेरे चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान देखकर इजाज़त दे दी. “तब इनकी शादी नहीं हुई थी. दोनों एक ही विश्वविद्यालय में पढ़ते थे. एक दिन तेरी मम्मी आगे जा रही थी और पापा पीछे. मम्मी की पायल गिर गई, जो पापा ने देख ली और पुकार कर ये बात उन्हें बताई. उन दिनों अक्सर लड़के लड़कियों को प्रभावित करने के लिए ऐसा करते थे. बस, मम्मी ने आव देखा न ताव एक थप्पड़ जड़ दिया.”
“पापा को? फिर क्या हुआ?” मैं उछल कर खड़ी हो गई.
“फिर क्या? पापा पायल वहीं पटक कर चले गए. मम्मी ने पायल देखी, तो शर्मिंदा हुईं और माफ़ी मांगने घर आ गईं.
“उसके बाद आप दोनों में प्यार हो गया.” मैं मम्मी-पापा की ओर मुखातिब होकर ताली पीटकर बोली. इस पर सब ठहाका मारकर हंस पड़े.
“देखो तो शैतान को. कैसे आंखों से शरारत टपक रही है.” दादी ने मुझे बांहों में समेट लिया और बात को आगे बढ़ाया, “उस ज़माने में हम लोग प्यार होने का समय ही नहीं देते थे. उसके बाद तेरे बाबा तेरे पापा का रिश्ता लेकर तेरे नाना के घर पहुंच गए. उन्हें एक पढ़ी-लिखी बहादुर बहू चाहिए थी.”
“धत तेरे की…” मेरी मायूसी एक बार फिर सबके चेहरे पर मुस्कान ले आई. फिर दादी थोड़ा गंभीर होकर बोलीं, “लेकिन तेरी इस बहादुर मां की सारी बहादुरी शादी के बाद डर में बदल गई, जब इसे तेरे पिता का सहारा मिल गया.”
“वो कैसे?”
“देख, इसने ड्राइविंग सीखी, पर शुरू में ही एक दुर्घटना हो गई. उसके बाद न तेरे पिता ने कार को हाथ लगाने दिया, न ही इसने ज़रूरत समझी. मैं अक्सर कहती हूं कि पुरुषों से भी तो दुर्घटनाएं होती हैं, पर क्या वे ड्राइविंग छोड़ देते हैं? नहीं. क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं होता. आज अगर तेरी मां ने ड्राइविंग न छोड़ी होती, तो वो तुझे छोड़ने जा सकती थी.”
इसके बाद दादी मेरे पास सरक आईं, “किसी भी समस्या का समाधान भागकर नहीं जूझकर निकलता है. बेटा, तू ये सोचकर उसकी बातें उपेक्षित करेगी कि तू एक कमज़ोर लड़की है, तो दुखी रहेगी. ये सोचेगी कि ये उसकी दुष्प्रवृत्ति के ख़िलाफ तेरी अहिंसक लड़ाई है, तो तेरी ताक़त बढ़ती जाएगी.”
“मगर दादी, बात केवल उन उक्तियों की नहीं थी, जिन्हें उपेक्षित किया जा सकता था. बात उसकी हरकतों की भी थी, जिन्हें उपेक्षित नहीं किया जा सकता था.” इस बात का दादी के पास कोई जवाब नहीं था, इसलिए उन्होंने प्रश्न के जवाब में एक प्रश्न का ही ढक्कन खोल दिया था, “अगर बात पढ़ाई की होती तो?”
जवाब किसी के पास नहीं था. ख़ामोशी का जो कोलाहल उस दिन मेरे जीवन में शुरु हुआ, वो आज तक शांत नहीं हुआ…
अंतिम छुट्टी की रात मेरी आंखों में एक पल के लिए भी नींद नहीं आई.
अगले दिन सारे हफ़्ते मेरे मन के अखाड़े में डर और बहादुरी के बीच होनेवाला मल्लयुद्ध अपनी चरम-सीमा पर था. मैं अकादमी के लिए तैयार हो रही थी और दोनो पहलवान बारी-बारी से एक-दूसरे को गिरा कर ऊपर चढ़ जाते. कानों में दर्शकों के शोर की तरह दो आवाज़ें गूंज रहीं थीं, ‘बहुत मंहगा पड़ेगा’ और ‘जूझना ही अंतिम समाधान है’…
इसी उहापोह में बाहर निकली, तो आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. पापा की सरकारी गाड़ी ड्राइवर समेत खड़ी थी. पापा भी थे.

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“आज मैंने आधी छुट्टी ले ली है. साथ में चलने के लिए. कल से ड्राइवर तुझे छोड़ने और लेने जाएगा.”
दादी ने देखा, तो उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. जिस बेटे ने उसूलों को अपने जीवन की सबसे बड़ी पूंजी माना हो, उसका ये रूपांतर? सकठ के व्रत वाले दिन जब रिवाजों की चट्टान टूटी थी, तो दादी ने मेरे छगड़ा काटने पर सबसे पहले ताली बजाकर माहौल हल्का किया था. जब डांस को बुरा समझने के दुराग्रह की चट्टान बही थी, तो उन्होंने हंसकर पापा के बालों में उंगली फेरकर ‘वेरी गुड’ कहा था, पर आज जब उन्होंने उसूलों की चट्टान ढहते देखी, तो ऐसी नज़रों से पापा को देखा, जिसमें नकार भी थी और धिक्कार भी. पापा ने नज़रे झुका लीं और वो झुकी हुई नज़रें मेरे दिल को बेधती हुई निकल गईं.
“इस लोकतंत्र का सपना लेकर तो तुम्हारे पिता शहीद नहीं हुए थे. क्या फ़र्क रह जाएगा तुममें और उनमें, जिनकी तुम कटु समीक्षा करते हो.” उन्होंने समझाना चाहा था.
“सपना तो उन्होंने ऐसे लोकतंत्र का भी नहीं देखा था, जहां हमारी बेटियां इतनी असुरक्षित होंगी और आम नागरिक इतना असहाय.” पापा नज़रें झुकाए-झुकाए ही बोल कर गाड़ी में बैठ गए थे.
लेकिन ये क्रम भी अधिक दिन चल न सका. न तो वो लड़का अपनी हरकतों से बाज़ आया, न ही आए दिन होनेवाली वारदातों के क़िस्से कम हुए. हुआ था तो बस इतना कि मेरा ड्राइवर और गाड़ी के बिना कहीं निकलना बंद कर दिया गया. ऐसे में एक दिन पापा के डेप्यूटेशन पर दो साल के लिए किसी दूसरे शहर जाने का ऑर्डर आ गया. उनकी सरकारी सुविधाएं इस शहर के लिए बंद हो गईं और मेरे अकादमी जाने की समस्या फिर मुंह बाकर खड़ी हो गई.
और फिर शुरू हुआ सिलसिला मुझे अकादमी छोड़ देने के लिए मानसिक रूप से तैयार करने का जिसके लिए मम्मी-पापा को अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ी. छह महीने साइकिल से अकादमी जाते-लौटते समय मैंने जिस डर को रोज़ झेला था, उसका सामना करने की आदत छूट चुकी थी. फिर पापा ने राह ऐसी दिखाई थी कि लालच आ गया था. देश के ऐसे बड़े विश्वविद्यालयों के प्रास्पेक्टस मेरे सामने रखे, जिनमें नृत्य एक स्नातकोत्तर के विषय की तरह पढ़ाया जाता है.
“वहां हॉस्टल की भी सुविधा है, जहां लड़कियां पूरी तरह सुरक्षित हैं, अगर वो ख़ुद ग़लत न हों. और मेरी बेस्ट फ्रेंड तो दुनिया की सबसे अच्छी लड़की है.” कहकर मम्मी ने बांहें फैलाईं और मै ‘ठीक है’ की मुद्रा में उनके सीने से जा लगी. हालांकि मेरे सीने में एक दर्दीला तूफ़ान उमड़ पड़ा. ऐसा लगा किसी परी के पंख ये कहकर उतरवा लिए गए हों कि आसमान पर बहुत शिकारियों की नज़र है, इसलिए उड़ना बंद! मेरे भाग्य की इस विडंबना ने मुझे कभी चैन से बैठने नहीं दिया कि मुझे पता भी नहीं चला कि मैं प्रतिवाद कर सकती थी या नहीं.
मैं जी जान से उन विद्यालयों की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने में लग गई. नियति की ये अनोखी विडंबना थी कि मैं अपने मन में उमड़ते तूफान की शिकायत भी किसी से नहीं कर सकती थी, क्योंकि उन परीक्षाओं की मुझसे ज्यादा तैयारी तो मम्मी कर रही थीं. वो रीज़निंग समझा रही होतीं और मेरा मन समाज की समस्याओं के रीज़न्स ढूंढ़ रहा होता. मम्मी गणित पढ़ा रही होती और मेरा दिमाग़ किन्हीं और ही सवालों को हल करने में लगा होता. ये दुनिया ऐसी क्यों है? क्यों है हम इतने असुरक्षित? क्या वाकई इसे बदलना हमारे बस में नहीं है? फिर बारहवीं की बोर्ड परीक्षाएं भी तो थीं.
पापा अवि अंकल से परिवार का ध्यान रखने के लिए कह गए थे, इसलिए वे हर तीसरे-चौथे दिन हमारा हालचाल लेने और ‘कोई काम तो नहीं?’ पूछने आते, तो मैं अपने अनुत्तरित प्रश्न लेकर बैठ जाती. उन्होंने शायद मुझे कुंठित होने से बचाने के लिए मेरे प्रश्नों को विस्तृत दायरा देना शुरू कर दिया. उन वंचितो पर बनाई गई डाॅक्यूमेंट्री की जानकारी भी वो मेरे साथ बांटने लगे, जिनके जीवन में सुख और उल्लास का एक पल भी नहीं होता. जाते समय बड़े प्यार से सिर पर हाथ रख कर कहना नहीं भूलते कि बेटा, तुम बड़ी ख़ुशक़िस्मत हो, जो तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे साथ हैं, जीवन के सुख साधन हैं… लेकिन वे नहीं जानते थे कि यही मेरे मन की सबसे बड़ी टीस थी कि मेरे पास ‘पंख’ थे पर मैं ‘उड़’ नहीं सकती थी. किसी से, यहां तक कि ख़ुद से भी ये नहीं कह सकती थी कि मैं पिंजरे में हूं. एक विशाल वृक्ष बन सकने की क्षमता रखनेवाला पौधा बोन्साई क्यों बनता जा रहा है? किसी से नहीं पूछा जा सकता था.

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अवि अंकल की बातें अच्छी लगने लगीं, तो मन की पीड़ा ने कलम के रास्ते बाहर निकालने का मार्ग ढूंढ़ लिया. मेरे लेख उन्होंने देखे तो चकित रह गए. वे उन्हें पत्र-पत्रिकाओं में भेजने लगे. उनसे मिली पहचान मन के घाव भरने लगी. नृत्य के ज़रिए अभिव्यक्ति की धारा रुकी, तो कलम के ज़रिए बहने की दूसरी राह बनाने का प्रयास आरंभ हो गया.
मैं नृत्य के विद्यालयों की प्रवेश परीक्षाओं में उत्तीर्ण नहीं हुई. मेरा परीक्षाफल आ गया था और घर की ख़ामोशी में एक अनुत्तरित प्रश्न मुखर हो गया था.
‘अब आगे?’…

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…

bhaavana prakaash
भावना प्रकाश

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