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कहानी- अपरिचित (Short Story- Aprichit)

शुभा ने गर्दन उठाकर ऊपर देखा तो सड़कों के घुमावदार एक मोड़ पर वह अपरिचित युवक खड़ा उसे आवाज़ दे रहा था. उस सुनसान रास्ते में एक अपरिचित आवाज़ ही उसका बहुत बड़ा संबल बन गई.

"स्नो व्यू को कौन सा रास्ता है भाई." नई जगह से अपरिचित होने के कारण शुभा ने पूछा.

"बस, यही, उधर वाला रास्ता है बीबीजी." आंख मलते हुए चाय वाले ने इशारा किया.

अक्टूबर का महीना समाप्त होने को था. अभी सबह के छह ही बजे थे. पर्वत श्रेणियों पर चमकती हुई बर्फ़ देखने के लोभ से शु‌भा अकेली ही नैनीताल क्लब से भोर के झुटपुटे में स्नो व्यू के लिए चल पड़ी.

"ये नंदा देवी हैं, ये त्रिशूल पर्वत शिखर है, ये नीलकंठ शिखर है और ये रहा गंगोत्री पर्वत." स्नो व्यू का गाइड दूरबीन पर दिखाता और देखने वाला मंत्र-मुग्ध सा जगमगाती हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं को देखता रह जाता. अभी इतनी सुबह केवल एक चाय की दुकान वाला ही सो कर उठा था, तो शुभा ने उससे रास्ता पूछ लिया.

शुभा स्नो व्यू की चढ़ाई पर चढ़ने के लिए मुड़ी ही थी कि पीछे से आते एक पर्यटक ने उसकी बात से उत्साहित होते हुए पूछ ही लिया-"क्या आप भी स्नो व्यू चल रही हैं? मैं भी वहीं जा रहा हूं. चलिए, अच्छा साथ रहेगा."

किसी का साथ मिल जाने से शुभा आश्वस्त तो थी, फिर भी कई पतली-पतली पगडंडियां देख कर उसने फिर से एक जगह पूछा कि क्या यही रास्ता स्नो व्यू को जाता है? तो पता चला कि वह रास्ता स्नो व्यू को नहीं, चीना पीक के लिए जाता है. स्नो व्यू के लिए नीचे वाला दूसरा रास्ता जाता है.

शुभा के साथ चलने वाले अपरिचित युवक ने मुस्कुराकर कहा, "लीजिए, आप न पूछती तो हम लोग ग़लत रास्ते पर चले जाते और भटकते हुए पता नहीं कहां-कहां घूमते-फिरते."

किसी अपरिचित के साथ यों हंस कर आत्मीयता से बातचीत करना शुभा को अच्छा नहीं लगा और उसे टालने के लिए शुभा ने उससे कहा, "आप आगे चलें. मेरे साथ के और लोग पीछे से आ रहे होंगे."

शुभा कह तो गई, पर उस निर्दोष अपरिचित से अकारण ही झूठ बोल देना उसे बुरा लग रहा था. युवक तेज-तेज कदमों से पहाड़ी रास्तों पर आगे बढ़ गया शुभा दूर तक जाते देखती रही, फिर किसी पहाड़ी मोड़ पर वह आंखों से ओझल हो गया.

शुभा अकेली ही स्नो व्यू के उस सुनसान पहाड़ी रास्ते पर चल पड़ी. इतनी सुबह उसे कोई भी उस मार्ग पर चलता दिखाई नहीं पड़ा. अभी कुछ दूर गई थी कि उसे सामने से एक डरावना पुरुष आता दिखाई दिया, जिसे देख वह भय से कांप उठी और सोचने लगी कि नारी का कहीं भी अकेले जाना कितना कठिन है. कहीं इस डरावने पुरुष ने उसकी घड़ी और चेन छीन ली तो? सोच कर वह भय से कांप उठी. उसका मन हुआ कि वह उसी आगे चले जाने वाले अपरिचित को ज़ोर से चिल्लाकर बुला ले. पर कैसे पुकारे, वह तो उसका नाम भी नहीं जानती. तभी उसे ऊपर से किसी मोड़ से एक आवाज़ सुनाई पड़ी, "आप आ जाइए, मैं यहां खड़ा हूं."

शुभा ने गर्दन उठाकर ऊपर देखा तो सड़कों के घुमावदार एक मोड़ पर वह अपरिचित युवक खड़ा उसे आवाज़ दे रहा था. उस सुनसान रास्ते में एक अपरिचित आवाज़ ही उसका बहुत बड़ा संबल बन गई.

फिर भी वह तनिक सी आहट पर ही भय से कांप उठती. आगे से कभी भी अकेले न आने का निश्चय करती हुई स्नो व्यू की ओर चलने लगी. आगे बढ़ने के अलावा उसके पास दूसरा रास्ता भी तो न था. किसी अपरिचित पर उसका झूठ प्रकट हो गया है कि वह अकेली ही आई है इस बात की उसे ग्लानि भी हो रही थी.

लगभग आधा घंटा बाद वह स्नो व्यू पर पहुंची तो सामने हिमालय का भव्य दृश्य बिखरा पड़ा था. नंदा देवी, कामेट और त्रिशूल की चोटियां सूर्य की प्रखर किरणों में जगमगा रही थीं. शुभा रेलिंग के सहारे खड़ी होकर हिमालय के उस अद्भुत सौंदर्य को मुग्ध सी देखने लगी. तभी उसे वही अपरिचित आवाज़ सुनाई दी. वह युवक उसी से पूछ रहा था "एक प्याला चाय पिएंगी. मैं आपके यहां पहुंचने की ही प्रतीक्षा कर रहा था."

शुभा ने पीछे मुड़कर देखा, वहीं रास्ते में साथ चलने वाला अपरिचित उसके सामने खड़ा चाय पीने का अनुरोध कर रहा था. शुभा उसके इस सीधे-सादे अनुरोध को टाल न सकी.

चाय पीते हुए शुभा ने बताया कि वह अकेली ही नैनीताल क्लब से स्नो व्यू देखने के लिए आई है और अपने झूठ बोलने के लिए उसने उस अपरिचित से क्षमा मांगी.

"मुझे पता था कि आप अकेली ही आई हैं, इसीलिए मैं पहाड़ के मोड़ पर से आपको आता हुआ देख रहा था, आप डर गई थीं, इसी से मैंने आपको ऊपर से आवाज़ दी थी." युवक बोला.

थोड़ी बातचीत के बाद शुभा उस युवक से सहज हो आई थी. चाय का प्याला हाथ में लेते हुए शुभा को उसकी ओर ध्यान से देखने पर लगा कि जैसे उसने शायद पहले भी कहीं इस युवक को देखा है, पर कहां यह उसे याद न आया. बातचीत के सिलसिले में शुभा ने यों ही पूछा, "आप कहीं बाहर से यहां घूमने आए लगते हैं."

"जी हां, आपने ठीक ही सोचा. इस समय तो मैं कनाडा से एक माह के लिए भारत आया हूं. वैसे मैं भारतीय हूं. जब भी भारत आता हूं, एक बार हिमालय के दर्शन करने अवश्य आता हूं. हिमालय जैसा अछूता प्राकृतिक सौंदर्य संसार में कहीं और देखने को नहीं मिलता."

उसके स्वदेश प्रेम से प्रोत्साहित हो शुभा ने पूछ ही लिया, "जब आपको अपने देश से इतना लगाव है तो फिर आप भारत छोड़कर कनाडा में क्यों रहने लगे?"

इस पर शुभा को ध्यान से देखते हुए एक दीर्घ निःश्वास लेकर युवक बोला, "कनाडा गया तो पढ़ने के लिए था, पर जब पढ़ाई पूरी करके भारत आया, तो मेरी सारी कामनाओं का संसार बिखर चुका था और मेरे पास उस समय कनाडा लौट जाने के अलावा कोई रास्ता ही न था. यहां के वातावरण में मेरा दम घुटने लगा."

युवक की बात सुन कर शुभा का मन आर्द्र हो आया और उसने सहानु‌भूति जताते हुए कहा, "यदि आपको विशेष आपत्ति न हो, तो बताइए कि ऐसी क्या बात हो गई, जिसने आपको इतना बड़ा निर्णय लेने के लिए प्रेरित कर दिया."

"बात तो बहुत लंबी है, पर आपने पूछा है तो सुनिए- मेरे बाबूजी का साधारण सा व्यापार था. बाबूजी के परम मित्र और सहपाठी का बहुत बड़ा व्यापार था. मैं छोटा था, तभी बाबूजी ने अपने मित्र की लड़की से मेरा विवाह करना निश्चित कर लिया था. इसके बाद बाबुजी असमय ही इस दुनिया से चल बसे. सारा व्यापार रिश्तेदारों ने हथिया लिया. मेरी मां ने बड़ी गरीबी से पैसे जोड़-जोड़ कर मुझे पढ़ाया. पढ़ाई पूरी करने पर भी मैं कोई नौकरी न पा सका. तब मेरे एक मित्र के पिता ने मुझे प्रोत्साहित किया और वे मुझे किसी तरह अपने साथ कनाडा ले गए. मैं अच्छी ट्रेनिंग करके भारत लौटा. यहां आने पर पता चला कि बाबूजी के मित्र ने अपनी बेटी का विवाह एक बड़े बिज़नेसमैन के लड़के से कर दिया है.

जब पता चला कि वह लड़की मेरे बाबूजी को दिए वचन को पूरा नहीं करना चाहती थी, तो मेरे मन को बहुत ठेस लगी. सुना है कि वह लड़की भी विवाह के बाद सुखी नहीं रह सकी. उसके धनी और ऐय्याश पति ने उसे त्याग दिया है." हिमालय की चोटियों की ओर देखते हुए युवक लगातार बोले जा रहा था.

उसने मुड़ कर शुभा की ओर देखा, तो पाया कि शुभा की आंखों में आंसुओं की झड़ी लगी हुई है. "मुझे क्षमा कीजिएगा. मैंने अकारण ही आपको परेशान कर दिया." उसने शुभा से कहा.

"नहीं आपका इसमें कोई दोष नहीं. में तो हिमालय देखते हुए स्वयं भावुक हो गई थी, वैसे अब तो आपने विवाह कर लिया होगा!"

"इस घटना के बाद से मेरा यहां जी नहीं लगा और मैं मां को लेकर कनाडा चला गया. जहां मैं एक अच्छी नौकरी का ऑफर छोडकर भारत आया था. वहां घर में मां का जी नहीं लगता और उन्हें दिन-रात एक ही रट लगी रहती-कब बहू लाओगे? मैंने एक केनडियन लड़की से वहां शादी कर ली."

"तब तो आपकी पत्नी भी आपके साथ भारत आई होंगी? आप उन्हें यहां स्नो व्यू दिखाने क्यों नहीं लाएं?" अपने को सहज बनाने का प्रयास करते हुए शुभा ने कहा.

ज़बर्दस्ती हंसने का प्रयास करते हुए युवक ने कहा, "मेरी पत्नी और यहां! उसे तो प्राकृतिक दृश्यों, पहाड़ों और नों में तनिक भी रुचि नही. उसे तो बड़े-बड़े होटलों में खाना, सोना और रात देर तक ताश खेलना पसंद है. वह यहां कैसे आ सकती है. मेरी पूरी आय उसके ऐशो-आराम में ही ख़र्च हो जाती है. अब तो मुझे तलाक़ देने की धमकी भी दे दी है."

बात को बीच में ही रोकते हुए शुभा ने कहा "यदि आपको बुरा न लगे, तो बताइए कि आप यहां कहां के रहने वाले हैं और बाबूजी का क्या नाम था."

"मैं हिमाचल प्रदेश में नरकंडा के पास का रहने वाला हूं और बाबूजी का नाम था भजनलाल साहनी."

चौंक कर रोते हुए शुभा कहने लगी. "तुम अरविंद हो ना! मैं ही वह अभागी लड़की हूं, जिसके सुखों की कलियां खिलने से पहले ही मसल दी गई. मेरे पिता ने ही बड़े बिज़नेस की शान शौकत के लालच में और धन-दौलत की हवन में मेरे सुख को बलिवेदी पर चढ़ा दिया. वैभव की चकाचौंध ने उन्हें बिल्कुल ही अंधा कर दिया और बिना देखे-सुने उन्होंने एक ऐय्याश और धन के नशे में बिगड़े युवक में मेरा विवाह कर दिया, जिसकी अंतिम परिणति हुई तलाक़. मैं बाबूजी के साथ यहा आई हूं." कहते हुए शुभा फूट-फूट कर रोने लगी.

"शुभा, तुम मुझे नहीं पहचान सकी थी, मैंने तो स्नो व्यू के रास्ते पर मुड़ते ही तुम्हें देख लिया था. पहचान भी गया था. पर तुमसे इस तरह कभी अचानक मुलाक़ात हो जाएगी यहां कभी मैंने सोचा भी न था. तुमने मेरे साथ चलने से मना कर दिया. इसी से मैं आगे-आगे चला आया. फिर भी पीछे मुड़कर मैं तुम्हें देखता आया था, क्योंकि मुझे पता था कि तुम अकेली ही आई हो?

"अरविंद क्या मुझे क्षमा कर दोगे मैंने तुमसे अकारण ही झूठ बोला था. मैं तो तुम्हें बिल्कुल ही नहीं पहचान सकी.

"क्या अब यहां में लौटते हुए मैं तुम्हारे साथ नैनीताल क्लब तक चल सकता हूं, जहां तुम्हारे पिताजी ठहरे हुए हैं या कि अभी भी तुम्हारे साथ कोई पीछे से आने वाला है." खिलखिलाकर हंसते हुए अरविंद ने कहा.

- शारदा त्रिवेदी

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