कहानी- राह वही, सोच नई (Story- Raah Wahi, Soch Nayi)

“जानता हूं, मुझे इतना आशावादी नहीं होना चाहिए, लेकिन बेटा, जिन परिस्थितियों से मैं गुज़र रहा हूं, उसमें आशा के दामन को हर पल थामे रखना नितांत आवश्यक है. मैं अपने लिए इसमें भी ख़ुश होने का सबब ढूंढ़ लेता हूं. रमेशजी विधुर हैं, पर मैं कितना ख़ुशक़िस्मत हूं कि मेरी प्रभा मेरे साथ है. मैं उसे देख सकता हूं, छू सकता हूं, महसूस कर सकता हूं. सच कहूं पराग, तो अब प्रभा मुझे बच्ची-सी लगती है. बेहद निरीह और अबोध शिशु जैसे अपनी देखभाल के लिए पूरी तरह अपनी मां पर निर्भर होता है, वैसे ही प्रभा अपनी देखभाल हेतु पूरी तरह मुझ पर निर्भर है.”

Kahani

बीच राह में पड़े पत्थर को ठोकर मारते हुए पराग ने एक गहरी सांस ली… क्या अंतर है इसमें और मेरी स्थिति में? मैं भी इसकी तरह हर किसी की ठोकर खाने पर मजबूर हूं. उसकी आंखों के सम्मुख फिर अपने दफ़्तर के वाकए तैरने लगे, अभी वह पहले सीनियर की दी हुई फ़ाइल ही नहीं निबटा पाया था कि एक और सीनियर दो और फ़ाइलें उसके सामने पटक गया. लेकिन अब इतनी मुश्किल से तो एक नौकरी मिली है, उसमें भी मीनमेख निकालने लगा तो बस चल ली ज़िंदगी… सोचते हुए पराग ने इतनी देर से लुढ़काते कंकड़ को ज़ोर से ठोकर मारी, तो वह सामने के पोल से जा टकराया. टन्न की आवाज़ हुई, तो वहां खड़े बुज़ुर्ग सज्जन और कचरे की ट्रॉलीवाला आदमी एक पल को ठिठके, पर फिर उनकी बहस सप्तम सुर में आरंभ हो गई. बुज़ुर्ग महाशय उसे नियमित न आने के लिए डांट लगा रहे थे और कचरेवाला भी बराबर बहस किए जा रहा था. बुज़ुर्ग सज्जन को निहारने पर पराग के चेहरे पर यकायक पहचान के भाव उभरे तो वह पुलक उठा, “अरे, ये तो मनमोहन सर हैं.” उसके सबसे प्रिय सर और वह उनका सबसे प्रिय शिष्य. कितना आदर करता था वह उनका अपने स्कूल के दिनों में. वह तो अक्सर उन्हें याद करता रहता है कि काश वे मिल जाते, तो उसे कुछ सही राह सुझाते. पर यह… यह वह उनका कैसा विद्रूप रूप देख रहा है?
दोनों पक्षों की उग्र बहस बिना किसी निर्णायक मोड़ पर आए समाप्त हो गई थी, क्योंकि मनमोहन सर खाली कूड़ादान लिए अपने घर के गेट में दाख़िल हो गए थे. हालांकि उनके व्यक्तित्व की इस विरूपता को देखकर पराग के चेहरे पर एक पल को विद्रूपता के चिह्न उभर आए थे, पर फिर अपनी विचार श्रृंखला को झटका देते हुए वह तुरंत उनके पीछे लपका.
“सर सर…”
“कौन?” मोटे लेंस के चश्मे के पीछे से झांकती दो आंखों ने घूरते हुए सवाल किया, तो एकबारगी पराग सहम गया. फिर साहस बटोरकर बोला, “जी, मैं पराग!”
बूढ़ी आंखों में यकायक पहचान के कोई चिह्न नहीं उभरे. बाहर बरामदे में ही पड़ी कुर्सी की ओर इंगित करते हुए एक ठंडा स्वर उभरा, “बैठो, आता हूं.” लेकिन कुछ देर इंतज़ार के बाद भी जब अंदर से किसी के बाहर आने के संकेत नहीं मिले, तो पराग ने चलने में ही भलाई समझी. ऑफ़िस पहुंचने में देरी न हो जाए, इसलिए अब उसने सीधे बस स्टॉप का रास्ता पकड़ लिया.

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मनमोहन सर से आकस्मिक भेंट ने पराग की ज़िंदगी के प्रति निराशा में वृद्धि ही की थी. सर उसके लिए हमेशा से आदर्श रहे हैं. हताशा के हर पल में वह सबसे पहले उन्हें ही याद किया करता था और वे भी संकटमोचन की तरह उसे हर मुसीबत से उबार लेते थे. लेकिन सर के व्यक्तित्व के जिस पहलू से वह आज रू-ब-रू हुआ था, वह उसे अचंभित कर गया था. एक कचरेवाले से इस तरह झगड़ा, तू-तड़ाक, फिर इतने ठंडेपन से अपने प्रिय शिष्य का स्वागत. पराग तो अभी तक यह भी निश्‍चित नहीं कर पा रहा था कि सर ने उसे पहचाना भी था या नहीं. अरसे बाद वह उनसे मिला था. कहां खो गए उसके वे शांत, गंभीर और प्रबुद्ध मनमोहन सर?
कुछ अरसे बाद किसी काम से पराग का फिर उसी गली में आना हुआ. मकान ढूंढ़ते-ढूंढ़ते वह जिस घर तक आ पहुंचा, वह मनमोहन सर के बिल्कुल सामनेवाला घर था. पराग ने एक उचटती-सी दृष्टि सर के बरामदे और बगीचे में डाली और फिर अपने कामवाले घर में चला गया. बाहर निकलते वक़्त
उसे सामने ही गेट पर सर नज़र आ गए. पराग ने नज़रें चुराकर निकल जाना चाहा, लेकिन उन्होंने पकड़ लिया.
“अरे पराग, आओ इधर्रें अंदर आओ.”
न चाहते हुए भी पराग को उनके पीछे-पीछे घर में प्रविष्ट होना पड़ा.
“घर छोटा है, पर हम दो प्राणियों के लिए पर्याप्त है. मैं और मेरी पत्नी प्रभा.” बोलते हुए वे पराग को बैठक में बिठाकर ख़ुद अंदर की ओर मुड़ गए. “चाय चढ़ाकर आता हूं. उस दिन भी तुम ऐसे ही निकल गए थे.”
“जी… वो मैं…” पराग ने सफ़ाई प्रस्तुत करनी चाही.
“मुझे ही ज़्यादा देर लग गई थी. ख़ैर, इसीलिए आज आते ही चाय चढ़ा रहा हूं. और कैसे हो? क्या कर रहे हो आजकल?” रसोई कुछ इस तरह बनी हुई थी कि वहां से दोनों कमरों पर नज़र रखी जा सकती थी. मनमोहनजी पराग की बात भी सुनते जा रहे थे और दूसरे कमरे की ओर मुंह करके वार्तालाप भी करते जा रहे थे. “यही लड़का है प्रभा, जो उस दिन आया था और बाहर से ही चला गया था. हां, बहुत ही होनहार लड़का है. बेहद समझदार और ज़िम्मेदार.”
पराग ने अनुमान लगा लिया कि दूसरे कमरे में अवश्य ही उनकी पत्नी होंगी, लेकिन वह बाहर आकर चाय क्यों नहीं बना रहीं? शायद कुछ काम कर रही होंगी या तबियत ठीक नहीं होगी. ख़ैर, अपनी तारीफ़ सुनकर पराग का मन खिल उठा था. मन हुआ वह भी अपने प्रिय सर की तारीफ़ में कुछ कहे कि तभी अंदर के कमरे में फ़ोन बज उठा. सर गैस धीमी करके अंदर चले गए. फ़ोन पर वार्तालाप चल रही थी कि तभी दरवाज़े की घंटी बज उठी. पराग ने उठकर दरवाज़ा खोलना ही उचित समझा. बैग लिए हुए एक व्यक्ति धड़धड़ाते हुए अंदर घुसा और सीधे अंदर के कमरे में चला गया. पराग को उसका पीछा करते हुए अंदर तक जाना पड़ा.
अंदर का दृश्य चौंकाने वाला था. पलंग पर एक महिला गहरी नींद में सोई हुई थी. उसके बदन में ढेर सारी सुइयां और मशीनी उपकरण लगे हुए थे. आगंतुक ने चढ़ रही ड्रिप में एक इंजेक्शन चुभोया और लेटी हुई महिला की नब्ज़ टटोलने लगा. पराग अब तक समझ चुका था कि आगंतुक कोई कंपाउंडर है. इधर सर ने फ़ोन रखा और उधर आगंतुक चलने के लिए उद्यत हुआ.
पराग उधेड़बुन में था कि वह किस स्वर में सर के सम्मुख अपनी उलझन रखे. तभी सर पत्नी की ओर मुख़ातिब हो सामान्य स्वर में बोल उठे, “रमेशजी देख गए हैं तुम्हें. नब्ज़ ठीक बता रहे हैं. चाय अगली बार पीएंगे. आज ज़रा दो-तीन मरीज़ और संभालने हैं.” उन्होंने बातों के मध्य चाय का एक घूंट भरा. “हूं, अच्छी बन पड़ी है. क्यूं पराग, अच्छी है न चाय?” पराग ने सहमति में गर्दन हिला दी. “लो देखो, पराग को भी अच्छी लगी. इतनी बुरी नहीं बनाता मैं, जितनी तुम समझती हो.”
पराग के लिए अब इस पहेली को झेलना असह्य हो गया था. “सर, आंटी तो गहरी नींद में लग रही हैं. वे शायद आपकी बातें नहीं सुन रही हैं, फिर भी आप इनसे बातें कर रहे हैं… मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा.”
“ओह, मुझे तो ध्यान ही नहीं रहा कि तुम्हें कुछ मालूम नहीं है. दरअसल प्रभा दो साल पहले बाज़ार से फल लेकर लौट रही थी तो एक ट्रक ने टक्कर मार दी. बच तो गई, पर तब से कोमा में है. डॉक्टर कहते हैं सामान्य होने में कितना वक़्त लगेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता. पर किस पल क्या चमत्कार हो जाए, इस उम्मीद में मैं उससे बतियाता रहता हूं. मैं उसे हर आने-जानेवाले की, बदलते मौसम की, रसोई में क्या हो रहा है, यहां तक कि देश में क्या हो रहा है, सबकी ख़बर देता रहता हूं, क्योंकि जब वह सामान्य हो जाएगी, तब सब एक साथ बता पाना संभव नहीं होगा न?” उनकी आंखों में उम्मीद की जो लौ जल रही थ, उसे देखकर कोई भी उनसे यह पूछने का साहस नहीं कर सकता था कि क्या वे सचमुच एक दिन अच्छी हो जाएंगी?
“जानता हूं, मुझे इतना आशावादी नहीं होना चाहिए, लेकिन बेटा, जिन परिस्थितियों से मैं गुज़र रहा हूं, उसमें आशा के दामन को हर पल थामे रखना नितांत आवश्यक है. मैं अपने लिए इसमें भी ख़ुश होने का सबब ढूंढ़ लेता हूं. रमेशजी विधुर हैं, पर मैं कितना ख़ुशक़िस्मत हूं कि मेरी प्रभा मेरे साथ है. मैं उसे देख सकता हूं, छू सकता हूं, महसूस कर सकता हूं. सच कहूं पराग, तो अब प्रभा मुझे बच्ची-सी लगती है. बेहद निरीह और अबोध शिशु जैसे अपनी देखभाल के लिए पूरी तरह अपनी मां पर निर्भर होता है, वैसे ही प्रभा अपनी देखभाल हेतु पूरी तरह मुझ पर निर्भर है. ऐसा सोचकर मेरी ममता और भी बढ़ जाती है. ममता केवल नारियों की बपौती नहीं है पराग. यह कोमल और अद्भुत भाव हम पुरुषों में भी जाग सकता है, बशर्ते हम अपने पुरुषोचित अहंकार को आड़े न आने दें. मुझे गर्व है कि मुझमें ये कोमल भावनाएं जागीं.” मनमोहनजी प्यार से पत्नी के बालों में हाथ फिराने लगे, तो पराग का मन इस अद्भुत दृश्य को देखकर द्रवित हो उठा.
“आप तो सचमुच देवता हैं सर, आप महान हैं.”

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“नहीं, देवता से मेरी तुलना कर देवता को छोटा मत करो. मैं एक अदना-सा इंसान हूं और आम इंसान की तरह कभी-कभी महानता का यह चोला उतर जाता है, तब बहुत तुच्छ, स्वार्थी और खीझा हुआ इंसान सामने आता है. जैसा कि उस दिन तुमने मुझे देखा था. उस दिन रात से ही प्रभा की हालत ख़राब थी. बार-बार बिस्तर गीला कर रही थी. सारी रात मैं सो नहीं पाया था. सवेरे उठते ही मुझे चाय की तलब लग जाती है. चाय बनी ही थी कि कचरेवाला आ गया. पंद्रह दिन नागा करने के बाद उसे आया देख मेरा ग़ुस्सा भड़क उठा. उसकी बहस ने आग में घी का काम किया. तभी तुम आ गए. चाय ठंडी हो चुकी थी. सोचा तुम्हारे साथ दूसरी गरम चाय का आनंद लूंगा, पर तभी प्रभा का बिस्तर फिर गंदा हुआ देख दिमाग़ भन्ना गया. एक मन हुआ पहले चाय पी लूं, फिर बदल दूंगा, उसे कौन-सा फ़र्क़ पड़ रहा है? पर दूसरे ही पल मेरी आत्मा ने मुझे धिक्कारा कि क्या कोई मां इस तरह कभी अपने बच्चे को अनदेखा कर सकती है? मेरे पांव में फ्रेक्चर के वक़्त, मेरी बाइपास सर्जरी के वक़्त प्रभा ने कैसे मेरी सेवा में दिन-रात एक कर दिया था? मैं तुरंत सफ़ाई में जुट गया. जल्दी-जल्दी बाहर आया, तब तक तुम निकल चुके थे.”
मनमोहन सर से विदा लेकर लौटते वक़्त न केवल पराग के मन में उनके प्रति पनपा भ्रम दूर हो चुका था, बल्कि उसका ज़िंदगी को देखने का नज़रिया भी पूरी तरह बदल चुका था.
ऑफ़िस के उसके सीनियर्स इतने बुरे नहीं हैं. काम भरपूर लेते हैं, पर उसका रिवॉर्ड भी तो देते हैं. अभी पिछले सप्ताह कंपनी के डायरेक्टर ने कंपनी के होनहार कर्मचारियों की सूची मांगी, तो दोनों सीनियर्स ने एकमत होकर सबसे पहले उसका नाम लिया था और उसे वेतनवृद्धि मिली थी… मकान मालिक भी उसके हित में ही तो टोका-टोकी करते हैं. फिर उसका ख़्याल भी तो कितना रखते हैं. आंटी जब तब कुछ न कुछ खाने बुला लेती हैं. मनमोहन सर अप्रत्यक्ष में ही सही, पर एक बार फिर उसके लिए आदर्श बन गए थे. पराग को ज़िंदगी बेहद हसीन और ख़ूबसूरत नज़र आने लगी थी.

– अर्णिम

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