कहानी- अनबॉक्स ज़िंदगी 3 (St...

कहानी- अनबॉक्स ज़िंदगी 3 (Story Series: Unbox Zindagi 3)

“उसकी एक नायिका वासु बचपन में इन पेड़ों आसमान के गहरे प्रतिबिंबवाले पानी में पैर डालने में इतना रोती और डूबने के डर से पार नहीं कर पाती, तो उसका साथी नमन उसे बार-बार पार करके ख़ूब छेड़ता- ‘डरपोक! डरपोक!’ वह डरकर आंखें भींचे उसकी शर्ट कसकर भींच लेती और रोते-रोते पार करती, तो वह ख़ूब हंसता. मुझे भी बचपन में इकट्ठे पानी में आसमान, उल्टे पेड़ों की गहराई देखकर बेहद डर लगता था, वैसे ही रोता था मैं भी.” वह हंसने लगा था.

“अच्छा!” वे भी हंसने लगीं.

“बहुत ख़ूब, अब तो नहीं लगता?” उन्होंने मकरंद का हाथ पकड़कर पानी भरे बड़े गड्ढे को कूदकर सड़क पार कर कर ली थी.

“अरे रे, संभलकर मैडम.”

“यूं जंप मारने का अपना ही मज़ा है.” दोनों मुस्कुरा उठे.

वे पेपर के बनाए रंगबिरंगे प्लेन व बोट्स को और फूलोंवाले रूमाल को एक पॉलिथिन में भरकर खड़ी हो गईं.

“अब मुझे जाना होगा बच्चे इंतज़ार में होंगे.” उन्होंने पार्क के बगल से होते हुए रास्ते पर दूर बनी झुग्गियों की ओर इशारा किया.

“आपके बच्चे मैडम, वहां?” उसे आश्‍चर्य हुआ.

“हूं. देखना है, तो आओ मेरे साथ.” वे पार्क से निकलकर दूसरी ओर बगलवाली सड़क पर आ गए थे. ऊंचे झूमते किनारे के दरख़्तों के बगल गड्ढों के पानी में आसमां, बादलों, पेड़ों का प्रतिबिंब प्रकृति के सौंदर्य को और विस्तार रूप दे रहा था.

“उसकी एक नायिका वासु बचपन में इन पेड़ों आसमान के गहरे प्रतिबिंबवाले पानी में पैर डालने में इतना रोती और डूबने के डर से पार नहीं कर पाती, तो उसका साथी नमन उसे बार-बार पार करके ख़ूब छेड़ता- ‘डरपोक! डरपोक!’ वह डरकर आंखें भींचे उसकी शर्ट कसकर भींच लेती और रोते-रोते पार करती, तो वह ख़ूब हंसता. मुझे भी बचपन में इकट्ठे पानी में आसमान, उल्टे पेड़ों की गहराई देखकर बेहद डर लगता था, वैसे ही रोता था मैं भी.” वह हंसने लगा था.

“अच्छा!” वे भी हंसने लगीं.

“बहुत ख़ूब, अब तो नहीं लगता?” उन्होंने मकरंद का हाथ पकड़कर पानी भरे बड़े गड्ढे को कूदकर सड़क पार कर कर ली थी.

“अरे रे, संभलकर मैडम.”

“यूं जंप मारने का अपना ही मज़ा है.” दोनों मुस्कुरा उठे.

कुछ दूर गड्ढे मिलकर नाले की शक्ल में कलकल के साथ बह रहे थे. साथ ही छोटे बच्चों का शोर सुनाई देने लगा. उन्होंने महिला को दूर से ही देख लिया. भागकर पास आ गए. महिला ख़ुश होकर बच्चों को नाव-जहाज बांटने लगीं. फिर एक-एक फूल उनकी नाव पर रख, उन सभी के मुंह में एक-एक टॉफी डालने लगीं.

“आंटी, हमें दो हमें…” बच्चे ख़ुश होकर चीख रहे थे और वे भी ‘हां… हां…’ कहते हुए ख़ुश हो रही थीं. प्लास्टिक, ढक्कन, डंडी की जगह अब सब पानी में बहती अपनी फूलवाली नावों के पीछे भाग रहे थे. कुछ की नाव खुल गई, वो काग़ज़ ला उनसे बनाना सीखने लगे. कुछ कल के सिखाए अक्षरों को भीगे बालू के टीले पर लिखकर उसे दिखाने ले आए. वे एक पत्थर पर बैठ सब चेक कर रही थीं.

मनोयोग से ख़ुश होकर उन्हें कुछ सिखा रही थीं. कुछ बच्चों ने मकरंद को भी पकड़ लिया. वह उनकी खुल गई नावों को याद करके सही करने लगा. पहले कितना बनाया करता था. आज कितने सालों बाद उसने काग़ज़ का जहाज बनाया भी और चलाया भी. कितना रोमांचित हो उठा था. बच्चे उससे कुछ सीखकर, लेकर ख़ुशी से भागे, तो उसे भी उतनी ही ख़ुशी महसूस हुई. वह भीगी रेत पर डंडी से उन्हें अक्षर, सूरज, फूल बनाकर सिखाने लगा. ऐसा कर उसे बहुत अच्छा अनुभव हो रहा था. उसकी घड़ी पर नज़र गई, साढ़े आठ.

“अब चलूंगा मैडम, व़क्त का पता ही नहीं चला. आपसे बहुत कुछ सीखने को मिला. शुक्रिया! मिल लूं उससे, वरना निकल न जाए कहीं.”

“हां, ज़रूर क्यों नहीं… क्या पता बात बन ही जाए. ऑल द बेस्ट!” कहकर वे मुस्कुराईं. मकरंद ‘थैंक्यू… नमस्ते… बाय’ कहकर तेज़ क़दमों से उस पते की ओर बढ़ गया. अब सही टाइम है. वह पहुंच गया था, कर्नल एस. के. दत्ता. उसने धड़कते दिल से डोरबेल बजाई थी. नौकर ने दरवाज़ा खोला था,

“किससे मिलना है आपको?”

“पारिजात दत्ताजी से. यहीं रहती है न?” वह व्हीलचेयर पर बैठे स़फेद बालोंवाले टीवी देखने में मग्न सज्जन को देखते हुए बोला.

“जी, पर मैडम तो अभी हैं नहीं, बाहर गई हैं.”

‘इतनी सुबह.’ वह हैरान था. उसने मन में सोचा.

“अब आनेवाली होंगी, आप चाहें तो इंतज़ार कर सकते हैं.”

“अच्छा!” वह बैठने ही वाला था कि नज़र दीवार पर लगी आदमकद तस्वीर पर पड़ी, तो वह चौंक गया.

“इसमें तो वही महिला इन सज्जन के साथ मुस्कुरा रही हैं और दूसरे फ्रेम में लॉन्ग स्कर्ट और फूलोंवाली हैट में एक ख़ूबसूरत लड़की, जिसकी शक्ल उन्हीं महिला से थोड़ी मिल रही थी.

इसका मतलब पारिजात उन महिला की ही बेटी है. मैं उनसे क्या-क्या बकवास कर गया. उसे अपने पर शर्म और हंसी भी आ रही थी. दिल में आया कि चला ही जाए बगैर पारिजात से मिले ही. क्या सोचती होंगी वे. उन्होंने बताया भी नहीं. वह संकोच और उधेड़बुन में बैठ गया था. नौकर पानी ले आया था. वह एक सांस में गटक गया. ग्लास ट्रे में वापस रखते हुए उसने नौकर से धीरे-से पूछा, “ये हैट में पारिजातजी ही हैं न?”

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“हां भइया, मैडमजी ही हैं. एक में अकेले एक में साहब के साथ.” वह धीरे से फुसफुसाया.

“मैडम मतलब?… ये मैडम की बेटी नहीं?”

“जी, बेटी है ही नहीं, तो उसकी फोटो कहां से आएगी? ये तो मैडम की जवानी की फोटो है.”

मकरंद को जैसे करंट लग गया हो. उसने दांतों के बीच ज़ुबान दबा ली. बहुत बड़ी ग़लती कर बैठा. वह झटके से उठ खड़ा हुआ. पारिजात दत्ता के आने से पहले वह जल्द से जल्द भाग जाना चाहता था. प्यार का इज़हार तो अंजाने ही हो गया ग़लती से, अब क्या करूं? ऑटोग्राफ नहीं ले सका इसका अफ़सोस रहेगा, पर उनसे खुलकर जीवन जीना तो अच्छी तरह सीख लिया. अपनी ज़िंदगी तो अनजाने ही अनबॉक्स हो गई. वह संतोष और ख़ुशी से मुस्कुरा उठा. फिर उमंगभरे तेज़ क़दमों से बाहर हो लिया. नौकर हैरानी से पूछ रहा था. “क्या हुआ भइया. मैडम से मिलना नहीं?”

Dr. Neeraja Shrivastav

डॉ. नीरजा श्रीवास्तव ‘नीरू’

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