अब बेटे भी हो गए पराए (When People Abandon Their Old Parents)

दिल्ली के एक पॉश इलाके में रहनेवाली 79 वर्षीया कुंती देवी अपने एक रिश्तेदार से मिलने देहरादून गई थीं और वापस आने पर उन्हें पता चला कि उनके बेटों ने उनके घर पर कब्ज़ा कर लिया है. मरने से पहले उनके पति कुंती देवी के नाम पर वह घर कर गए थे और बाकी संपत्ति बेटों और उनमें बांट दी थी. बेटी ने अपना हिस्सा छोड़ दिया था, क्योंकि वह भाइयों से अपने संबंध ख़राब नहीं करना चाहती थी. उनकी बेटी उन्हें अपने साथ ले गई, क्योंकि भाइयों का भरोसा वह नहीं कर सकती थी. मां की देखभाल का ज़िम्मा उसने ले लिया है. कुंती देवी कहती हैं कि आजकल ज़माना बदल गया है. अब बेटी को चाहे विदा कर दो, पर वह फिर भी पराई नहीं होती है, जबकि बेटे तो मां-बाप को ऐसे नकार देते हैं, मानो बड़े होते ही उनसे सारे रिश्ते टूट गए हैं.

Abandon Old Parents

80 वर्षीया स्वर्णलता चंदा पिछले 7-8 सालों से एक ओल्ड एज होम में रह रही हैं. उनका बेटा ज़बर्दस्ती उन्हें वहां छोड़कर चला गया था, क्योंकि उसके फ्लैट में बूढ़ी मां को रखने की जगह नहीं थी. वह कहती हैं कि मुझे ऐसा लगता है कि मेरा बेटा मुझे इस बात की सज़ा दे रहा है कि मैंने उसे जन्म दिया. जब तक पति जीवित थे, बहुत अच्छी ज़िंदगी जी, लेकिन अब तो बेटे के लिए मैं केवल एक बोझ हूं. अपने बेटे को लायक बनाने में मैंने जितनी मेहनत की, उतनी बेटी के लिए की होती, तो कितना अच्छा होता. मेरी बेटी एक फोन करते ही दौड़ी चली आती है और जो हो सकता है करती है.

आज भी बेटे के जन्म पर ही मनाई जाती हैं ख़ुशियां

बेटे के जन्म लेते ही माता-पिता ही नहीं, परिवार के अन्य लोगों के चेहरे पर भी एक चमक आ जाती है. ख़ूब लाड़-प्यार के साथ उसके हर नख़रे को उठाते हुए उसे पाला जाता है. बेटा है, बस इसी ख़्याल से ख़ुश होते हुए माता-पिता उसके चेहरे पर हर समय मुस्कान देखने के लिए अपनी हर इच्छा को न्योछावर करने को तैयार रहते हैं. फिर वह बड़ा होता है, अपना करियर बनाता है, शादी करता है और अपने मां-बाप को छोड़कर चला जाता है. वजहें बहुत सारी होती हैं, लेकिन बेटे की नज़रों में वे सारी वजहें बहुत लॉजिकल होती हैं.

बेटियां तो पराई होती हैं, आज नहीं तो कल दूसरे घर चली जाएंगी, इसलिए जो कुछ है बेटा ही है, यह सोच युगों से कायम है. आश्‍चर्य तो इस बात का है कि इस ज़माने में जब लड़कियां शादी के बाद भी अपने मां-बाप की सेवा करती हैं और बेटों से ज़्यादा उनका ध्यान रखती हैं, फिर भी उन्हें पराया माना जाता है.

बनता जा रहा है ट्रेंड

– बेटों का मां-बाप को छोड़कर चले जाना एक ट्रेंड-सा बनता जा रहा है. एक व़क्त पर आकर बेटों को लगने लगता है कि अब अपने पैरेंट्स से उन्हें कोई फ़ायदा नहीं मिलनेवाला है. ऐसे में वे उन्हें उम्र के उस दौर में छोड़कर चले जाते हैं, जब पैरेंट्स को उनकी सबसे ज़्यादा आवश्यकता होती है.

– पढ़ाई, नौकरी या फिर शादी के बाद अपनी एक दुनिया बनाने की चाह और भौतिकवादी ज़िंदगी की दौड़ में ख़ुद को शामिल करने की हसरत उन्हें अपने ही पैरेंट्स से दूर कर रही है.

– एक वृद्ध दंपत्ति से जोधपुर जाते हुए ट्रेन में मुलाक़ात हुई थी, उनसे बातचीत करते हुए पता चला कि वे अकेले ही शिमला में रहते हैं. चूंकि उनकी बहू को उनके साथ रहना अच्छा नहीं लगता था, इसलिए बेटा उन्हें छोड़कर चला गया. रहता वह भी शिमला में ही है, पर कभी मिलने तक नहीं आता, क्योंकि उसकी बीवी को पसंद नहीं. उनका कहना था कि वे नहीं चाहते कि उनका बेटा उनकी वजह से अपनी गृहस्थी में परेशानी खड़ी करे, इसलिए उन्होंने यही सोच लिया कि उनकी एक नहीं दो बेटियां थीं और शादी के बाद वे दोनों विदा हो गईं.

– एकल परिवारों के बढ़ते चलन के कारण बुज़ुर्ग लोग अपने बेटों के लिए एक बोझ बनते जा रहे हैं.  बेटों को पैरेंट्स की सेवा करना तो नागवार गुज़रता ही है, साथ ही उन पर पैसा ख़र्च करना भी उन्हें पैसों की बर्बादी लगती है.

– बड़े शहरों में ऐसे अनगिनत मां-बाप या अकेली मां हैं, जो बेटे के घर से निकाले जाने के कारण या तो किसी ओल्ड एज होम में जीवन बिता रही हैं या फिर घर में रखने के लिए गिड़गिड़ाने को मजबूर हैं.

– बेटियां ज़रूर अपने पैरेंट्स की मदद करती हैं, लेकिन सभी के लिए ऐसा करना मुमकिन नहीं हो पाता, क्योंकि अगर बेटी शादीशुदा है, तो बेटी के ससुरालवाले इस पर आपत्ति उठाते हैं. फिर भी बीमारी में पैसों से उनकी मदद वे ज़रूर करती हैं, जबकि अधिकांश बेटों का मानना है कि उनके पैरेंट्स को उनके जीवन और लाइफस्टाइल में दख़ल देने का कोई हक़ नहीं है.

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Old Parents

रिश्तों में पसरी संवेदनहीनता

नई दिल्ली के फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टिट्यूट की सीनियर सायकोलॉजिस्ट डॉ. भावना बर्मी के अनुसार, “मूल्यों या संस्कारों से कहीं ज़्यादा संवेदनाओं में तटस्थता आने की वजह है भारत का बदला हुआ सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रोफेशनल सेटअप. भारत अब एक ग्लोबल कम्यूनिटी बन गया है और उसकी वजह से आपसी संबंधों में एक पृथकता आ गई है. बढ़ते अवसरों और बहुत कुछ जल्दी पा लेने की चाह में गांव, कस्बों और छोटे शहरों में रहनेवाले लोग शहरों या विदेशों का रास्ता पकड़ रहे हैं. बढ़ती भौतिकता के चलते उनकी सोच सेल्फ-सेंटर्ड हो गई है. पारिवारिक मूल्यों और अपनेपन के बदले लालच व पैसों की भूख ने रिश्तों को नकारने और ज़िम्मेदारियों से बचने को उकसाया है. पहले दिल से सोचा करते थे, पर अब दिमाग़ से सोचते हैं और इसलिए रिश्तों में परायापन पसर गया है.”

भाग रहे हैं ज़िम्मेदारी से

नौकरी की मजबूरियां, पत्नी की मम्मी-पापा से नहीं बनती या पैरेंट्स उनकी लाइफस्टाइल में फिट नहीं होते जैसे बहाने परोसते बेटे असल में अपनी ज़िम्मेदारी से भागना चाहते हैं. इसलिए प्रोफेशनल कमिटमेंट या अपनी गृहस्थी बचाने के नाम पर वे आसानी से अपने उत्तरदायित्वों से पल्ला झाड़ अपनी दुनिया में मस्त हो जाते हैं. वे बूढ़े माता-पिता, जो सारी ज़िंदगी अपने बेटे के सुखद भविष्य के लिए सब कुछ दांव पर लगा देते हैं, वही एक दिन उनके लिए आउटडेटेड हो जाते हैं और उनसे पीछा छुड़ाने के लिए बेटों के पास मजबूरियों की लंबी फेहरिस्त होती है और माता-पिता तब भी उनके पराएपन को जस्टीफाई कर नम आंखों से यही कहते हैं कि मेरा बेटा ऐसा नहीं है, वह तो उसकी मजबूरी थी, इसलिए हमें छोड़कर जाना पड़ा.

हमें स़िर्फ एक बार कुछ पल सोचना है कि बेटियां पराई होती नहीं, कर दी जाती हैं और बेटे तो स़िर्फ पराए होते हैं, क्योंकि उन्हें हमेशा उड़ने के लिए खुला आसमान मिलता है.

बुज़ुर्ग माता-पिता की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए व बेटों द्वारा उन्हें घर से बाहर निकाले जाने के बढ़ते मामलों को देखते हुए 2007 में मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स एंड सीनियर सिटिज़न एक्ट नाम से क़ानून पास किया गया था.

क़ानून के मुख्य प्रावधान

–    पीड़ित अभिभावक अपने गुज़ारे भत्ते के लिए न्यायाधिकरण में आवेदन कर सकते हैं.

–   न्यायाधिकरण में दी गई गुज़ारा भत्ता अर्जी पर नोटिस जारी होने के बाद 90 दिनों में मामले का निपटारा कर दिया जाएगा.

–    न्यायाधिकरण द्वारा मंज़ूर गुज़ारा भत्ता 10,000 रुपए प्रति माह होगा.

–    यदि बच्चे न्यायाधिकरण के आदेश का पालन नहीं करते, तो उन्हें एक माह की जेल या तब तक जेल हो सकती है, जब तक कि वे गुज़ारा भत्ते का भुगतान नहीं करते.

–    जिस पर वरिष्ठ नागरिक की देखरेख का ज़िम्मेदारी हो, वह अगर उसे बेसहारा छोड़ दे, तो उसे तीन माह की जेल और 5000 रुपए जुर्माने की सज़ा हो सकती है.

– सुमन बाजपेयी

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