कहानी- वट पूजा 1 (Story Series- Vat Puja 1)

लेकिन शंभवी अब भी अमोल की तरफ़ न देखकर सामनेवाले बरगद के पेड़ को ही देखे जा रही थी. वह जानती थी कि इस समय अमोल के चेहरे पर कुछ-कुछ याचना के भाव होंगे और विश्‍वास से दमकते जिस चेहरे ने आज तक उसे संबल दिया है, ‘चाहने’ की कमज़ोरी से ऊपर उठाकर उसे ‘देने’ के लायक बनाया है, आज उसी चेहरे पर वह ‘चाहने’ की कमज़ोरी नहीं देख पाएगी.

“हम इसीलिए तो दुखी नहीं रहते हैं, बल्कि टूटते जाते हैं, क्योंकि अपने बहुत ख़ास रिश्तों से हमें जो अपेक्षा होती है, वो पूरी नहीं हो पाती. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि हमारे बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग है, हम एक-दूसरे को अच्छी तरह से समझते हैं, एक-दूसरे के सुख-दुख बांटते हैं, हमें एक-दूसरे पर भरोसा है, यही काफ़ी है. फिर अपने रिश्तों में बेकार उलझनें बढ़ाकर क्या फ़ायदा?’’

हर रिश्ते से कोई न कोई अपेक्षा होती है अमोल. रिश्ते का दूसरा नाम ही अपेक्षा है. जहां रिश्ता होता है, वहां न चाहते हुए भी अपेक्षा अपने आप ही रिश्तों को घेर कर खड़ी हो जाती है और इतनी तेज़ी से बढ़ती जाती है कि रिश्ते का दम ही घुट जाता है और हमारा भी. और एक दिन ख़ुद को बचाने के लिए हमें रिश्ता तोड़ देना पड़ता है. मैं नहीं चाहती कि हमारे बीच भी ऐसा कुछ हो.” शंभवी ने अमोल की ओर न देखकर सामने लगे बरगद (वट) के विशालकाय पेड़ को देखते हुए कहा.

“मैं वादा करता हूं, अपने रिश्ते में तुमसे कभी कोई अपेक्षा नहीं रखूंगा. बस, एक सांत्वना चाहता हूं कि तुम…” आगे अमोल के शब्द कहीं खो गए, पर उसकी आंखें बराबर शंभवी के चेहरे पर टिकी थीं.

लेकिन शंभवी अब भी अमोल की तरफ़ न देखकर सामनेवाले बरगद के पेड़ को ही देखे जा रही थी. वह जानती थी कि इस समय अमोल के चेहरे पर कुछ-कुछ याचना के भाव होंगे और विश्‍वास से दमकते जिस चेहरे ने आज तक उसे संबल दिया है, ‘चाहने’ की कमज़ोरी से ऊपर उठाकर उसे ‘देने’ के लायक बनाया है, आज उसी चेहरे पर वह ‘चाहने’ की कमज़ोरी नहीं देख पाएगी.

“हम इसीलिए तो दुखी नहीं रहते हैं, बल्कि टूटते जाते हैं, क्योंकि अपने बहुत ख़ास रिश्तों से हमें जो अपेक्षा होती है, वो पूरी नहीं हो पाती. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि हमारे बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग है, हम एक-दूसरे को अच्छी तरह से समझते हैं, एक-दूसरे के सुख-दुख बांटते हैं, हमें एक-दूसरे पर भरोसा है, यही काफ़ी है. फिर अपने रिश्तों में बेकार उलझनें बढ़ाकर क्या फ़ायदा? हम उस स्टेज पर नहीं हैं, जहां अपने रिश्ते को कोई अंजाम दे पाएंगे. हम दोनों ही अपनी-अपनी धुरियों से बंधे हुए हैं, वहां से उखड़कर नई धुरी पर पांव जमा पाना मुश्किल होगा.” बरगद के पे़ड़ से नज़रें हटाकर अमोल के चेहरे पर उन्हें जमाते हुए शंभवी ने अपनी बात कही.

“मैं धुरियों से उखड़ने को नहीं कह रहा हूं, मगर कुछ देर के लिए हम एक-दूसरे का हाथ तो थाम ही सकते हैं ना. अपनी-अपनी धुरियों पर जमे रहने के लिए शायद कुछ सहारा, कुछ बल ही मिल जाएगा.”

शंभवी के चेहरे का तनाव कुछ ढीला हुआ.

“सहारा और बल तो आज भी है ही. हम दोनों एक-दूसरे के साथ से ख़ुश हैं, क्योंकि हमारे बीच कोई रिश्ता नहीं है. जिस दिन हम दोनों के बीच की भावनाओं को कोई नाम मिल जाएगा, हम एक रिश्ते में बंध जाएंगे और शुरू हो जाएगा एक-दूसरे से अपेक्षाओं का सिलसिला, जो आख़िर में घूमते हुए हमें इसी मोड़ पर छोड़ जाएगा, जहां आज हम अपने-अपने वर्तमान रिश्तों के साथ खड़े हैं. बेहतर होगा कि एक-दूसरे के प्रति जो हमारे मन में आज सम्मान है, उसे कोई भी नाम न दें.”

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अमोल के चेहरे पर पलभर पहले जो कमज़ोरी के ‘कुछ चाहने’ के भाव आए थे, वे दूर हो गए और उसका चेहरा फिर विश्‍वास से चमकने लगा.

“तुम मुझे कितनी अच्छी तरह समझती हो शंभवी. मेरी पलभर की कमज़ोरी को भी तुमने कितने सहज तरी़के से दूर कर दिया.” अमोल ने शंभवी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा.

उस दिन अमोल के जाने के बाद भी देर तक शंभवी बगीचे की बेंच पर बैठकर बरगद के उस विशाल व म़ज़बूत पेड़ को देखती रही. बड़े घेरे में फैले हुए इस पेड़ की जड़ें चारों ओर से ज़मीन में उतरकर मुख्य तने को सहारा दे रही थीं. और अचानक शंभवी ने सोचा कि काश, रिश्ते भी बरगद के पेड़ की तरह होते- विशाल, मज़बूत, जिनकी जड़ें इतनी गहरी हों कि बड़ी से बड़ी आंधी भी उन्हें हिला न पाए और जो इतनी प्राणवायु पैदा करें कि उनमें बंधनेवालों का दम कभी भी न घुटे, बल्कि रिश्तों से पैदा हुई ऑक्सीजन उनमें हमेशा ऊर्जा और ताज़गी का संचार करती रहे. उन्हें छांव देती रहे, ताकि वे विपरीत परिस्थितियों में भी कुम्हलाएं नहीं.

परसों वट पूर्णिमा है, लेकिन शंभवी में कोई उत्साह नहीं है. वह ये सब ढोंग क्यों करे? किसके लिए? कोई तीज-त्योहार नहीं मनाती. जब रिश्ते में कुछ बचा ही नहीं है तो फिर ये सब… और न चाहते हुए भी शंभवी के मुख से एक गहरी निश्‍वास निकल गई.

उसके और अमर के रिश्ते की तो जड़ ही नहीं है. पता नहीं कब अपनी ज़मीन से उखड़कर उनका रिश्ता, उनके जीवन में अवांछित-सा औंधा पड़ा हुआ है, जिसे वह चाहकर भी न तो पुनः ज़मीन में रोप पा रही है और न ही उखाड़कर फेंक पा रही है. पता नहीं ज़मीन के किस अनछुए कोने में बिना जड़ और पत्तियों का उनका रिश्ता एक ठूंठ की तरह पड़ा हुआ है.

Abhilasha

अभिलाषा

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