कहानी- स्वप्न 3 (Story Series- S...

कहानी- स्वप्न 3 (Story Series- Swapan 3) 

‘ओह, तो ये इस कॉलेज की प्रिंसिपल बन गई हैं! पर ये अपने ही बेटे का साक्षात्कार लेगीं? फिर तो यह साक्षात्कार मात्र दिखावा है. निश्चित रूप से प्रणव को ही चुना जाना है. एक ही तो पद है.’ मन हुआ उसी वक़्त कमरे से बाहर निकल जाऊं. तभी मैडम के पास बैठे दूसरे साक्षात्कारकर्ता (एच. आर.) ने प्रश्न पूछना आरंभ कर दिया. उसके औपचारिक सवालों का जवाब देते-देते मेरा खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आया था. 

 

 

 

… “पर बेटी तुम्हारी पढ़ाई? वहां न जाने कितना कोर्स हुआ हो? फिर मम्मी रहेंगी न तुम्हारे पास?” बिछुड़ने की कल्पना मात्र से मुझे समझाते हुए पापा ख़ुद ही भावुक हो उठे थे. 

मैं सब कर लूंगी.” मैंने उन्हें आश्वस्त किया था. जाने की कल्पना मात्र से मेरे चेहरे पर मुस्कान खिल उठी थी. यह पापा के साथ रहने की ख़ुशी थी या मृदुला मैडम से आज़ादी मिलने का एहसास कयास लगाना मुश्किल था. मैं तो टीसी लेने भी नहीं गई थी. मम्मी को भेज दिया था. मम्मी लौटकर बता रही थीं कि मृदुला मैडम से उनकी मुलाक़ात हुई थीं. मेरे स्कूल छोड़ जाने से वे आश्चर्यचकित और दुखी थीं. उन्होंने यहां तक कहा कि उत्तरा तो मेरे पास भी रह सकती थी. वह तो मेरी बेटी जैसी है. 

‘हुंह फिर वही दोगलापन’ सोचते हुए मैंने हिकारत से गर्दन झटक दी थी. मेरे मनोभावों से सर्वथा अनजान मम्मी पैकिंग में व्यस्त हो गई थीं. कई वर्षों तक फिर किसी से कोई संपर्क नहीं हो पाया था. पापा गुज़र चुके थे. एक दिन पूर्वी ही कहीं टकरा गई थी. उसी ने बताया कि मृदुला मैडम किसी कॉलेज में व्याख्याता हो गई थीं. 

 

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मेरा नाम पुकारा गया, तो मेरी तंद्रा लौटी. अपने काग़ज़ संभालते मैं तुरंत अंदर की ओर लपकी. अंदर घुसते-घुसते भी मैंने देख लिया कि प्रणव मेरी ही ओर आ रहा था. ‘उफ़, एकदम सही वक़्त पर जान छूटी.’ अंदर पहुंचते-पहुंचते मैं काफ़ी संभल गई थी. चेहरे पर जबरन मुस्कान ओढ़कर मैं ख़ुद को साक्षात्कारकर्ता के अभिवादन के लिए तैयार करने लगी. लेकिन पहली साक्षात्कारकर्ता से नज़र मिलते ही मेरी जबरन ओढ़ी मुस्कान छूमंतर हो गई. सामने मृदुला मैडम विराजमान थीं. मुझे देखकर एक पल को तो वे भी चौंकी,  पर फिर तुरंत उन्होंने गंभीरता का आवरण ओढ़ लिया. उनके आगे प्रिंसिपल की पट्टिका रखी थी. 

‘ओह, तो ये इस कॉलेज की प्रिंसिपल बन गई हैं! पर ये अपने ही बेटे का साक्षात्कार लेगीं? फिर तो यह साक्षात्कार मात्र दिखावा है. निश्चित रूप से प्रणव को ही चुना जाना है. एक ही तो पद है.’ मन हुआ उसी वक़्त कमरे से बाहर निकल जाऊं. तभी मैडम के पास बैठे दूसरे साक्षात्कारकर्ता (एच. आर.) ने प्रश्न पूछना आरंभ कर दिया. उसके औपचारिक सवालों का जवाब देते-देते मेरा खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आया था. मैंने निश्चय कर लिया कि चयन हो या न हो मैं इस कक्ष से अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाकर ही बाहर निकलूंगी. वह शख़्स मुझे बहुत भला लगा था. और मैं चाहने लगी थी कि यह शख़्स मुझसे इस हद तक प्रभावित हो जाए कि मुंह से भले ही प्रतिरोध न करे, पर मन ही मन अपनी प्रिंसिपल को उनके पक्षपातपूर्ण रवैये के लिए धिक्कारे अवश्य. इसके बाद आरंभ हुआ तकनीकी राउंड. 

मृदुला मैडम ने एक के बाद एक प्रश्नों की झड़ी लगा दी. सारे ही प्रश्न इतने गूढ़ और जटिल थे कि यदि मैंने साक्षात्कार की मात्र सतही तैयारी की होती, तो पहले दो-तीन प्रश्नों में ही घुटने टेक चुकी होती. लेकिन चूंकि मैंने हर परीक्षा बहुत गहन और व्यापक अध्ययन से पास की थी, इसलिए उन सवालों का सिलसिलेवार जवाब देने में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई. मैडम प्रश्न में से प्रश्न पूछती गईं. हर जवाब के साथ मेरा आत्मविश्वास बढ़ता ही जा रहा था. एक युद्ध-सा छिड़ गया था हम दोनों के बीच. एच. आर. अवाक हमें ताक रहा था. मैं शायद इसलिए भी इतनी बेखौफ़ हो गई थी, क्योंकि मुझे पता था कि मेरा चयन नहीं होगा. एक इंसान अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन तब देता है, जब उसके दिमाग़ में हार-जीत का भय न हो. मैं ताड़ गई थी कि मेरी उम्मीदवारी को नाकारा साबित करने के लिए ही मुझ पर इतने जटिल प्रश्नों की बौछार हो रही है. और मेरे जवाब से मैडम मन ही मन बुरी तरह झुंझला रही होंगी. लेकिन आज मैं मैदान छोड़कर नहीं भागूंगी. आख़िरकार मैडम का आवेश कम होने लगा. अंतिम उत्तर पाने के साथ ही उन्होंने चेहरे पर संतोषपूर्ण मुस्कुराहट बिखेर दी थी. मैं उनके सटीक अभिनय से हैरान थी, पर बिना हैरानी का कोई भाव प्रदर्शित किए मैं अपने काग़ज़ समेटकर दनदनाती बाहर निकल आई थी. शायद मैं औपचारिक अभिवादन करना भी भूल गई थी या शायद मैंने अब ऐसे पाखंड की ज़रूरत नहीं समझी.  

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संगीता माथुर 

 

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