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कहानी- लड़की पराये शहर की (Short Story- Ladki Paraye Shahar Ki)

कमला इंकार करना चाहती थी, पर उसके मुंह से एक भी शब्द न निकला. उसके अंदर घबराहट सी थी. एक बार उसके दिल में आया कि उठकर बाहर चली जाए, पर फिर चुपचाप बैठी रही और अपने आप में ऐसे सिमट गई, मानो चारों ओर से ख़तरा हो.

कमला ने तैयार होकर चेहरा आईने में देखा तो उसे अपनी आंखें बड़ी रूखी सी लगी. सांवले चेहरे पर उन बड़ी-बड़ी आंखों में एक शून्यता सी दिखाई दी. आख़िर उसने आंखों में काजल लगाया तो वे और भी बड़ी बन गई, पर साथ ही और भी उदास लगीं. कमला ने मुस्कुराकर आंखों को चमकाना चाहा पर वह मुस्कुराहट उसके होंठों पर ही आई, आंखों में न झलकी.

फिर कमला ने कमरे के एक कोने में लटक रहे शिवजी और पार्वतीजी के चित्र के सामने खड़े होकर हाथ जोड़ें, आंखें मूंदीं और कुछ देर के बाद सिर झुकाया, तब उसने मुड़ कर मां से कहा, "अच्छा मां, मैं जाती हूं."‌ और मां का आशीर्वाद पाकर वह घर से निकली.

वह इंटरव्यू के लिए जा रही थी. ठीक समय से पांच मिनट पहले वह उस दफ़्तर में पहुंच गई, जहां से उसे इंटरव्यू के लिए बुलावा आया था.

दफ़्तर के बाहर कुछ लड़कियां बेंच पर बैठी हुई थीं. कमला ने गिना, वे चौदह थीं. वे भी कमला ही की तरह इंटरव्यू के लिए आई थीं. उनमें से अधिकांश एंग्लोइंडियन थीं. उनके शोख क़िस्म के लिबास थे और शोख क़िस्म का ही मेकअप था, जो तीन-चार लड़कियां एंग्लोइंडियन नहीं थीं, उनके भी वस्त्रों और चेहरों में एक चटक थी. कमला ने उन्हें सरसरी नज़र से देखा और उसकी आंखें उदासी से भर गईं. वह उदासी उसके चेहरे पर भी छा गई, उनके सामने उसे अपना आपा बहुत साधारण सा लगा.

एक बार उसके दिल में आया कि वहां से उलटे पांव लौट जाए, यहां नौकरी की आशा करना व्यर्थ है. उसने सोचा ऐसी लड़कियों के मुक़ाबले में मेरे चुने जाने की संभावना नहीं है. यहां तो पहले पर्सनैलिटी देखी जाएगी और बाहरी तड़क-भड़क, काम तो बाद में देखा जाएगा. अगर काम के आधार पर ही चुनाव हो तो इनमें से शायद ही कोई मुझसे अच्छी स्टेनो होगी, टाइपिंग और शॉर्टहैंड के मुक़ाबले में इनाम ले चुकी हूं.

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लौटने के विचार के साथ ही कमला के सामने अपनी बीमार मां आई, छोटी दोनों बहनें आई और एक कमरे का अपना छोटा सा घर आया, अब इन सबका बोझ कमला के ही सिर पर था. पिता की मृत्यु से उसकी आंखों में बहुत गहरी उदासी भर गई थी और सिर पर बहुत बड़ा बोझा लाद गई थी.

आख़िर कमला उन लड़कियों के साथ एक तरफ़ बेंच पर बैठ गई. कुछ देर में पांच-छह और लड़कियां आई. फिर उस दफ़्तर का मालिक आया और सीधा अपने केबिन में चला गया. कमला उसकी एक झलक ही देख सकी. मुश्किल से तेईस-चौबीस वर्ष का था और पेंट और शर्ट में और भी छोटा लगता था.

वह दफ़्तर नया ही खुला था. हेड ऑफिस कोलकाता में था. उस शहर में उसकी वह छोटी-सी शाखा थी और उसे चालू करने के लिए वह युवक आया था.

कुछ देर के बाद चपरासी बाहर आया तो उसने एक लड़की का नाम पुकारा, सुनते ही एक लड़की फुर्ती से उठकर अंदर गई. पांच-छह मिनट के बाद वह मुस्कुराती हुई बाहर आई तो कमला को लगा, जैसे वह चुनी गई है. जितनी लड़कियां वहां बैठी थीं, वह उन सबसे सुंदर भी थी.

फिर दूसरी लड़की का नाम पुकारा गया. वह अंदर गई और कुछ देर के बाद बाहर आ गई. उसके होंठों पर मुस्कुराहट नहीं थी. फिर तीसरी लड़की अंदर गई. इस प्रकार एक-एक करके लड़कियां अंदर जाती रहीं और कुछ देर के बाद चेहरों पर आशा-निराशा के भाव लिए बाहर आती रहीं.

कमला हैरान थी कि उसकी बारी कब आएगी? उसके अंदर घबराहट थी. आख़िर जब वह अकेली ही रह गई तो उसका नाम पुकारा गया.

वह उठी, उसने चेहरे पर मुस्कुराहट लाने की कोशिश की और धीरे-धीरे चलती हुई अंदर गई.

छोटा सा केबिन था वह, जिसमें मेज के पीछे कुर्सी पर यह युवक बैठा था.

उसने हल्का सा मुस्कुराकर कमला को सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा किया.

कहानी

कमला बैठ गई तो युवक ने बड़े आराम से सिगरेट की डिबिया खोली. उसमें से सिगरेट निकाली, होंठों में लगाई, दियासलाई जलाई और कश खींचकर सुलगाई. ऐसे लग रहा था, जैसे वह इंटरव्यू करता हुआ थक गया हो और अब और इंटरव्यू करने को उसका दिल न चाहता हो.

उसने सिगरेट का एक लंबा कश खींचकर धुआं छोड़ा और धुएं के जाल में से कमला को एक नज़र देखा, कमला उस नजर को महसूस किए बिना न रह सकी. फिर उसने कमला की अर्जी को देखा. कुछ देर देखने के बाद उसने कहा, "तुम कब से काम करना चाहोगी?"

सुनकर कमला को अजीब-सा लगा. इसके पहले उसने सात जगह इंटरव्यू दिए थे. हर जगह उससे आम स्वायती क़िस्म की बातें पूछी गई थीं, जो उसकी अर्जी में पहले से लिखी हुई होती थीं, पर यहां पहला ही सवाल अजीब सा था.

कमला ने कुछ घबराहट में कहा, "जब से आप कहें."

"कल से?"

एकाएक कमला का दिल उछल कर जैसे उसके कंठ में आ गया. उसके मुंह से निकला, "हां, कल से."

"एप्लीकेशन में जो तनख्वाह तुमने मांगी है, मुझे मंज़ूर है, काम ठीक हुआ तो मैं ख़ुद ही और बढ़ा दूंगा. अच्छा तो कल से."

कमला ने "थैंक यू वेरी मच" कहा, तो शब्द जैसे लड़खड़ा गए. उसकी ख़ुशी का ठिकाना न था.

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अगले दिन कमला ठीक समय पर दफ़्तर पहुंची. उसी समय वह युवक भी आया. कमला ने दोनों हाथ जोड़कर उसे नमस्ते की, तो जवाब में वह हल्का सा मुस्कुराया और अपने केबिन में चला गया.

बाद में कमला को पता चला, उसका नाम रमेश था. कमला केबिन के बाहर छोटी सी मेज पर रखे टाइपराइटर के सामने बैठ गई. समय बीतने लगा, पर काम कोई नहीं था.

दोपहर की छु‌ट्टी हुई, रमेश खाना खाने बाहर चला गया. कमला घर से खाना लाई थी और वहीं बैठकर खाने लगी.

छु‌ट्टी के बाद फिर समय बीतने लगा, पर काम कोई नहीं था. कमला हैरान थी कि यह कैसा दफ़्तर है, जहां बिल्कुल ही काम नहीं है.

शाम के समय रमेश ने कमला को बुलाया. कमला कॉपी और पेंसिल लेकर अंदर गई और सतर्क होकर बैठ गई.

"तुम तो यहां बहुत अर्से से रह रही होगी?" रमेश ने पूछा.

"हां, बचपन से ही." कमला ने कहा.

"तब तो तुम्हें यह शहर पसंद होगा?"

"हां..."

रमेश कुछ देर कमला के उस पार जैसे किसी चीज़ को देखता रहा. फिर उसने कहा, "मुझे यह शहर अजीब सा लग रहा है. जब से आया हूं, बहुत अकेला-अकेला महसूस कर रहा हूं. पता नहीं इस शहर में दिल लगेगा भी या नहीं? अभी तक कोई अच्छी कंपनी भी नहीं मिली."

कमला चुप रही. उस समय वह रमेश की बजाय मेज की ओर देख रही थी.

"यहां कौन सी जगहें देखने लायक है?" रमेश ने पूछा.

कमला ने उसे कुछ ख़ास ख़ास जगहों के नाम बताए. उसी समय चपरासी चाय की ट्रे लेकर अंदर आया तो रमेश ने उससे कहा, "एक कप और लाओ." तभी उसने कमला की ओर मुड़कर पूछा, "चाय पिओगी ना? इस शहर में तो बिना कंपनी के चाय भी अच्छी नहीं लगती."

कमला इंकार करना चाहती थी, पर उसके मुंह से एक भी शब्द न निकला. उसके अंदर घबराहट सी थी. एक बार उसके दिल में आया कि उठकर बाहर चली जाए, पर फिर चुपचाप बैठी रही और अपने आप में ऐसे सिमट गई, मानो चारों ओर से ख़तरा हो.

रमेश ने चाय बनाकर एक कप उसकी ओर बढाया, फिर चाय पीते हुए उसने कहा, "तुम तो परिवार में रहती होगी? घरवाले होंगे तुम्हारे और घर का वातावरण होगा और मैं हूं कि होटल में दिन काट रहा हूं. हर प्रकार की सुविधाएं हैं, फिर भी दिल नहीं लगता,"

इस बार भी कमला चुप रही और आंखें झुकाए मेज की ओर देखती रही. तभी अचानक रमेश ने पूछा, "क्यों, क्या बात है? क्या तुम भी होटल में ही रहती हो? परिवार नहीं है तुम्हारा?"

"है...", कमला के मुंह से निकला, "मां और दो बहनें हैं."

रमेश चाय ख़त्म कर चुका था. उसने सिगरेट सुलगाई और कुर्सी से टेक लगाकर मुंह से धुआं छोड़ता हुआ कहीं दूर देखने लगा.

कमला के दिल की बेचैनी बढ़ने लगी. आख़िर उसने उठते हुए कहा, "मैं जाती हूं."

रमेश चौंका, "ओह, आई एम सॉरी, अच्छा, फिर सही. फिर किसी समय बातें करेंगे. अब तो वैसे भी छुट्टी का समय हो चला है. हां, छुट्टी के बाद तुम्हारा क्या प्रोग्राम है?"

कमला ने रूखी सी आवाज़ में कहा, "घर जाऊंगी." और वह बाहर चली गई. वह सोच रही थी, पहला ही दिन ऐसा है, तो आगे क्या होगा?

कहानी

दिन बीतने लगे, दफ़्तर में काम लगभग नहीं के बराबर था. दिन में टाइप करने के लिए मुश्किल से दो-चार पत्र होते. बाहर से दो-चार पत्र आते तो कमला उन्हें फाइलों में लगा देती. रमेश कभी उसे केबिन में बुला लेता और बातें' करता. कमला अधिकांशतः चुप बनी बैठी रहती.

एक बार रमेश ने उसे दोपहर के खाने पर अपने साथ चलने के लिए कहा तो कमला ने इन्कार कर दिया. एक बार रमेश ने शाम की सैर के लिए कहा, तो कमला ने इन्कार कर दिया. आख़िर रमेश ने उसे कहना छोड़ दिया. अब वह उसे शाम की चाय पर भी नहीं बुलाता था. कमला ने सुख की सांस ली. पिछले आठ-दस दिन अजीब-से बीते थे. कमला हमेशा अपने मन पर एक बोझ सा प्रतीत करती थी. अब वह बोझ उतर गया था. अब रमेश सिर्फ़ काम की बात ही करता था. अब यद्यपि वह पहले से ज़्यादा उदास दिखता था, पर उसने कभी अपने इस अकेलेपन के बारे में बात नहीं की थी.

उसके प्रति कमला के मन में जो एक घृणा का भाव था, वह धीरे-धीरे फीका पड़ने लगा. जब कभी वह उसे देखती तो उसके मन में हल्का सा तरस का भाव जागता. उसे लगता जैसे वह इस पराये शहर में आकर खो गया है.

कहानी

अब कमला जब भी कभी रमेश के केबिन में जाती, तो उसे सुस्त सा बैठा हुआ, राइटिंग पैड के काग़ज़ पर ऊटपटांग सी लकीरें खींचते हुए पाती. कमला के आने पर वह काग़ज़ फाड़कर रद्दी की टोकरी में फेंक देता और पत्र लिखवाने लगता. कभी कमला उसकी अनुपस्थिति में केबिन में जाती तो देखती कि रद्दी की टोकरी में कई फटे हुए, मरोड़े हुए कागज़ पड़े होते, जिन पर ऊटपटांग चित्र बने होते.

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काम यद्यपि पहले से बढ़ गया था, फिर भी दिन का काफ़ी समय बेकार बैठ कर बिताना पड़ता. समय काटने के लिए कमला कभी कुछ लिखने लगती. कभी किसी संपादक के नाम पत्र, कभी किसी पत्र के लिए छोटा सा स्कैच. उसे लिखने का शौक था, पर पत्र-पत्रिकाओं में उसकी अधिकांश रचनाएं न छपने के कारण वह शौक विकसित नहीं हो पाया था. इन्हीं दिनों कमला ने एक छोटी सी कहानी लिखी. वह एक दफ़्तर के मालिक और उस दफ़्तर में काम करने वाली एक टाइपिस्ट लडकी की कहानी थी. वास्तव में वह उसकी अपनी और रमेश की कहानी थी. कहानी का पिटा हुआ विषय था कि किस प्रकार एक मालिक अपनी टाइपिस्ट को फंसाना चाहता है... कमला अपने फ़ुर्सत के समय में कहानी को काटती-छांटती रहती. उसे दो-तीन बार फिर से लिखा. आख़िर उसमें अंतिम रूप से कांट-छांट करने के बाद उसने उसे साफ़-सुथरे काग़ज़ों पर टाइप किया और सोचा कि किसी पत्रिका को भेज देगी.

इसके दूसरे ही दिन रमेश ने उसे बुलाया. वह गई और कॉपी-पेन्सिल लेकर लिखने के लिए सतर्क होकर बैठ गई तो रमेश ने कहा, "मैं कोलकाता जा रहा हूं."

कमला लिखते-लिखते अचानक रुक गई और उसने मुंह उठाकर रमेश की ओर देखा.

रमेश हल्का सा मुस्कुराया.

"मैं' आज ही रात की गाड़ी से कोलकात्ता जा रहा हूं कुछ दिनों के लिए. कुछ ज़रूरी काम तुम्हें समझाए जाता हूं, वो बाद में कर लेना." वह रुका और फिर उसने अचानक पूछा, "कोलकाता देखा है तुमने? इस शहर से बिल्कुल ही अलग क़िस्म का शहर है. मुझे तो वह सारा शहर ही जैसे घर लगता है. कभी आओ, तो तुम्हें भी वह घर ही लगेगा. वहां आदमी इतना अकेलापन महसूस नहीं करता. इस शहर में तो..."

कमला चुप बनी सुनती रही. आज वह नज़रें झुकाए मेज की ओर नहीं, बल्कि सामने उसकी ओर देख रही थी, आज उसमें कोई घबराहट नहीं थी. हां, चेहरे पर एक हल्का सा असमंजस का भाव था कि यह आदमी आख़िर कहना क्या चाहता है.

रमेश ने उसे कुछ ज़रूरी काम समझाए और अंत में गुडबाय कहा. कमला जवाब में धीमे से गुडबाय कह कर आ गई.

पांच-छह दिन बीतने पर कमला को पता लगा कि रमेश वापस नहीं आ रहा. उसकी जगह कोई और मैनेजर आ रहा था. कमला के दिल में हल्की सी टीस उठी. वह देर तक टाइपराइटर के सामने बैठी दीवार की ओर शून्य सी देखती रही.

इसके तीन दिन बाद दफ़्तर के पते पर कमला के नाम एक रजिस्टर्ड लिफ़ाफ़ा आया. वह रमेश की तरफ़ से था. शायद कुछ ज़रूरी काग़ज़ हों, कमला ने सोचा और जब उसे खोल कर देखा तो हैरान रह गई. उसमें से उसकी कहानी की कॉपी निकली, जिस पर उसने काट-छांट की हुई थी. तो क्या टाइप करने के बाद वह पुरानी कॉपी टोकरी में फेंक दी थी?

उसने सोचा, तभी उसका ध्यान लिफ़ाफ़े की ओर गया, उसमें दो पुठ्ठों के बीच में एक काग़ज़ था. कमला ने पु‌ट्ठों पर बंधा धागा खोल कर काग़ज़ ‌निकाला तो उसे देखती रह गई. उस पर पेंसिल से बना एक चित्र था. बस, कुछ एक ही रेखाओं में वह चित्र उभर आया था, वह एक लड़की का चित्र था, जिसके अस्पष्ट से चेहरे पर दो बड़ी-बड़ी उदास और शून्य सी आंखें थीं. और उस चित्र के नीचे लिखा था- पराये शहर की लड़की...

कमला देर तक उसे अपनी भरी आंखों से एकटक देखती रही. आख़िर उसकी आंखों में धुंध छा गई और अगले ही क्षण आंसुओं की दो बड़ी-बड़ी बूंदें गिर पड़ीं.

- अनिता पदम

कहानी

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