अब पत्नी की आंखों में मौन मुस्कान, कर्नल साहब के चेहरे पर झेंपी हुई बहादुरी और शौर्य से उपजा संकोच तैर रहा था.
सुबह-सुबह कर्नल साहब ने अपनी रौबदार आवाज़ में पत्नी से कहा, “ज़रा स्टोर की चाबी देना, कुछ निकालना है.”
पत्नी ने चाबी तो थमाई, साथ ही हिदायत भी, “काम हो जाए तो ठीक से ताला बंद कर दीजिएगा, कामवाली आने वाली है.”
कर्नल साहब बड़े एहतियात से स्टोर में गए, कुछ ढूंढ़ा, फिर पूरे आत्मविश्वास के साथ ताला लगाया- क्लिक!
चाबी वापस पत्नी को देते हुए बोले, “मिशन पूरा!”
दोपहर को जब पत्नी जी स्टोर में कुछ निकालने पहुंचीं तो नज़र पड़ते ही माथा ठनका.
डंडाले के दो छिद्रों में से ताला ऊपर वाले छिद्र में झूल रहा था… यानी ताला तो बस दिखावे का पहरा था!
जो चाहे, बिना चाबी के स्टोर खोल ले!
स्टोर के दरवाज़े पर दो छिद्रों वाला छोटा डंडाला लगा था जिसमें नीचे वाले छिद्र में रोड डालने के बाद डंडाला नीचे दबा ऊपर से ताला लगाते हैं.
पत्नी ने आवाज़ लगाई, “सुनिए ज़रा, आपने ताला लगाया था..?”
कर्नल साहब ने गर्व से कहा, “हां, बिल्कुल लगाया था! क्यों?”
“ज़रा खोल दीजिए…”
कर्नल साहब मिशन मोड में बड़े आत्मविश्वास के साथ चाबी लेकर स्टोर की ओर कूच कर गए. ताले में चाबी छिद्र में चाबी डालने ही वाले थे कि… देखा- ताला तो शोभा की चीज़ बना हुआ था… डंडाला तो बिना चाबी के ही खुल गया!
क्षणभर के लिए दोनों की निगाहें मिलीं.
अब पत्नी की आंखों में मौन मुस्कान, कर्नल साहब के चेहरे पर झेंपी हुई बहादुरी और शौर्य से उपजा संकोच तैर रहा था.
पत्नी बुदबुदाई, “सैन्य अनुशासन घर आते-आते पता नहीं कहां छुट्टी पर चला जाता है.”
– नील मणि

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