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कहानी- सिर्फ़ एहसास है ये…5 (Story Series- Sirf Ehsaas Hai Ye… 5)

और प्यार? पापा की परिभाषा में आकर्षण! नहीं, आकर्षण तो जाड़ों की धूप की तरह दो पल में ढल जाता है और ये जज़्बा तो आकाश के विस्तार की तरह मेरी पूरी उम्र में समाया है. मम्मी की नज़र में उम्र की वासना! पर वासना तो शरीर की संगिनी होती है और ये जज़्बा तो मेरे मन में ख़ुशबू बनकर समाया है. अपने सारे दुख-दर्द मैंने केवल और केवल उनके साथ ही तो बांटे हैं. सारी समस्याएं उन्होंने ही तो सुलझाईं हैं, आज भी उनका खत आता है, तो दिल का कोना-कोना महक उठता है. खत लिखती हूं, तो ख़ुद को उड़ेल देती हूं…

सबने अपने-अपने तरीक़े से मुझे इस ‘समस्या’ से निकालने की कोशिश की. बहुत कुछ ख़रीदा गया, बहुत जगह घुमाया गया. कॉमेडी फिल्में तक दिखाई गईं. फिर एक समवयस्क साथी भी दिया गया, जिसे मैंने ख़ामोशी से स्वीकार लिया. मेरे लिए कुछ लाने से पहले मुझसे पूछना न उनकी आदत थी और न लाई चीज़ में मीन-मेख निकालना मेरी फ़ितरत
तो क्या हुआ, जो बीस साल के लंबे विवाहित जीवन में हमने एक-दूसरे के साथ कोई दुख-दर्द नहीं बांटा. तो क्या हुआ जो मेरी छोटी-छोटी ख़्वाहिशें उनके लिए हमेशा पागलपन रहीं और मेरी जीवन-दृष्टि बेवकूफ़ी. संदीप ने मुझे सब कुछ दिया है. बंगला, गाड़ी, नौकर, दो बच्चे, इन सबके रख-रखाव का ख़र्च, परिवार, समाज में एक बड़े अफ़सर की पत्नी होने की प्रतिष्ठा. अब मेरे लिए ही सुख की परिभाषा में ये चीज़ें शामिल न हों, जिनके पीछे दुनिया दीवानी है तो वो क्या करें? क्या किसी औरत को इससे अधिक कुछ और भीbचाहिए होता है? संदीप की ही नहीं, मम्मी-पापा, परिवार, रिश्तेदार पूरे समाज की नज़र में- नहीं. और मेरी नज़र में? आह! मगर मैंने कभी वो मांगा भी तो नहीं. दूसरे के नज़रिए को ख़ुद से तवज़्ज़ो देना उनकी आदत नहीं थी और लड़कर हासिल करना मेरी फ़ितरत में कब था.
और प्यार? पापा की परिभाषा में आकर्षण! नहीं, आकर्षण तो जाड़ों की धूप की तरह दो पल में ढल जाता है और ये जज़्बा तो आकाश के विस्तार की तरह मेरी पूरी उम्र में समाया है. मम्मी की नज़र में उम्र की वासना! पर वासना तो शरीर की संगिनी होती है और ये जज़्बा तो मेरे मन में ख़ुशबू बनकर समाया है. अपने सारे दुख-दर्द मैंने केवल और केवल उनके साथ ही तो बांटे हैं. सारी समस्याएं उन्होंने ही तो सुलझाईं हैं, आज भी उनका खत आता है, तो दिल का कोना-कोना महक उठता है. खत लिखती हूं, तो ख़ुद को उड़ेल देती हूं…
टैक्सी झटके से रुकी तो मैं अतीत से वापस आई. अरे,
ये तो वही जगह है, जहां मैं दोस्त के साथ घंटों बैठी रहती थी. सामने बर्फ़ का पहाड़, पीछे देवदारों का जंगल, दोनों ओर चीड़ के पेड़ों की कैनोपी बनाती मेरी मनपसंद सड़क. और दूर वो चट्टान जिस पर मैं घर बनाने को कहा करती थी. ‘अरे उस पर एक घर बन भी गया’ बिल्कुल वैसा ही जैसा मैं दोस्त से कहा करती थी. उस घर ने मुझे सम्मोहित-सा कर दिया. मेरी नज़र सुध-बुध खोए आगे बढ़ती सब देखती जा रही थी और दोस्त के साथ बतियाई पंक्तियां दिल से निकलकर हवा में तैरती जा रही थीं. ‘मेरे सपनो का घर? बांस की चारदीवारी और गेट, अंदर लाल बजरी से बना पेड़ों से ढका टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता’ हां, उन्हीं का घर हो सकता है ये. हवाओं में उनके प्यार की खुशबू है. मैंने धड़कते दिल से दरवाज़ा खोल दिया. घर का पूरा नक्शा, जैसे किसी ने मेरे ख़्वाबों से निकालकर मूर्त रूप दे दिया हो, पर दोस्त कहां हैं? धड़कते दिल से पूरा घर ढूढ़ लिया, दोस्त कहीं नहीं दिखे. दोस्त यहीं कहीं है! आज बीस साल बाद उनसे मिलूंगी. कैसे दिखते होंगे वो? पांच साल पहले लिखा था कि अब कौसानी में ही रहने लगा हूं. काम छोड़ दिया है, क्योंकि अब शरीर साथ नहीं देता. शरीर में एक सिहरन दौड़ गई. कैसे देखूंगी उन्हें?
प्रेम पगी उमंगों के साथ एक कमरे में पहुंची, तो गुलाबों की ख़ुशबू तन, मन से होती हुई आत्मा में उतरती गई. सामने खिड़की खुली थी, जिसके पार पहले गुलाब फिर सेब का बगीचा लाल सेबों के गुच्छों से लदा खड़ा था. कमरे में एक सिंगिल बेड और एक ख़ूब सारी दराज़ों वाली टेबल. उसकी दराज़ों पर नंबर पड़े थे, जो आठ से शुरू होते थे. मैंने एक-एक करके दराज़े खोलनी शुरू कीं. हर दराज़ में मेरा एक साल था, बड़े करीने से सहेजा हुआ. एक फाइल में खत, एक फाइल में फोटो, एक डिब्बे में डीवीडी… उनके प्यार की वो सभी गवाहियां, जो उनके कैमरे से निकलकर दराज़ों में कैद होती रहीं. मेरे प्रति उनके प्यार के ढेर सारे रंग. वो एहसास, जिन्हें उन्होंने कभी धूप दिखाने के लिए भी मन की अंध कंदराओं से बाहर नहीं निकाला. और ये डायरियां भी? उत्सुकतावश खोलीं, तो प्यार की आकाशगंगाएं खुलती गईं… मेरी आंखों से होते हुए दिल की गहराइयों में उतरती गईं- “वादी प्रकृति का वो रूप है, जो मां भी होती है, बेटी भी और प्रेयसी भी. बस उसकी एक ही ख़्वाहिश पूरी नहीं कर पाया हूं. कुछ वर्ष बाद दुनिया में आया होता तो शायद! काश! ऐसी कोई तकनीक होती कि मैं अपना दिल, अपना उसे देखने का नज़रिया उसके जीवनसाथी में उड़ेल सकता…

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जाने कितने युगों तक मेरी उंगलियां इन क़ैदियों के दर्द सहलाती रही. मेरी पलकें उन कुम्हलाई बेलों को सींचती रहीं और सोचती रहीं अब लडूंगी दोस्त से. मेरे जीवन का सबसे ख़ूबसूरत सच छिपाने के लिए मैं उन्हें कभी माफ़ नहीं करूंगी. तभी टेबल के ऊपर हाथ फेरते समय हाथ जैसे उनके हाथ से टकराया. हां स्पंदन तो वही था. आंसू पोछे, तो देखा एक फाइल थी, जो टेबल के ऊपर आज़ाद पड़ी थी. उसे खोला तो…
“अपना सब कुछ तुम्हारे नाम किया है उसने. ऐज़ नॉमिनी तुम्हें कुछ काग़ज़ी..” पापा ने कमरे में प्रवेश करते हुए कहा.
मैं कुछ देर स्तब्ध-सी पापा की आंखों में देखती रही. मेरे कानों ने जो सुना, दिमाग़ ने उसका अर्थ ग्रहण करने में समय लगाया. लगा एक बार फिर उन्होंने मुझे खींचकर ख़ुद से अलग कर एक थप्पड़ जड़ दिया है… मेरी आंखों में एक बार फिर वेदना का समंदर उतर आया. कुछ देर उसी दिन की तरह सदमेग्रस्त-सी खड़ी रही, फिर जैसे चेतना खो दी हो, बेतहाशा रो पड़ी. रोते-रोते ही बैठ गई और घुटनों में सिर देकर रोती ही गई…
संदीप और बच्चे बहुत ख़ुश थे. ‘छुट्टियां बिताने के लिए मुफ्त का फार्म-हाउस’ ‘सेब के बागानों से होने वाली अनुमानित आय’… वे चहकते जा रहे थे और मैं, मैं यादों के शोर में घिरी शिखर पर पहुंचकर खड़ी हो गई, जहां से पूरा घर दिखता था और दोनों बांहें फैला लीं. हवा को नहीं, हवाओं की ख़ुशबू में बसे उनके उस बेहिसाब प्यार को महसूस करने के लिए जिसके सहारे वो एकाकी जीकर भी मेरे जीवन में ख़ुशियों के रंग भरते रहे.

bhaavana prakaash

भावना प्रकाश

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