कहानी- वट पूजा 3 (Story Series- Vat Puja 3)

लेकिन आज अमोल के मन में शंभवी के लिए पलभर की कमज़ोरी पैदा हो गई थी. कल को यदि अमर के साथ अपने रिश्ते के टूटने पर उसके भी मन में एक कमज़ोरी पैदा हो जाए तो? और यदि किसी दिन अमोल और शंभवी के कमज़ोरी के क्षण एक ही हो जाएं तो? अपने-अपने रिश्तों में दोनों जिस तरह घुटते जा रहे हैं, हो सकता है किसी दिन खुलकर सांस लेने के लिए एक-दूसरे के कंधों पर अपना सिर रख लें. 

आज तो वह अडिग थी, इसलिए अमोल की कमज़ोरी को उसने हावी नहीं होने दिया. लेकिन यदि वह किसी दिन अडिग न रह पाई तो…? अमर की उपेक्षा उसे अंदर तक तोड़ दे और वह ख़ुद भी अमोल के आगे बिखर जाए…

अपने घर को तिनका-तिनका जोड़कर बनते देखने का, अपने शौक़ के अनुसार सजाने, घर से जुड़ने का उसका ख़्वाब चूर-चूर हो गया. तभी तो अमर का आलीशान मकान उसे अपना घर कभी नहीं लगा.

अमर के व्यवहार ने शंभवी के रिश्ते में ही नहीं, मन में भी बहुत बड़ा खालीपन, एक शून्य पैदा कर दिया था और इसी शून्य में तैरते हुए एक दिन अचानक ही वह अमोल से जा टकराई.

अमोल ने उसके व्यक्तित्व को, उसकी प्रतिभा को पहचाना.

“अपने भावों को अपने अंदर घुटने मत दो. उन्हें शब्दों के रूप में बहने दो पन्नों पर, बाहर आने दो…”

शंभवी ने लिखा और फिर लिखती ही गई. अमोल ने हर मोड़ पर दोस्त बनकर उसका साथ दिया. शंभवी के भावों को, उसके अंदर ही घुटते जाने से बचाता रहा. अपने अंदर की हताशा-निराशा से बाहर आने पर शंभवी के लिए अमर के व्यवहार को सहन करना थोड़ा आसान हो गया. शब्दों के साथ-साथ अमोल की दोस्ती ने उसके अंदर के खालीपन को काफ़ी हद तक भर दिया था. लेकिन अपने अंदर के खालीपन को भरने के लिए अमोल के साथ कोई रिश्ता बनाकर वह अनन्या के जीवन में कोई खालीपन पैदा नहीं करना चाहती.

बरगद के पे़ड़ पर धूप उतरने लगी थी. लेकिन उसके नीचे अब भी कितनी ठंडी छांव थी. काश, उसके जीवन का सबसे ख़ास रिश्ता भी उसके जीवन को ऐसी ही ठंडी छांव, ऐसा सुकून दे पाता और एक गहरी सांस भरकर शंभवी घर लौट आई. पर पता नहीं क्यों शंभवी का मन बरगद के पेड़ की छांव तले ही छूट गया था. तपती धूप में झुलसते उसके मन और जीवन को भी तो किसी ऐसे ही बरगद के पेड़ की शीतल स्निग्ध छांव की ज़रूरत है.

आज पलभर को अमोल के कमज़ोर पड़े मन ने शंभवी को अंदर तक आहत कर दिया. वह जानती थी कि अनन्या के दमघोंटू प्यार से त्रस्त होकर अमोल कुछ पलों के लिए उसके सामने भावनाओं में बह गया था. मन की गहराइयों से तो वह भी ऐसा कुछ नहीं चाहता है.

लेकिन आज अमोल के मन में शंभवी के लिए पलभर की कमज़ोरी पैदा हो गई थी. कल को यदि अमर के साथ अपने रिश्ते के टूटने पर उसके भी मन में एक कमज़ोरी पैदा हो जाए तो? और यदि किसी दिन अमोल और शंभवी के कमज़ोरी के क्षण एक ही हो जाएं तो? अपने-अपने रिश्तों में दोनों जिस तरह घुटते जा रहे हैं, हो सकता है किसी दिन खुलकर सांस लेने के लिए एक-दूसरे के कंधों पर अपना सिर रख लें.

आज तो वह अडिग थी, इसलिए अमोल की कमज़ोरी को उसने हावी नहीं होने दिया. लेकिन यदि वह किसी दिन अडिग न रह पाई तो…? अमर की उपेक्षा उसे अंदर तक तोड़ दे और वह ख़ुद भी अमोल के आगे बिखर जाए…

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हम बाहर से तभी बिखरते हैं, जब अंदर से टूटे हुए हों. ऊपर से अपने आपको संपूर्ण रखने के लिए हमें अंदर से ख़ुद को मज़बूती से जोड़े रखना होगा, अपनी-अपनी धुरियों के साथ. इन धुरियों से ज़रा-सा भी पांव बाहर निकला तो ताउम्र अंधेरे निर्वात में तिनके की तरह उड़ते रहेंगे.

स्टडी रूम में खड़ी शंभवी ने परदा एक ओर सरकाकर खिड़की खोल दी. ताज़ी हवा का एक झोंका आकर कमरे में पसर गया. इससे पहले कि अनन्या का प्रगाढ़ प्यार अमोल में कमज़ोरी के इन क्षणों का इज़ाफ़ा करता जाए और शंभवी भी फिर उसे संभाल न पाए, अमोल को सांस लेने और जीने के लिए एक स्पेस का मिलना बहुत ज़रूरी है. जब वह खुलकर सांस लेगा, तभी तो अनन्या के साथ अपने रिश्ते को भी ज़िंदा रख पाएगा.

पागल है अनन्या! नहीं समझती कि इस तरह ज़बर्दस्ती अपने साथ बांधे रखकर किसी को भला अपना बनाया जा सकता है क्या? नहीं, इस तरह किसी भी रिश्ते को सफल नहीं बनाया जा सकता. रिश्ते और प्यार की सफलता तो तब है, जब सामनेवाले को पूरी तरह से मुक्त कर देने के बाद भी वह लौटकर आप ही के पास आ जाए.

पर इस तरह से इतना बंधन में जकड़ने से तो वह अमोल के लौट आने के सारे रास्ते ही बंद कर देगी. अमोल अनन्या के पास लौट जाए, इसके लिए अनन्या को बंधन ढीले करने ही होंगे. अमोल को स्पेस देना ही होगा.

शंभवी ने तय किया कल ही एडीटर से कहेगी कि अमोल को महीनेभर के लिए किसी आर्टिकल या स्टोरी पर काम करने के लिए शहर से दूर भेज दे, ऑफ़िशियल टीम के साथ.

 

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