शादी है जन्मों का साथ, क्यों आउटडेटेड लगने लगी है ये बात? (Why Concept Of Timeless Marriage Is Getting Outdated?)

प्यार (Love) का रिश्ता (Relationship) है इसके दायरे तय मत करो, मुहब्बत का सिलसिला है इसे महबूब के दिल में पनाह लेने दो… न एक पल, न एक घड़ी, न एक जनम… सदियों की दास्तान है ये, हर जनम का साथ है ये… कभी न भूलनेवाला फसाना है, जन्मों तक चलनेवाला अफ़साना है… ज़माना याद रखेगा यह बात, कभी न छूटेगा अपना ये हाथ.

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प्यार, मुहब्बत, चाहत से कहीं आगे बढ़कर सबसे पाक रिश्ता माना जाता है शादी का. शादी को हमारे समाज में काफ़ी महत्व दिया जाता है, क्योंकि यह हमारी ज़िंदगी बदल देता है. शादी को लेकर यही सोच आज भी है कि यह जन्म-जन्मांतर का रिश्ता है, इसीलिए लोग शादी में सारे अरमान पूरे कर लेना चाहते हैं, क्योंकि सभी यही कहते हैं कि शादी कोई रोज़-रोज़ थोड़ी होती है. लेकिन बदलते समय ने शादी को लेकर सोच भी बदली है. शादी को जन्मों का साथ न मानकर थोड़ा प्रैक्टिकली लेने लगे हैं. यही वजह है कि अब भारत में भी तलाक़ के मामलों में तेज़ी से इज़ाफ़ा होने लगा है.

एक नज़र इन आंकड़ों पर…

–     वर्ष 2003 से 2011 के बीच कोलकाता के फैमिली कोर्ट में तलाक़ के मामलों में 350 फ़ीसदी इज़ाफ़ा हुआ है.

–     वहीं मुंबई में साल 2010 से लेकर 2014 के बीच तलाक़ के मामले दोगुना हो गए.

–     भारत में 1.36 मिलियन लोग तलाक़शुदा हैं और सेपरेशन यानी अलग होनेवाले इससे तीन गुना अधिक हैं.

–     पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं की तादाद अधिक है- तलाक़शुदा में भी और सेपरेशन के मामलों में भी.

यह सच है कि भारत में भी अब दिन-ब-दिन तलाक़ के मामले तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं. यहां हम उन मामलों को चर्चा से अलग रखेंगे, जहां तलाक़ ही एकमात्र ऑप्शन रह जाता है रिश्ते में, क्योंकि कभी दहेज, कभी शोषण, तो कभी पति के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के चलते भी लड़कियां तलाक़ का रास्ता अपनाती हैं. लेकिन जहां हर छोटी-छोटी बात ही तलाक़ की वजह बनने लगे, वहां स्थिति सोचनीय हो जाती है. इन दिनों हर छोटी-छोटी बात पर रिश्ता तोड़ने का जो ट्रेंड बन गया है, उसके परिणाम बेहद गंभीर व घातक होते हैं. कम उम्र में ही डिप्रेशन, स्ट्रेस, अकेलापन, सायकोलॉजिकल प्रॉब्लम्स व अनहेल्दी लाइफस्टाइल के कारण अपनी ज़िंदगी को बेहद ग़मगीन व कठिन बना लेते हैं.

ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि अगर शादी जन्मों का साथ है, तो आख़िर क्यों आउटडेटेड लगने लगी है अब ये बात? महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो रही हैं. एक समय था जब न महिलाएं अधिक शिक्षित होती थीं और न ही आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर. लेकिन समय के साथ-साथ सब कुछ बदल रहा है. अब वो शिक्षित व आत्मनिर्भर ही नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के प्रति सजग भी हैं. यही वजह है कि वो अब शोषण व अत्याचार सहने की बजाय ठोस क़दम उठाना बेहतर समझती हैं.

पैरेंट्स का मिलता है सपोर्ट

पहले के समय में महिलाओं के लिए शादी के बाद पैरेंट्स के घर लौट जाना भी लगभग नामुमकिन था, पर अब पैरेंट्स भी सपोर्ट करते हैं और सही-ग़लत का निर्णय लेने में बेटियों को सहयोग देते हैं.

मर्ज़ी के ख़िलाफ़ शादी होना

कई बार घरवालों के दबाव में आकर भी लड़के-लड़कियां शादी कर लेते हैं, लेकिन इस तरह की शादियों में स्वीकृति कम और तक़रार अधिक होती है. इस तरह की शादियों का अंत भी तलाक़ के रूप में अधिक होता है.

ससुराल में न निभ पाना

आपसी अनबन, सास-ससुर व बहू के बीच या फिर ननद के साथ सामंजस्य न बैठना भी एक बड़ी वजह है शादियां टूटने की. रोज़ ताने सुनना, लड़ाई-झगड़े, शिकवे-शिकायत… इन सबसे हर कोई परेशान होता है और फिर यही बेहतर समझा जाता है कि ख़राब रिश्ते में रहने व सब कुछ सहने से बेहतर है कि अलग हो जाया जाए.

नई जनरेशन की बदलती सोच

आजकल हर चीज़ से अधिक महत्व फन और एंजॉयमेंट को देने लगे हैं लोग. उन्हें लगता है एक ही तो लाइफ है, क्यों इसे बेकार के झगड़ों या कमिटमेंट में बांधकर ज़ाया किया जाए. अगर नहीं निभ पा रही, तो अलग हो जाओ.

शादी के असली अर्थ व रिश्ते की गंभीरता को न समझना

शादी एक ज़िम्मेदारी है, साथ ही यह एक ख़ूबसूरत बंधन भी है, पर आजकल कोई बंधना नहीं चाहता. रिश्ते में रहकर भी सबको आज़ादी चाहिए अपनी मर्ज़ी से जीने की, जो संभव नहीं.  जबकि शादी में त्याग-समर्पण करना ही पड़ता है. लेकिन इस तरह की भावनाएं आजकल आउटडेटेड लगती हैं. यही वजह है कि छोटी-छोटी बातें भी आजकल तलाक़ की वजहें बन जाती हैं.

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एडजेस्टमेंट्स न करना

आज सभी यह सोच रखते हैं कि हम आत्मनिर्भर हैं, तो हम अपने हिसाब से ज़िंदगी जीएंगे. किसी को किसी की सुनना या बात मानना ग़लत लगता है. सबके ईगो बड़े हो गए हैं. लोगों को लगता है कि हम क्यों किसी और के अनुसार अपनी ज़िंदगी जीएं और हम ही क्यों एडजेस्ट करें? ऐसे में एडजेस्टमेंट करने से कहीं आसान हमें अलग हो जाना लगता है.

ईगो भी एक बड़ी वजह है

कई बार लड़कों का ईगो, तो कई बार लड़कियों का भी ईगो रिश्ते को तोड़ देता है. पत्नी ज़्यादा कामयाब हो जाए या ज़्यादा कमाए, तो पति के साथ-साथ उसके घरवालों को भी समस्या होती है. कई बार लड़कियां ख़ुद यह सोचने लगती हैं कि मैं ज़्यादा कमाती हूं, तो भला मैं क्यों झुकूं. इन तमाम बातों का नतीजा तलाक़ के रूप में आगे आता है.

लाइफस्टाइल नहीं बदलना चाहते

अब यह बात आम हो गई है कि लोग शादी तो करते हैं, लेकिन अपनी शर्तों पर. शादी के बाद भी वो शादी से पहलेवाली ज़िंदगी ही जीना चाहते हैं. वही आज़ादी, वही बेपरवाही, वही अंदाज़… और जहां उन्हें लगता है कि उनकी आज़ादी या लाइफस्टाइल में उनकी शादी बेड़ी या बंधन बन रही है, वहीं उसे तोड़ने का निर्णय आसानी से ले लेते हैं.

सहनशीलता नहीं रह गई है

पहले हम छोटी-छोटी तक़रारों को इतना तवज्जो नहीं देते थे, पर अब वही बातें हमें बड़ी लगती हैं. हर बात पर हम हर्ट हो जाते हैं और हर बात हमारे स्वाभिमान का विषय बन जाती है. सहनशीलता बेहद कम हो गई है. कुछ बातों को नज़रअंदाज़ करके हम अपना रिश्ता बचाए रख सकते हैं, पर वो कोई करना ही नहीं चाहता.

रिश्ता बचाने की उम्मीद व ज़िम्मेदारी आज भी लड़कियों पर ही है

भले ही समय व समाज बदल रहा है, पर आज भी रिश्ता बनाए रखने व उसमें बने रहने के लिए समझौते करने की अपेक्षा महिलाओं से ही की जाती है. पुरुष आज भी इस दायरे से बाहर हैं. आज भी महिलाएं ही प्रयास करती हैं कि पार्टनर या ससुरालवालों की कुछ बातों को इग्नोर करके रिश्ता बच जाए, तो कोई हर्ज़ नहीं, पर इस तरह के प्रयास ससुरालपक्ष या पति की तरफ़ से आज भी कम ही होते हैं. यह भी बड़ी वजह है कि लड़कियों को कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं.

पुरुषों पर आज भी दबाव कम है

महिलाएं घर-बाहर दोनों संभालती हैं, तो उनसे यह कहा जाता है कि तुम्हारी चॉइस है. ऐसे में पुरुष आज भी ऑफिस के बाद घर आकर पैर पसारकर थककर आई पत्नी से चाय-नाश्ता मांगना अपना अधिकार ही समझते हैं. वहीं ससुराल में भी लोग यही सोचते हैं कि घर की बहू है, तो सारी ज़िम्मेदारी इसी की बनती है. घर के काम व अन्य ज़िम्मेदारियों का बंटवारा आज भी नहीं हुआ है. न पति या ससुरालवाले घर के कामों में लड़की की मदद करते हैं और न ही यह चाहते हैं कि वो जॉब छोड़कर स़िर्फ घर ही संभाले. ऐसे में लड़कियां भी अब अपने अनुसार ़फैसले लेने से हिचकिचाती नहीं हैं.

करियर की बलि आज भी महिलाओं को ही देनी पड़ती है

फैमिली संभालने की बात हो और जहां करियर में बलि देने की बात हो, तो भले ही लड़की बेहतर कमा रही हो, समझौता उसे ही करना पड़ता है. ऐसा कम ही देखा गया है कि बात जब दोनों में से किसी एक के जॉब छोड़ने की ज़रूरत पर आती है, तो निर्णय लेने का आधार अधिक तनख़्वाह व बेहतर करियर बना हो. वहां सीधे तौर पर यही मान लिया जाता है कि लड़की ही जॉब छोड़ेगी. लड़का एडजेस्टमेंट नहीं करेगा. ऐसे में मजबूरी कहें या आत्मसम्मान, महिलाएं अलगाव का रास्ता भी चुनने से पीछे नहीं हटतीं.

शादी को कैज़ुअली लेना

यह जनरेशन शादी को बहुत कैज़ुअली लेती है. इस रिश्ते के प्रति सम्मान व गंभीरता आजकल नहीं दिखाई देती. समय में बदलाव के साथ रिश्तों के मायने तो बदल रहे हैं, पर इन बदलावों के चलते लोग शादी जैसे रिश्ते को भी हल्के में ही लेने लगे हैं कि अगर चली, तो ठीक है, वरना अलग हो जाएंगे. उन्हें यह सब सिंपल और आसान लगता है.

कैसे बचाएं रिश्ते को?

–     शादी की गंभीरता को समझें और जब तक आप इसके लिए पूरी तरह तैयार न हों, तब तक शादी न करें.

–     रिश्तों को कैज़ुअली न लें और शादी के प्रति भी कैज़ुअल अप्रोच से बचें.

–     शादी ज़िम्मेदारी है, यह फन मेकिंग या ग्लैमरस चीज़ नहीं है. यथार्थ को समझें और रिश्ता निभाने के लिए ही रिश्ता बनाएं.

–     अपनी मानसिकता बदलें. रिश्तों और पार्टनर का सम्मान करें.

–     हर छोटी बात को ईगो का विषय न बनाएं. ग़लतियों को माफ़ करना और ग़लती होने पर माफ़ी मांगना भी सीखें.

–     छोटे-छोटे विवादों को झगड़े का रूप न दें.

–     सहन करना, एडजस्ट करना शादी की डिमांड होती है. इसे समझें.

–     अगर आपकी ग़लती नहीं भी है, तो भी पहल करने में हर्ज़ नहीं. रिश्ते को बचाने में अगर आपकी पहल काम आ सकती है, तो अपने ईगो की ख़ातिर पहल करने से पीछे न हटें.

–     अलग होने के बाद भी ज़िंदगी आसान नहीं होती, गंभीरता से हर पहलू पर विचार करें.

–     पार्टनर एक-दूसरे का सम्मान करें. आपस में एक-दूसरे के प्रति सम्मान हर रिश्ते में ज़रूरी होता है.

–     रिश्तों को बार-बार बदला नहीं जा सकता. यह इतना आसान नहीं होता. भले ही आप कितने भी प्रैक्टिकल क्यों न हों, रिश्ता टूटने पर दर्द सभी को होता है.

–     कम्यूनिकेट करें. कितनी भी गंभीर समस्या हो, बातचीत का रास्ता सबसे पहले होना चाहिए और वो बेहद ज़रूरी भी है. आपस में बातचीत करें और उसके बाद तय करें कि क्या करना है.

– गीता शर्मा

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