World Mental Health Day: मानसिक बीमारी है अकेलापन, अनदेखा न करें (The Health Consequences of Loneliness)

दोस्त को देखकर रास्ता बदल देना, सामाजिक कार्यक्रमों में जाने से हिचकिचाना, भीड़ में ख़ुद को अकेला महसूस करना…क्या ये लक्षण सामान्य हैं? या किसी समस्या की ओर इशारा करते हैं? इस बारे में विस्तार से जानने के लिए हमने बात की सॉल्यूशन काउंसलिंग सेंटर की काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट डॉ. माधवी सेठ से. हममें से ज़्यादातर लोग कभी न कभी अकेलापन महसूस करते हैं. ऐसा होना एक सामान्य बात है, लेकिन अगर अक्सर ऐसा होने लगे यह ख़तरे की घंटी हो सकती है. आज वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे के अवसर पर हम आपको अकेलेपन की समस्या से निपटने के उपाय बता रहे हैं.

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शरीर और मन के बीच है गहरा कनेक्शन
शरीर और मन जुड़ा हुआ होता है. हम शरीर और मन को अलग नहीं कर सकते. दोनों साथ में चलनेवाली चीज़ें हैं. हमारी शारीरिक समस्याएं हमें मानसिक समस्याएं दे सकती हैं, ठीक उसी तरह मानसिक समस्याएं भी शारीरिक समस्याएं दे सकती हैं. शारीरिक समस्याओं के कारण होनेवाली मानसिक समस्याओं से निपटना आसान होता है, बशर्ते कि हमें समय रहते हमें यह समझ में आ जाए. समझ न आने पर स्वभाव में चिड़चिड़ापन, दर्द, बैचेनी इत्यादि समस्याएं हो सकती हैं. आम लोगों के लिए यह समझना बहुत मुश्क़िल होता है कि कोई समस्या मानसिक कारण से हो रहा है या शारीरिक कारण से. मानसिक समस्या को समझने में बहुत समय लगता है. लोग इस बात को स्वीकार नहीं करना चाहते कि उन्हें कोई प्रॉब्लम है. अकेलापन महसूस करना भी ऐसी ही मानसिक स्थिति है. लोग इसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जबकि यह एक वॉर्निंग वेल है.

समस्या की शुरुआत हो सकती है
अकेलापन एंज़ाइटी से आता है. एंज़ाइटी होने पर सबसे पहले व्यक्ति को अकेलापन महसूस करता है. ऐसे लोग दूसरों को अवॉइड करने लगते हैं. क्योंकि वे दूसरे के सवाल-जवाब से बचना चाहते हैं. इसे विथड्रावल या अवॉइडेंस सिम्टम कहते हैं. ऐसे व्यक्ति लोगों के बीच जाना ही नहीं चाहते. न ही किसी से मिलना पसंद करते हैं. जाहिर है ख़ुद को समाज से काट लेने पर उन्हें अकेलापन महसूस होता है. यह एक शुरुआत है. अगर आपको भी भीड़ में भी अकेला महसूस हो तो यह समझ जाना चाहिए कि यह मानसिक समस्या का संकेत है. तो बेहतर होगा कि आप अलर्ट हो जाएं. समस्या से लड़ने का यह पहला स्टेप है.

वजह जानना है ज़रूरी
अकेलेपन की वजह जाननी बहुत ज़रूरी है. इसे सेल्फ इवैल्यूशन कहते हैं. कहने का अर्थ है कि आप यह जानने की कोशिश कीजिए कि आपको ऐसा क्यों हो रहा है? आप किसी से क्यों नहीं मिलना चाहते? लोगों को देखकर आप रास्ता क्यों बदल देते हैं? ऐसी क्या वजह है कि आपको लोगों से मिलने का मन नहीं करता? आपको लोग क्यों नहीं पसंद आते? ऐसी क्या वजह है कि जो लोग आपको पहले अच्छे लगते थे, अब वे पसंद नहीं आते. आपके लिए यह जानना बहुत ज़रूरी है कि बदलाव आपमें आया है कि लोगों में, क्योंकि लोग तो वही हैं. कुछ आपमें है तो अलग हो रहा है. कुछ लोग इस समस्या से बाहर आने के लिए, सेल्फ हेल्फ बुक्स और वीडियोज़ का सहारा लेते हैं. उन्हें लगता है कि एक-दो बुक्स पढ़ने या वीडियो देखने से इस समस्या से निकला जा सकता है, उनकी यह सोच ही ग़लत है. बुक या वीडियो देखने से काम नहीं बनने वाला. आपको किसी व्यक्ति के मदद की ज़रूरत है.

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किसी के साथ शेयर कीजिए
ज़रूरी नहीं है कि आप प्रोफेशनल के पास जाएं. आपको ऐसे व्यक्ति के पास जाना होगा, जो आपको सुन व समझ सके. आपके आस-पास कोई न कोई ऐसा ज़रूर होगा, जो आपमें दिलचस्पी रखता होगा और आपकी भलाई चाहता होगा. उससे बात कीजिए. अक्सर लोग किसी से कुछ कहने से इसलिए भी कतराते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे बात फैल जाएगी. लेकिन ध्यान दें किसी से बात शेयर न करना, प्रेशर कुकर की तरह है. आपको यह समझना होगा कि कि आपने अपने शरीर के अंदर प्रेशर कुकर पालकर रखा है. अगर बहुत प्रेशर हो गया तो उसके ब्लास्ट होना ही है. इसलिए फीलिंग को बाहर निकलना बहुत ज़रूरी है. किसी न किसी से शेयर करना पड़ेगा.

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लिखकर फाड़ दें
अगर शेयर नहीं कर सकते तो किसी नोटबुक में लिखकर फाड़ दीजिए. इसे थीळींश- ठशरव-र्इीीप टेक्नीक कहते हैं. लिखते समय आप अपनी पूरी भड़ास निकाल लीजिए. एक-दो घंटे बाद उसे पढ़िए और पढ़कर फाड़ दीजिए. उसे इकट्ठा नहीं करना है. कई मामलों में तो ऐसा होता है कि लोगों को अपना लिखा पढ़कर ही हंसी आती है कि आख़िर कैसी छोटी-सी बात परेशान कर रही थी. अगर आप उसे फड़ा रहे हैं तो इसका अर्थ हुआ कि आप अतीत भूलना चाहते हैं और अगर एकत्रित करेंगे तो इसका अर्थ होगा कि आप अपने दुखों को जमा कर रहे हैं.
मेडिटेशन और काउंसलिंग मेडिटेशन से फ़ायदा होता है, लेकिन सिर्फ़ इससे ही कुछ नहीं होना. अगर इन उपायों को अपनाने के बाद और अपनी ओर से पूरी कोशिश करने के बाद ही बात न बने तो थेरेपिस्ट से संपर्क करें.

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