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कहानी- ठिठुरन‌ (Short Story- Thithuran)

पूर्ति खरे

"मैं वही गुलाबी स्वेटर पहन लूंगी. और भी बहुत से ऑप्शन हैं मेरे पास, पर इस सर्द मौसम से ठिठुरते उन सड़क किनारे बैठे लोगों के लिए ठिठुरन के सिवा कोई दूसरा ऑप्शन नहीं है."

बेटी अनिका के स्कूल फ्रेंड का अगले हफ़्ते बर्थडे था. वह एक धनी घर का बच्चा था इसलिए उसकी बर्थडे पार्टी भी हर साल की तरह बड़ी और शानदार होनी थी. अनिका अपने रूम में अपने गर्म कपड़ों का कवर्ड खोलकर बैठी हुई थी. तभी मैंने उसके रूम में जाकर देखा. उसके ढेर सारे स्वेटर, ब्लेजर यहां-वहां बिखरे पड़े हुए थे. उसका बिखरा हुआ रूम देखकर मैं बोली, "अनिका यह क्या हाल बना रखा है तुमने अपने रूम का?"

"मॉम पीयूष की बर्थडे पार्टी में मेरे सारे स्कूल फ्रेंड्स कुछ नया और कुछ यूनिक सा पहनने वाले हैं, मुझे समझ ही नहीं आ रहा कि मैं क्या पहनूं?"

इतनी छोटी सी बात पर उसे इतना परेशान देखकर मैं बोली, "इतने सारे गर्म कपड़े हैं तुम्हारे पास, उनमें से कुछ भी पहन लो. यह गुलाबी स्वेटर पिछले साल ही तो ख़रीदा था तुमने, यही पहन लो."

"नो मॉम! प्लीज़ मुझे यह स्वेटर नहीं पहनना, मुझे कुछ नया, कुछ क्लासी सा ख़रीद दो ना."

बेटी अनिका की बात पर मुझे ग़ुस्सा तो आया, पर फिर लगा कि आख़िरकार ऐसे बच्चे आए कहां से? हमने ही तो इन्हें ऐसा बनाया है. इनकी हर ज़िद पूरी कर-करके हमने इन्हें चीज़ों की वैल्यू करना सिखाया ही नहीं. 

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इस बार मैंने सोच लिया कि अनिका अपने दोस्त की बर्थडे पार्टी में जाए या ना जाए मैं किसी भी हालत में उसे कोई नया स्वेटर नहीं दिलवाऊंगी. सोचती हुई मैं किचन में चली गई. अनिका कुछ देर में किचन में आकर मेरे गले में हाथ डालकर  बोली, "मॉम! प्लीज़ एक नया ब्लेजर दिलावा दो, प्लीज़!"

यूं मना करने पर तो उसे समझना ही कहां था इसलिए तब, "ठीक है, कल चलते हैं बाज़ार." कहकर मैंने बात को टाल दिया.

दूसरे दिन रविवार था मैं अनिका को लेकर बाज़ार गई, पर उससे पहले हम एक अनाथालय में गए. वहां ठंड से ठिठुरते लोगों को हमने पुराने गर्म कपड़े दिए. वहां से निकलकर हम सड़कों के किनारे बैठे लोगों के पास गए. सबको कुछ ना कुछ देने का समर्थ तो मुझमें नहीं था, पर कुछ बच्चों को हमने कंबल ख़रीदकर ज़रूर बांट दिए.

वहीं एक लड़की मिली, जो लगभग अनिका की ही हमउम्र लग रही थी. नीले रंग की सलवार के साथ वह बेमेल सा हरे रंग का कुर्ता पहने थी. उसके पास सर्दी से बचने को सिर्फ़ एक फटा-पुराना सा शॉल था. अनिका उसे देखकर रुक गई. लगातार उसकी ओर देखकर वह मुझसे बोली, "मॉम, क्या हम इस लड़की को सर्दी की ठिठुरन से बचने के लिए कुछ दे सकते हैं?"

"नहीं अनिका! पहले ही हमने हमारे बजट से ज़्यादा दान कर दिया और वैसे भी ऐसे तो हज़ारों लोग हैं किस-किस की मदद करेगें हम? हमारी अपनी भी तो ज़रूरतें हैं." कहते हुए हम आगे बढ़ गए.

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कुछ ही देर में हम गर्म कपड़ों की दुकान पर पहुंचे तो अनिका ने एक भी गर्म कपड़े मन से नहीं देखे. अंत में जब दुकानदार स्वेटर, ब्लेज़र दिखा-दिखा कर थक गया तो अनिका वहां से उठकर चल दी.

"क्या हुआ बेटी! पसंद नहीं आया कुछ? किसी दूसरी दुकान में चलें? या घर चलकर ऑनलाइन कुछ देख लें?"

मेरे किसी भी सवाल का उसने कोई उत्तर नहीं दिया. हम बाज़ार से सीधे घर आ गए. उस रात अनिका के दिमाग़ में ना जाने क्या-क्या चलता रहा... दूसरे दिन वह स्कूल के लिए तैयार होती हुई मेरे पास आकर बोली, "मॉम, मुझे कोई नया स्वेटर या ब्लेजर या कुछ भी नहीं चाहिए. कल मैंने जो देखा उसने मेरी आंखें खोल दीं. मैं सोच रही थी कि अब मैं अपने स्कूल फ्रेंड्स के साथ मिलकर उन सर्दी से ठिठुरते लोगों की मदद करूं."

उसकी बात सुनकर मैं ख़ुश होते हुए बोली,‌ "बहुत बढ़िया सोचा तुमने! लेकिन तुम्हारे उस नए स्वेटर का क्या?"

"मैं वही गुलाबी स्वेटर पहन लूंगी. और भी बहुत से ऑप्शन हैं मेरे पास, पर इस सर्द मौसम से ठिठुरते उन सड़क किनारे बैठे लोगों के लिए ठिठुरन के सिवा कोई दूसरा ऑप्शन नहीं है."

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अनिका की बात सुनकर मैं संतोष से भर गई. सच में हमें अपने बच्चों के साथ इस तरह की पहल करने में देर नहीं करनी चाहिए. दुख हो या सुख, सुविधाएं हों या अभाव हमें सब कुछ उन्हें बराबरी से देखना चाहिए. हमें उन्हें सर्द मौसम को बयां‌ करती हुई सिर्फ़ किताबी कहानियां ही नहीं पढ़ानी हैं, बल्कि हमें उनका असल ठिठुरन से सामना भी कराना चाहिए. शायद तभी जाकर वे जीवन की असली तपन और ठिठुरन को समझ पाएंगें जैसे आज अनिका समझ गई थी.

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Photo Courtesy: Freepik

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