कहानी- वो रहस्यमयी कान्हा 3...

कहानी- वो रहस्यमयी कान्हा 3 (Story Series- Woh Rahasyamayi Kanha 3)

उस दिन मुझे प्रेम का सही अर्थ समझ आया था. मैंने तो उस साहिल को पाने की ख़्वाहिश की थी, जो मेरा कभी था ही नहीं. कभी उसके मन की बात नहीं जानी. अरे, वो तो प्रिया की अमानत था, जिसे मैं अपना समझने की भूल कर बैठी थी. उस दिन मेरा असफल प्रेम असफल होकर भी सफल हो गया था.

पत्र पढ़कर मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई. मन-मस्तिष्क शून्य हो गए. ये सब पढ़कर मैं मां के आगे नतमस्तक थी. आंखों से अविरल अश्रु धारा बह रही थी. मां ने भी कभी किसी को प्रेम किया था… बिना किसी शिकायत के, बिना किसी शिकवे के और बिना कुछ पाने की इच्छा रखें. एकदम निर्मल, निस्वार्थ, निश्छल. मां ने उस कान्हा की ख़ुशी को सर्वोपरि रख अपने प्रेम को त्याग की भावना से उसे सदा अमर कर दिया. इसलिए उन्होंने आज तक इस पत्र और इत्र को सदा
सहेजकर रखा. यही सच्चे प्रेम की परिभाषा है, जो इतने वर्षों पश्चात भी उस इत्र की महक एकदम ताज़ा थी.
मां के पत्र के एक-एक अल्फ़ाज़ उनकी आवाज़ बन मेरे कानों में गूंज कर मुझे मेरे अतीत में ले जा रह थे. कॉलेज में मेरा पहला दिन था और प्रथम वर्ष के छात्रों की अंतिम वर्ष के छात्र जम कर रैगिंग कर रहे थे. डरी-डरी-सी मैं वहां से छुप कर निकलना चाहती थी, पर आख़िर उन्होंने मुझे पकड़ लिया. वे सभी छात्रों को अलग-अलग टास्क दे रहे थे. किसी को भागने का तो किसी को नाचने-गाने का… और मुझे मिला था सामने खड़े लड़के को ‘आई लव यू‘ बोलने का. मेरे तो जैसे प्राण ही निकल गए थे. ख़ैर, जैसे-तैसे मैंने टास्क तो पूरा कर दिया, किंतु शर्म और डर के कारण मैं कई दिन कॉलेज नहीं गई. मां ने मुझे हिम्मत और लड़ने की शक्ति दी. हिम्मत करके जब मैं कॉलेज गई, तो वही लड़का कॉरिडोर में दोस्तों के साथ खड़ा था. उसने मुझसे बात करनी चाही, पर मैं अपनी आंखें झुका कर आगे चली गई. दिन बीतने लगे. वो मुझसे जितनी बात करने की कोशिश करता और मैं उससे उतना ही बचती. आख़िर एक दिन उसने मुझसे माफ़ी मांग कर दोस्ती का हाथ बढ़ाया और मैंने भी सब भूलकर,
उसे माफ़ कर उसे दोस्त बना लिया. उस दिन मुझे उसका नाम पता चला- साहिल.
दिन अब पंख लगा कर उड़ने लगे थे. हम बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे. वो हरदम एक सच्चे दोस्त की तरह मेरा साथ देता और मेरी ढ़ाल बनता. वो मेरा इतना ध्यान रखता था. मुझे बहुत अच्छा लगता. मेरी दोस्ती धीरे-धीरे कब प्यार में परिवर्तित हो गई पता ही नहीं चला. कॉलेज के फेयरवेल वाले दिन उसने मेरी सबसे प्रिय सखी प्रिया को प्रपोज़ कर दिया. मुझे ग़ुस्से में देख वो बोला की, “श्रुति, मेरी बात सुनो. मैं प्रिया से बहुत प्यार करता हूं. तुम मेरी एक बहुत अच्छी दोस्त हो. मैंने तुम्हें कभी प्यार नहीं किया. मुझे ग़लत मत समझो श्रुति…” वो बोले जा रहा था और मेरे सोचने-समझने की शक्ति क्षीण हो गई थी. आंखों में आंसुओं के कारण अंधेरा छा रहा था. बिना कुछ जाने, बिना कुछ समझे मैंने साहिल को खरी-खोटी सुना दी और एक दोस्त की तरह वो सब सुनता रहा. मुझसे साहिल की ये बेवफ़ाई बर्दाश्त नहीं हुई, क्योंकि मैंने तो उसे सच्चे दिल से प्रेम किया था. और अपने असफल प्रेम में मैंने आत्महत्या जैसा कायरतापूर्ण और घिनोना कदम तक उठा लिया था. हॉस्पिटल में जब होश आया, तो मां मेरे माथे को प्यार से सहला रही थीं, पिताजी, भैया और साहिल मुस्कुराते हुए मुझे देख रहे थे. साहिल ने मां को सब कुछ बता दिया था. मां मुझे प्यार से जीवन और प्रेम की अहमियत और अर्थ समझा रही थी.
तब उन्होंने मुझसे हू-ब-हू वही शब्द बोले, जो पत्र में उनके कान्हा ने उनको लिखे थे. उस दिन मुझे प्रेम का सही अर्थ समझ आया था. मैंने तो उस साहिल को पाने की ख़्वाहिश की थी, जो मेरा कभी था ही नहीं. कभी उसके मन की बात नहीं जानी. अरे, वो तो प्रिया की अमानत था, जिसे मैं अपना समझने की भूल कर बैठी थी. उस दिन मेरा असफल प्रेम असफल होकर भी सफल हो गया था.

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तभी भाभी की आवाज़ ने मुझे पुनः वर्तमान में खींच लिया. मां की पवित्र प्रेम कलंकित न हो, इसलिए मैंने चुपचाप उनके पत्र को गमले की मिट्टी के अंदर अर्पित कर दिया, पर वो इत्र, वो इत्र- एक सच्चे प्रेम का स्वरूप मैंने अपने पास रख लिया. अचानक मुझे वो सुबह तेहरवींवाले रहस्यमयी सज्जन याद आ गए, जो सुबह मां की तस्वीर को नम आंखों से अपलक निहार रहे थे. मुझे समझते देर न लगी कि वो रहस्यमयी सज्जन कोई और नहीं, अपितु मां के कान्हा थे, जो मां को अंतिम नमन करने आए थे. तभी तो वे चुपचाप एक रहस्यमयी ढंग से आएं और बिना किसी से बात किए चले गए. मैं मां और उन रहस्यमयी कान्हा के समक्ष मन ही मन नतमस्तक हो गई, जिनका प्रेम मां की विदा के साथ सदा के लिए अमर हो गया था. और वो एक रहस्यमयी कान्हा की अपनी राधा को सच्ची श्रद्धांजली थी!

Kirti jain

कीर्ति जैन

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