जब दो बच्चों में हो कम अंतर

पहली बार मां बनना किसी महिला के लिए दुनिया की सबसे अनमोल ख़ुशी होती है, लेकिन ये ख़ुशी अपने साथ ज़िम्मेदारियों का पिटारा भी लेकर आती है. ये ज़िम्मेदारी तब और बढ़ जाती है, जब एक बच्चा होने के कुछ ही माह बाद आप दुबारा मां बन जाती हैं. ऐसी स्थिति में कैसे संभालें अपने दोनों नन्हें-मुन्ने को? आइए, हम बताते हैं.

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पहले बच्चे की प्लानिंग तब बिगड़ जाती है, जब पहली डिलिवरी के कुछ माह बाद आप दुबारा प्रेग्नेंट हो जाती हैं और आपको सिंगल चाइल्ड के बदले डबल चाइल्ड की ज़िम्मेदारी निभानी पड़ती है. दो बच्चों को एकसाथ पालना कोई आसान काम नहीं, ख़ासतौर पर आज की महिलाओं के लिए, जो सिंगल चाइल्ड के लिए भी बहुत देर से ख़ुद को तैयार कर पाती हैं. कैसे हैंडल करें दो बच्चों को एकसाथ? आइए, जानते हैं.

छोटे बच्चे पर पहले ध्यान दें

माना आपका पहला बच्चा भी अभी छोटा है, लेकिन दूसरे बच्चे के आने से आपकी ज़िम्मेदारी उसके प्रति बढ़ जाती है, इसलिए अब आपको अपने दूसरे बच्चे की ज़रूरतों का ख़ास ध्यान रखना चाहिए. उसके खाने से लेकर सोने तक की सभी चीज़ों पर आपको पहले ध्यान देना चाहिए. इसके लिए आप बड़े बच्चे की सहायता भी ले सकती हैं यानी छोेटे बच्चे की देखभाल में आप बड़े को भी शामिल कर सकती हैं. इस तरह वो बच्चे के साथ ज़्यादा से ज़्यादा समय बिता पाएगा और दोनों की बॉन्डिंग भी बढ़ेगी.

दोनों का समय निश्‍चित करें

एक समय में दो बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाना कोई आसान काम नहीं. ऐसे में आप थोड़ी-सी प्लानिंग के साथ दोनों को समय दे सकती हैं. उदाहरण के लिए, अपने बड़े बच्चे के खाने से लेकर सोने तक का समय निश्‍चित कर लें. छोटे के साथ आप ऐसा नहीं कर सकतीं, क्योंकि वो बहुत छोटा है. जब छोटा सो जाए, तो बड़े बच्चे को आप पूरा समय दें. आमतौर पर सुबह बच्चे लेट उठते हैं. ऐसे में आप इस बीच अपने कुछ पर्सनल काम निपटा सकती हैं और बड़े बच्चे को प्यार-दुलार से उठाकर उसके नियमित काम निपटा सकती हैं.

पहले बच्चे को अनदेखा न करें

कई बार ऐसा देखा गया है कि संयुक्त परिवार होने पर मां अपने पहले बच्चे की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से सास, ननद आदि पर छोड़ देती है. ऐसे में मां का पर्याप्त समय न मिलने पर बच्चा ज़िद्दी बन जाता है. साथ ही वो अपने छोटे भाई/बहन से मन ही मन नफ़रत करने लगता है. उसे ऐसा महसूस होता है कि छोटे/छोटी के आने के बाद से ही आप उसे अपने से दूर रखती हैं. जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है उसकी मानसिकता और भी मज़बूत होती जाती है, जो आगे चलकर आपके लिए परेशानी का कारण बन सकती है.

छोटे बेबी को अकेला न छोड़ें

आपका छोटा बच्चा जब भी कमरे में अकेले सो रहा हो या खेल रहा हो, तो उसे अकेला न छोड़ें. ख़ुद उसके साथ रहें या घर के किसी दूसरे सदस्य को उसका ध्यान रखने को कहें. ऐसा कई बार होता है कि छोटे बच्चे को अकेला देखकर अक्सर बड़ा बच्चा उसके क़रीब जाने की कोशिश करता है. प्यार जताने के चक्कर में कई बार बड़े बच्चे छोटे की आंख में उंगली, तो कभी हाथ-पैर खींचना, तो कभी ख़ुद उसके ऊपर लेटकर खेलने की कोशिश करते हैं, जिससे बच्चे को परेशानी होती है.

सुपर मॉम बनने की कोशिश न करें

परिवार के दूसरे सदस्यों के कहने के बाद भी दोनों बच्चों की ज़िम्मेदारी अकेले ही उठाना कोई समझदारी नहीं है. सुपर मॉम बनने के चक्कर में आप दोनों बच्चों के साथ अन्याय करती हैं, क्योंकि अकेले दोनों की ठीक से देखभाल करना मुश्किल है. ऐसे में बेहतर होगा कि पति या परिवार के दूसरे लोगों की मदद लें. इससे आपका काम तो आसान होगा ही, साथ ही मानसिक रूप से आप पूरी तरह संतुलित रहेंगी और बच्चों का ध्यान रख पाएंगी.

दूसरे काम को कहें ना

वैसे भी दो बच्चों के बाद आप अब तीन लोगों की ज़िम्मेदारी निभा रही हैं. ऐसे में घर के दूसरे कामों में आपकी भागीदारी कम होना लाज़मी है. संयुक्त परिवार होने पर आप अपने काम को पूरी तरह से तो नहीं, बल्कि कुछ कामों से छुट्टी ले सकती हैं. घर के दूसरे सदस्यों को ये समझाने की कोशिश करें कि एकसाथ आप इतनी सारी ज़िम्मेदारी निभाने में सक्षम नहीं हैं.

बड़े बच्चे को साथ लेकर जाएं

जब भी बाहर घूमने जाएं अपने बड़े बच्चे को साथ ले जाएं, क्योंकि वो छोटे से ज़्यादा समझदार है और ऐसे में जब आप छोटे को गोद में लेकर बड़े को घर पर छोड़कर उसे बाय कहती हुई घर से बाहर निकलेंगी, तो उसे दुख होगा. ऐसे में समझदारी दिखाएं और कुछ समय उसके साथ अकेले बिताने के लिए उसे अपने साथ मार्केट या जहां भी आप जा रही हैं ले जाएं. बेहतर होगा कि घूमने का समय तब निश्‍चित करें जब आपका दूसरा बच्चा सो रहा हो.

जब बात हो जुड़वां बच्चों की

जुड़वां बच्चों की परवरिश और भी मुश्किल होती है. इस समय आपको हर काम दो बार करना पड़ता है और पता भी नहीं चलता कि किसको आपने किया. उदाहरण के लिए, किसी एक को दूध पिलाने के बाद जब दूसरा रोता है, तो आपको कन्फ्यूज़न होता है. यानी दोहरी ज़िम्मेदारी के साथ ही परवरिश भी मुश्किल हो जाती है. ऐसे समय में परिवार के किसी सदस्य का साथ रहना बहुत ज़रूरी होता है या फिर आपके हसबैंड की भागीदारी बढ़ जाती है. अकेले दोनों को संभालना संभव नहीं होता, इसलिए समझदारी इसी में है कि किसी एक बच्चे की कुछ ज़िम्मेदारी आप दूसरों को सौंपें यानी परिवार के किसी दूसरे सदस्य को अपनी मदद के लिए कहें.

शादी के दो साल बाद मैंने अपने पहले बच्चे की प्लानिंग की. मेंटली मैं मां बनने के लिए तैयार थी और बहुत ख़ुश भी. मैं एक प्यारी-सी गुड़िया की मां बनी. उसे देखकर लगा जैसे मुझे दुनिया की सारी ख़ुशी मिल गई, लेकिन कुछ ही महीनों के बाद मैं दुबारा प्रेग्नेंट हो गई. आज भी मुझे याद है कि किस तरह मैं मेंटल ट्रॉमा से गुज़र रही थी. मैं बिल्कुल भी तैयार नहीं थी दूसरे बच्चे की ज़िम्मेदारी के लिए, लेकिन परिवार वालों की सलाह और साइकोलॉजिस्ट की मदद से मैं ख़ुद को तैयार कर पाई. मेरी बेटी को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था जब मैं बेटे को गोद में लेती थी. बहुत मुश्किल होती है इस तरह की पैंरेंटिंग, ख़ासतौर पर एक मां के लिए. कहीं न कहीं एक बच्चे की देखरेख में दूसरा इग्नोर हो जाता है.
– सोनम सिंह, जौनपुर