इतना ग़ुस्सा क्यों आता है? (Why Is So Much Anger?)

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छोटी-छोटी बात पर चीखना-चिल्लाना, हाथापाई, ख़ून-खराबे पर उतर आना… ये सब ग़ुस्सा ज़ाहिर करने के तरी़के हैं. आख़िर हमें इतना ग़ुस्सा क्यों आता है कि हम अपना आपा खो देते हैं? इसी की जांच-पड़ताल की है मेरी सहेली(Meri Saheli) ने.

 

ये जानलेवा ग़ुस्सा

कई बार ऐसा देखा गया है कि ग़ुस्से से बौखलाए लोग किसी की जान तक लेने से परहेज़ नहीं करते. पेश हैं, ऐसे ही कुछ उदाहरण-

* दिल्ली में एक युवक अपने मोबाइल के स्पीकर को फुल वॉल्यूम में रखकर गाना सुन रहा था. पास खड़े कुछ दूसरे लड़कों ने उसे आवाज़ धीमी करने    को कहा, लेकिन उसने अनदेखी कर दी. इस पर दूसरे लड़कों को इतना ग़ुस्सा आया कि वहीं पास में पड़े एक डंडे को पूरी ताक़त से उस युवक के सिर  पर मारा जिससे उसकी मौत हो गई.

* एक व्यक्ति सब्ज़ी ख़रीदने गया और अपनी आदत के मुताबिक वह दुकानदार से बिना पूछे सब्ज़ी उठाकर खाने लगा. दुकानदार के मना करने पर  उसे ग़ुस्सा आ गया और दोनों में बहस हो गई. विवाद इतना बढ़ गया कि सब्ज़ी खाने वाले शख़्स ने दुकानदार की चाकू से हत्या कर दी.
ये तो चंद उदाहरण हैं, ग़ुस्से में की गई ऐसी हत्याओं की फेहरिस्त बहुत लंबी है.

सहनशक्ति की कमी
मुंबई की पूजा कहती हैं, “लोकल ट्रेन में पीक आवर (ऑफिस टाइम) के दौरान कई बार बेहद मामूली बात, जैसे- तुम्हारा बैग टच हो रहा है, बाल टच हो रहे हैं, धक्का लग रहा है आदि पर यात्रियों में कहासुनी होना आम बात है और कई बार तो बात इतनी बढ़ जाती है कि मारपीट तक की नौबत आ जाती है. एक बार दो महिलाओं में झगड़ा इस क़दर बढ़ गया कि दोनों एक-दूसरे को चलती ट्रेन से धक्का देने लगीं.” ऐसे मामले इस बात की ओर इशारा करते हैं कि लोगों की सहनशक्ति कितनी तेज़ी से ख़त्म होती जा रही है. साइकोलॉजिस्ट माया कृपलानी के मुताबिक, “जिन लोगों में सहनशक्ति कम होती है उन्हें बेहद मामूली बात पर भी ग़ुस्सा आ जाता है. इसके अलावा आजकल लोगों की उम्मीदें बहुत ज़्यादा बढ़ गई हैं और जब वे पूरी नहीं होतीं, तो वे अपना आपा खो देते हैं.”

क्यों आता है ग़ुस्सा?
साइकोलॉजिस्ट नीमिषा रस्तोगी कहती हैं, “आजकल लोगों के जीवन में इतना तनाव है कि उन्हें छोटी-छोटी बात पर भी ग़ुस्सा आ जाता है. दरअसल, हर इंसान के अंदर बहुत-सी भावनाएं होती हैं, जिन्हें वो ज़ाहिर नहीं कर पाता. उदाहरण के लिए- हमें अपने बॉस या दोस्त की किसी बात पर ग़ुस्सा तो बहुत आता है, लेकिन उनके सामने हम उसे ज़ाहिर नहीं कर पाते. यही दबाया हुआ ग़ुस्सा कई बार ज्वालामुखी बनकर ग़लत जगह फूट पड़ता है. इसके अलावा हम ऐसी जगह ग़ुस्सा दिखाते हैं जहां हमें किसी चीज़ का डर नहीं होता. कई बार हम अपने प्रियजनों (माता-पिता, भाई-बहन आदि) के सामने ग़ुस्सा ज़ाहिर करते हैं, क्योंकि हमें पता होता है कि वो हमें प्यार करते हैं इसलिए हमारे इस व्यवहार को बर्दाश्त कर लेंगे.”
शहरी जीवनशैली ने लोगों की ज़िंदगी को बेहद जटिल और व्यस्त बना दिया है, जिसके चलते वे इंसानी भावनाओं से परे मशीनी होते जा रहे हैं, ख़ासकर मुंबई, दिल्ली जैसे मेट्रोज़ में जहां लोग अपने पड़ोसी तक को नहीं पहचानते, उनके पास किसी की बात सुनने, समझने का व़क्त नहीं होता. साइकोलॉजिस्ट मिलिंद करंजकर कहते हैं, “बदलती लाइफस्टाइल के कारण अब लोगों की ज़रूरतें और प्राथमिकताएं बदल गई हैं. लोग अब सफलता की ऊंचाइयों तक जल्दी पहुंचना चाहते हैं और जब ऐसा नहीं हो पाता तो वे खीझ जाते हैं. किसी भी व्यक्ति के व्यवहार पर उसकी परवरिश और आसपास के माहौल का बहुत असर पड़ता है.”

जब क़ाबू में न हों हालात
आपको मीटिंग के लिए देर हो रही है, उस पर बस नहीं मिल रही. जैसे-तैसे आपको ऑटो तो मिल गई, लेकिन आगे जाकर आप ट्रैफिक में फंस गए. ऐसी स्थिति में ग़ुस्सा आना स्वाभाविक है, लेकिन इस ग़ुस्से से आपको कुछ हासिल होने वाला नहीं है. साइकोलॉजिस्ट मिलिंद कहते हैं, “ऐसी स्थिति में शांत रहने की कोशिश करें. आपको ऑफिस पहुंचने में देर होगी, इसकी सूचना ऑफिस में दे दें. यदि कोई दूसरा रास्ता या विकल्प है, तो उस पर विचार करें. बार-बार ये मत सोचें कि मैं लेट हो रहा हूं. ऐसा सोचने से आपकी चिंता बढ़ेगी, जो आपकी सोचने-समझने की शक्ति कम कर देती है. बेकार में ग़ुस्सा करने से अच्छा है कि आप ख़ुद को हालात का सामना करने के क़ाबिल बनाएं.”
आजकल लोगों की ज़िंदगी बहुत उलझ गई है, घर-ऑफिस की दस ज़िम्मेदारियों के बीच ख़ुद के लिए सेट किए टारगेट को अचीव करने का तनाव उन पर लगातार बना रहता है. इन सबके बीच वे अपने व्यवहार को परखना भूल जाते हैं.

बेवजह नहीं आता ग़ुस्सा
ग़ुस्सा कभी भी अकारण नहीं आता, कारण बड़ा या छोटा हो सकता है. साइकोलॉजिस्ट नीमिषा कहती हैं, “हर इंसानी भावना के पीछे कोई न कोई कारण ज़रूर होता है. कई रिसर्च से भी ये बात साबित हो चुकी है. इसी तरह ग़ुस्से के पीछे भी कोई वजह ज़रूर होती है, जैसे- हमारी सोच या पिछले अनुभव, लेकिन हम कई बार उन कारणों को समझ नहीं पाते. जब आपको छोटी-छोटी बातों पर ग़ुस्सा आने लगे तो ख़ुद को परखिए और जानने की कोशिश कीजिए कि आपको ग़ुस्सा क्यों आता है? कहीं बात-बात पर ग़ुस्सा करना आपकी आदत तो नहीं बन गई है? यदि ऐसा है, तो साइकोलॉजिस्ट की मदद से इससे छुटकारा पाने की कोशिश करें.”

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तुनकमिजाज़ लोगों के लिए तरक़ीब

* जिन लोगों को बहुत ग़ुस्सा आता है उन्हें योगा, फिज़िकल एक्सरसाइज़, जैसे- दौड़ना, चलना, कोई खेल (बैडमिंटन/फुटबॉल/टेनिस) आदि को अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए. इसके अलावा आप ट्रेडमिल पर दौड़कर, कोई म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट बजाकर भी अपने ग़ुस्से को वश में कर सकते हैं.

* ड्रॉइंग, पेंटिंग, राइटिंग, सिंगिंग, डांसिंग आदि के ज़रिए अपनी भावनाओं को व्यक्त कर ग़ुस्से की भावना को दूर रख सकते हैं.

* आमतौर पर ग़ुस्से में इंसान किसी दूसरे व्यक्ति से बात करने की स्थिति में नहीं होता, फिर भी आपके पास यदि कोई ऐसा दोस्त या प्रियजन है, जो  उस स्थिति में भी आपसे अच्छी तरह बात कर सके तो उससे दिल की बात शेयर करें. आपको अपने ग़ुस्से को समझने और उससे डील करने में  आसानी होगी.

गरम मिजाज़ को बनाएं नरम
ग़ुस्से पर क़ाबू पाने के लिए पहले ये जानना ज़रूरी है कि आपको ग़ुस्सा आया किस बात पर? किसी भी चीज़ के प्रति ग़ुस्सा हमारी सोच और चीज़ों के प्रति हमारे नज़रिए को दर्शाता है.
साइकोलॉजिस्ट मिलिंद का कहना है कुछ बातों का ध्यान रखकर आप ग़ुस्से पर क़ाबू रख सकते हैं, जैसे-
* अपनी सहनशक्ति बढ़ाएं.
* ग़ुस्सा आपके लिए कितना घातक हो सकता है ये समझने की कोशिश करें.
* घटनाओं व चीज़ों के प्रति अपने विचार बनाएं.
* जब भी ऐसी स्थिति आए कि आप अपना आपा खोने लगे हैं, तो कोई भी प्रतिक्रिया देने के पहले कुछ पल रुकें और सोचें कि क्या नाराज़गी ज़ाहिर  करने का इसके अलावा कोई और रास्ता है? कुछ पल का ये ब्रेक आपके ग़ुस्से को कम कर देगा.
* जब भी ज़्यादा ग़ुस्सा आए तो 100 से 1 तक की उल्टी गिनती शुरू कर दें.
* ज्यादा ग़ुस्सा आ रहा हो, तो एकांत जगह, जैसे- बंद कमरा या टैरेस पर जाकर चिल्लाएं, ग़ुस्सा शांत हो जाएगा.
* जो कुछ हुआ वो ज़िंदगी का हिस्सा था, ज़िंदगी नहीं, यही सोचकर आगे बढ़ें.

थोड़ा ग़ुस्सा ज़रूरी है
ग़ुस्सा किसी को भी आ सकता है, लेकिन सही समय पर, सही मक़सद के लिए सही तरी़के से ग़ुस्सा करना हर किसी के वश की बात नहीं होती. यूनानी दार्शनिक अरस्तू की कही ये बात सौ फ़ीसदी सच लगती है, “हम में से शायद ही कोई ऐसा हो जिसे कभी ग़ुस्सा न आता हो, लेकिन अपने ग़ुस्से को कंट्रोल करना और सही जगह पर इस्तेमाल करने की कला बहुत कम लोगों में होती है.” बात-बात पर ग़ुस्सा करना सही नहीं है, लेकिन हमेशा ग़ुस्से को दबाए रखना भी सेहत के लिए नुक़सानदायक है.
साइकोलॉजिस्ट मिलिंद कहते हैं, “ग़ुस्से को दबाना नहीं चाहिए, उसे ज़ाहिर करना ज़रूरी है. ग़ुस्सा ज़ाहिर करने के कई तरी़के हैं, जैसे- आप यदि किसी सामाजिक मुद्दे को लेकर आंदोलन के ज़रिए ग़ुस्सा ज़ाहिर करते हैं, तो वो सामाजिक रूप से स्वीकार्य होगा, लेकिन अपना ग़ुस्सा उतारने के लिए यदि किसी को थप्पड़ जड़ देते हैं, तो इसे कोई बर्दाश्त नहीं कर पाएगा.”
यदि कहीं कुछ ग़लत हो रहा है, तो अपना विरोध जताना ज़रूरी है. घर और ऑफिस में हर कोई आपका नाजायज़ फ़ायदा उठा रहा है, ज़िम्मेदारी के बहाने आप पर काम का बोझ लादे जा रहा है, ऐसे में यदि आप चुपचाप सब सहते रहते हैं, तो ये सिलसिला कभी ख़त्म नहीं होगा. अतः ऐसी स्थिति में आपका विरोध प्रकट करना ज़रूरी है.

अन्य भावनाओं की तरह ग़ुस्सा भी एक भावना है, लेकिन इसे हमेशा नकारात्मक रूप में ही लिया जाता है. दरअसल, हमें बचपन से ही ये बताया जाता है कि ग़ुस्सा करना ग़लत है, लेकिन कोई ये नहीं बताता कि हम अपनी इस भावना को ज़ाहिर कैसे करें?

– नीमिषा रस्तोगी, साइकोलॉजिस्ट

रिसर्च
हाल ही में ब्रिटेन में हुई एक रिसर्च के अनुसार, एक आदमी महीने में औसतन 28 बार और साल में 336 बार ग़ुस्सा करता है. ग़ुस्से की मुख्य वजह नींद की कमी और आर्थिक चिंता है. इसके अलावा भूख, रूखा व्यवहार और झूठ बोलना भी ग़ुस्से की वजहों में शामिल हैं. अध्ययनकर्ताओं ने क़रीब 2000 लोगों पर शोध किया. नतीजों के मुताबिक, 10 में से 6 लोग रोज़मर्रा की बेहद मामूली-सी बात को लेकर भी ग़ुस्सा हो जाते हैं.

– कंचन सिंह