लिफ़ाफ़ा खोला तो हक्का-बक्का रह गया, उसका फोटो और मोती जैसे अक्षरों में ढेर सारी ऐसी पंक्तियां- आपको कितना चाहती हूं, शब्दों में बयान नहीं कर सकती... पहली ही मुलाक़ात में आप न जाने कैसे एकदम मेरे तन-मन में समा गए. सच कहती हूं पूर्व जन्म के पुण्यों से ही ज़िंदगी की सूनी राह में अचानक आप मिले और जीवन जैसे सफल और सार्थक हो गया... आप मेरे सब कुछ हैं... मैं मन ही मन सोचने लगा कि नौबत यहां तक पहुंच गई. मामला इस क़दर उलझ गया.
कुछ चेहरे दुनिया में ऐसे भी होते हैं, जो कभी भुलाए नहीं जाते. उस दिन, लाल बहादुर शास्त्री एकेडमी मसूरी में अचानक, दूर से मल्लिका को देखकर मैं एकदम हैरान सा हो गया, मल्लिका और यहां, क्या आई. ए. एस. के लिए चुनी गई है? या इसके पिता की नियुक्ति यहां हो गई है? ऐसे ढेर सारे सवालों के बादल मेरे अन्दर-ही-अन्दर उमड़ने-घुमड़ने लगे.
दरअसल, कुछ साल पहले, नटराज बुक डिपो में एकाएक उससे मुलाक़ात हुई थी. मैं वहां कुछ किताबें ख़रीदने गया था. नटराज के मालिक मुझे दुकान में बिठाकर बैंक के काम से कहीं चले गए थे. मैं एक किताब के पन्ने पलट ही रहा था कि एक किशोरी मदमाती मदभरी मस्ती में झूमती सी आई और अपनी मन्द-मन्द मुस्कान बिखेरती हुई कहने लगी, "आपके यहां पामेस्ट्री पर कोई अच्छी किताब है?"
मेरी नज़रें उठी की उठी रह गईं. रूप-रंग-रस-गन्ध की ऐसी छटा! बस, मंत्रमुग्ध सा में देखता ही रह गया. लम्बी, छरहरी, सत्रह-अठारह साल की रूपसी, सौन्दर्य, लावण्य और यौवन से लबालब, चमकता दमकला महकता-लहकता-खिलखिलाता हसीन चेहरा. बड़ी-बड़ी प्यारी प्यारी हिरनी जैसी भावभीनी आंखें, करीने से सजी-धजी लम्बी बलखाती केश-राशि. ग़ज़ब के नैन-नक़्श और लाजवाब शबाब, मैं तो उसे निहारता ही रह गया.
"बैठिए, बैठिए, (अपने आपको एक प्रकार से झटपट चेतना का इन्जेक्शन लगाते हुए मैंने पास ही पड़ी कुर्सी उसकी तरफ़ सरका दी)
"लगता है, सामुद्रिक शास्त्र में आपकी बड़ी रुचि है. देखिए, हस्तरेखा-विज्ञान पर तो, मैं समझता हूं, यहां काफ़ी किताबें हैं.
इत्मीनान से देख लीजिए, लेकिन पहले अपने हाथ तो दिखाइए, अगर आपको कोई एतराज न हो तो."
और उसने फट से बिना ना-नुकुर किए अपनी दोनों हथेलियां मेरे सामने फैला दीं. उसकी दोनों हथेलियां छूते हुए, बड़े ध्यान से उसकी हस्त रेखाएं देखते हुए मैंने फटाफट दो-चार उड़ती बातें ऐसी बता दीं कि बेचारी के तो होश ही उड़ गए. हक्की बक्की सी, अचरज भरी निगाहों से मुझे देखती ही रह गई.
"एक बात और सुन लीजिए, आपकी हेडलाइन तो बहुत अच्छी हैं, जीवन रेखा से बिल्कुल अलग और ऊपर से दोहरी भी, मतलब, दो मस्तिष्क रेखाएं तो कमाल करेंगी आपकी ज़िन्दगी में. वैसे अपने बारे में हमेशा आप ख़ुद ही निर्णय लेती रहेंगी. दूसरों की कम ही सुनेंगी. और दूसरी बात, मन से तो आप कलाकार बनने के ताने-बाने बुनती रही हैं, मगर बनेंगी प्रशासक ही. हां, वैसे अपने बारे में जल्दी-जल्दी कुछ और जानना चाहती हों तो अपना नाम और जन्मतिथि बताइए, लेकिन सब कुछ बिल्कुल सही-सही, क्योंकि इसमें थोड़ी सी भी हेर-फेर हुई कि सारा-का-सारा मामला चौपट. सब उलट-पलट, सारा हिसाब-किताब गड़बड़."
"नाम मल्लिका, जन्मतिथि पन्द्रह जून, जन्म सुबह लगभग सात बजे." एक ही सांस में वह सब कह गई.
मैंने अपने बैग से एक मोटा-सा पत्रा जैसा निकाला. झटपट कुछ हिसाब-किताब लगाया, दुबारा बड़े मनोयोग से उनका हाथ देखा और तपाक से कहा, "अभी दो साल पहले आपकी ज़िन्दगी में एक जबर्दस्त हादसा हुआ है. भयंकर जानलेवा दुर्घटना, ज़िन्दगी और मौत का आमना-सामना और आप बाल-बाल बच गईं. बोलिए, ऐसा कुछ हुआ है?"
मल्लिका मुंह बाए, टकटकी लगाए मुझे अचम्भे से देखती रह गई और फिर अपने आप को संभालती हुई, कहने लगी, "आप तो सचमुच कमाल के अन्तर्यामी हैं. आपने तो कीरो को भी मात कर दिया, लेकिन अभी तक अपने बारे में आपने कुछ बताया ही नहीं. मैं आपके घर जाकर फ़ुर्सत से आपसे बातें करना चाहती हूं. इस सम्बन्ध में आपसे बहुत कुछ सीखना चाहती हूं."
"यहां अपना कोई घर-बर तो है नहीं. पांच-छह महीनों से यहां के जाने-माने पब्लिक स्कूल में पढ़ाता हूं, वहीं रहता भी हूं, नाम मोहन जोशी, बस, मैं समझता हूं कि फ़िलहाल इतना ही काफ़ी है. वैसे आपकी ही तरह बहुत पहले मुझे भी एकाएक सामुद्रिक शास्त्र का चस्का लग गया था. दरअसल, हुआ यों कि एक दिन अचानक केदार घाटी में एक बहुत ही सीधे सादे गुणी व्यक्ति से मुलाक़ात हो गई. वह भी बस के इन्तज़ार में खड़े थे और मैं भी. हम दोनों ही बस की प्रतीक्षा में काफ़ी देर तक यों ही वक़्त काटने के लिए बतियाते रहे. बातों ही बातों में उन्होंने मेरा हाथ देखा और मेरे बारे में कुछ ऐसी बातें बताई कि मैं एकदम चौंक गया.
उन्होंने दो-तीन नाम सुझाए और कहा इनसे मिलो. ढेर सारी जानकारी हासिल करो, दरअसल, यह ज्ञान महज़ किताबें पढ़ने से प्राप्त नहीं होता, बल्कि इसके विशेषज्ञों से मिलने-जुलने से ही सही-सही बातें मालूम होती हैं. कीरो ने सात-आठ साल भारत में रहकर, चारों ओर घूम-फिर कर, यहां के जाने-माने हस्तरेखा विशेषज्ञों और ज्योतिषियों से, प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया था और तभी पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था. बस, उसी दिन से सिर पर खब्त सवार हो गई और सालों तक इसी चक्कर में मैं भी भटकता रहा."
इसी बीच नटराज बुक डिपो के मालिक आ गए और मैंने उनसे कहा, "इन्हें आप पामेस्ट्री की कुछ किताबें दिखा दीजिए." नटराज के मालिक पामेस्ट्री की किताबें निकालने के लिए एक आलमारी की तरफ़ बढ़ गए.
"हां, तो मैं आपसे फिर कब मिल सकती हूं?" मल्लिका ने बड़ी उत्सुकता से पूछा.
"आप लंच के बाद या शाम को छह बजे के बाद कभी भी स्कूल में आ सकती हैं और छुट्टी के दिन तो, जब चाहें तब यानी सुबह-सुबह भी आ सकती हैं."
और फिर दूसरे ही दिन शाम को ठीक छह बजे अपने दो साथियों के साथ घर लौटते वक़्त क्या देखता हूं कि मल्लिका एक भद्र महिला के साथ मेरे बरामदे में फूल-पत्तियों और पौधों की ताक-झांक करती इधर-उधर टहल रही है. एक साथी ने व्यंग्य बाण छोड़ा, "जोशी जी, आपके बंगले के सामने तो डी.एम. की कार खड़ी है, और बरामदे में दो रमणियां न जाने कब से आपकी बाट जोह रही हैं, क्या माजरा है मेरे यार? बड़े छुपे रुस्तम हो, चुपके-चुपके सब गुल खिला रहे हो."
"अरे, ऐसी कोई बात नहीं है मेरे भाई..." कहकर मैं अपने साथियों को उधर ही छोड़कर झटपट अपने बरामदे की तरफ़ बढ़ गया. दूर से ही उन्हें हाथ जोड़कर नमस्कार किया.
"मम्मी, यह हैं मिस्टर जोशी," मल्लिका ने मेरा परिचय देने के बाद मां की तरफ़ मुखातिब होकर कहा, "यह हैं मेरी मां."
"माफ़ कीजिए, आपको बाहर ही बैठना पड़ा." कहते हुए मैंने फटाफट दरवाज़ा खोला और उन्हें सीधे अपनी बैठक में ले गया.
फिर स्कूल और इधर-उधर की बातों का दौर शुरू हुआ. बातों ही बातों में मैंने कहा, "आप लोगों ने अभी तक अपना पूरा परिचय तो दिया ही नहीं."
"जोशी जी, वैसे परिचय की क्या बात है. इसके पापा मिस्टर चटर्जी यहां डी.एम. हैं, शायद आपको पता हो. हम लोग इलाहाबाद के रहने वाले हैं. दो बच्चे हैं. बिटिया मल्लिका हमारे साथ है और बेटा नैनीताल में पढ़ रहा है." श्रीमती चटर्जी ने बहुत ही सहज रूप में कहा.
"हां, एक बात और, क्या परसों इतवार के दिन आप हमारे साथ लंच कर पाएंगे? दरअसल, मल्लिका के पापा भी आपसे मिलने के लिए बहुत उत्सुक हैं."
"फिर कभी आ जाऊंगा, ऐसी जल्दी क्या है? इतवार के दिन वैसे भी कभी-कभी बच्चों के साथ बाहर भी जाना पड़ता है."
"जोशी जी, परसों तो आपको लंच पर आना ही पड़ेगा. मैं ख़ुद आपको लेने आऊंगी. आप ठीक बारह बजे बिल्कुल तैयार रहना. दरअसल, पापा चाहते हैं कि इस बार शरदोत्सव बड़े भव्य रूप में, कुछ नये ढंग से मनाया जाए. इस बारे में पापा पहले से ही आपसे कुछ बातें करना चाहते हैं. आपकी सलाह लेना चाहते हैं." मल्लिका ने बड़े आग्रह और अनुनय से कहा.
"तब तो आना ही पड़ेगा."
और रविवार को ठीक बारह बजे मल्लिका मुझे लेने आई. मैं तैयार बैठा था. हम दोनों कार में बैठकर बतियाते सीधे उनके बंगले पर पहुंच गए. हमारे पहुंचते ही मि. चटर्जी बैठक में आ गए. मल्लिका अपने पापा से मेरा परिचय करवाकर खिसक गई. इधर-उधर की औपचारिक बातों के बाद मि. चटर्जी ने पूछा, "जोशी जी, आप कौन
सा विषय पढ़ाते हैं.
"देखिए, स्कूल में तो, आप जानते ही हैं सभी कुछ पढ़ाना पड़ता है, लेकिन मैं ज़्यादातर अंग्रेज़ी ही पढ़ाता हूं."
"यह तो बहुत ही बढ़िया बात हुई. क्या मल्लिका को भी आप थोड़ा वक़्त दे पाएंगे. दरअसल, वह अंग्रेज़ी में बी.ए. ऑनर्स कर रही है और यहां कॉलेज में अंग्रेज़ी का स्टाफ कोई ख़ास अच्छा नहीं है. बस, कामचलाऊ ही है."
"देखिए साहब, आप बुरा न मानें, मैं टयूशन तो करता ही नहीं. हां, यदि मल्लिका कभी कुछ पढ़ना चाहे तो जितना मुझसे बन सकेगा, उसकी मदद करूंगा. मगर उस पर तो इन दिनों पामेस्ट्री का भूत सवार है."
"यह तो बहुत पहले से ही उसकी हॉबी रही है, जब-तब, कुछ-न-कुछ इस संबंध में पढ़ती ही रहती है. बस शौक है और सुना है आप तो इस विषय में माहिर हैं."
"अरे जनाब, कहां कुछ ख़ास नहीं जानता, अभी तो सीख रहा हूं."
तभी मिसेज चटर्जी आईं और बड़ी शालीनता से कहने लगीं, "चलिए, लंच के साथ-साथ ही बातें भी कर लीजिएगा. मल्लिका ने खाना लगा दिया है." लंच के साथ बातों का सिलसिला भी चलता रहा और इस प्रकार हमारा परिचय प्रगाढ़ होता गया.
और मल्लिका तो अक्सर जब-तब आने लगी. कभी छुट्टी के दिन तो कभी शाम को छह बजे के बाद. ख़ूब चहल-पहल रहती. गपशप चलती, बीच-बीच में वह पामेस्ट्री के ऐसे-ऐसे सवाल पूछती कि मैं भी कभी-कभी चकरा जाता.
और उस दिन तो हद ही हो गई. मल्लिका पर उस दिन न जाने कैसी झक सवार हुई कि दो घंटे तक उल्टे-सीधे सवाल पूछ-पूछकर मेरा मगज़ चाटती रही...
"आप अपने जीवनसाथी के रूप में कैसी लड़की की कल्पना करते हैं? आपकी मनपसंद लड़की में क्या-क्या होना चाहिए? क्या अभी तक आपके जीवन में किसी ने कभी हलचल मचाई है? क्या आप प्रेम विवाह के पक्षधर हैं?" इतने दिनों की मुलाक़ात में पहली बार, वह ऐसे ऊलजलूल प्रश्न पूछ रही थी और जाते-जाते चुपके से एक बंद लिफ़ाफ़ा मेरे हाथों में थमा फट से कार में बैठी और फुर्र से चली गई, मैं देखता ही रह गया.
लिफ़ाफ़ा खोला तो हक्का-बक्का रह गया, उसका फोटो और मोती जैसे अक्षरों में ढेर सारी ऐसी पंक्तियां- आपको कितना चाहती हूं, शब्दों में बयान नहीं कर सकती... पहली ही मुलाक़ात में आप न जाने कैसे एकदम मेरे तन-मन में समा गए. सच कहती हूं पूर्व जन्म के पुण्यों से ही ज़िंदगी की सूनी राह में अचानक आप मिले और जीवन जैसे सफल और सार्थक हो गया... आप मेरे सब कुछ हैं... मैं मन ही मन सोचने लगा कि नौबत यहां तक पहुंच गई. मामला इस क़दर उलझ गया.
इसके बाद जब काफ़ी दिनों तक मल्लिका नहीं आई, तो दिल को ठेस सी लगी. क्या गड़बड़ हो गई. कहीं बाहर तो नहीं चली गई? या बीमार तो नहीं हो गई? दिन-रात मैं ऐसे सवालों में उलझा रहता.
कई बार सोचा ख़ुद एक बार चक्कर लगाकर देखूं कि माजरा क्या है, लेकिन फिर न जाने क्यों पांव एकाएक रुक-से जाते.
छुट्टी का दिन था. अचानक सुबह सुबह मल्लिका न जाने कहां से आ टपकी, मैं कुछ सकपका सा गया, "अरे, कहां गायब हो गई थीं इतने दिनों तक? कमाल है. कोई ख़बर भी नहीं दी, मैं तो सचमुच घबरा ही गया था कि एकाएक तुम्हें यह क्या हो गया. आना ही बंद कर दिया, मैं तो इन दिनों स्कूल के नाटक के चक्कर में इस क़दर व्यस्त रहा कि सांस लेने तक की फ़ुर्सत न रही. न खाने-पीने की सुध, न कहीं आने-जाने का मन, कल शाम को ही आखिरी शो था, इसीलिए आज आराम से पड़ा था."
"हम लोगों को अचानक उत्तराखंड की यात्रा पर जाना पड़ा. पापा के लिए मुख्यमंत्री का तार आया कि तुरंत उत्तराखंड की ज्वलंत समस्याओं पर, खासतौर से आरक्षण के मामले में अपनी रिपोर्ट भेजो. हम भी उनके साथ हो लिए, और सुनिए एक मज़ेदार खबर, केदारनाथ के रास्ते में गुप्तकाशी में आपके गांव के एक आदमी से यूं ही अचानक हमारी भेंट हो गई. हमने आपके गांव के बारे में पूछा तो उसने कहा, "यहां से चार-पांच किलोमीटर ही है. सड़क भी पक्की है, आप गांव देखना चाहते हैं तो चलिए मैं आपके साथ आता हूं." और हम चल पड़े. दरअसल, आपने अपने गांव के बारे में जितना बताया था, सच कहती हूं उससे भी सौगुना बढ़कर निकला. चारों तरफ़ हरियाली ही हरियाली, घने-घने जंगल, लहलहाते सीढ़ीनुमा खेत. झरनों और सोतों का मीठा-मीठा पानी, एकदम स्वर्ग-सा लगा. हम तो सचमुच मंत्रमुग्ध हो गए. और सुनिए, आपके घर भी गए, आपके माता-पिता से मिलकर तो गदगद हो गए, कितने भले लोग हैं, कितने सीधे-सादे. आपके बारे में भी बता दिया कि बिल्कुल ठीकठाक हैं. आप किसी प्रकार की चिंता न करें."
"अच्छा, तो तुम बिना कुछ बताए, चुपके-चुपके सब कुछ देख भी आई. हम तो तुम्हारा लोहा मान गए, बड़ी तीसमारखां निकलीं, अब तुम ऑनर्स का चक्कर छोड़कर जासूसी का काम करो. बाज़ी मारोगी." मैंने उसे छेड़ते हुए कहा.
फिर चाय की चुस्कियों के साथ घुमा-फिरा कर बातों ही बातों में उसने अपने पत्र का प्रसंग छेड़ा, "आपने अभी तक कुछ कहा नहीं, कहीं मेरी हरकत से आप नाराज़ तो नहीं हो गए?"
"मल्लिका, इसमें नाराज़ होने की वैसे तो कोई बात ही नहीं. तुमने अपना मन खोल दिया, अच्छा किया. इस उम्र में अक्सर ऐसा हो ही जाता है. लेकिन मेरी मानो तो अभी तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो. कुछ बनो, तुम्हें तो बहुत आगे बढ़ना है."
मेरी बातों से वह कुछ उदास और उखड़ी-उखड़ी सी लगी और फिर बिना कुछ बोले चुपचाप अपनी कार में बैठकर चली गई. मुझे लगा कि जैसे मैंने जान-बूझकर उसका दिल दुखाया हो, उसे ठेस पहुंचाई हो. यह सोचकर दिल को बड़ा धक्का सा लगा कि क्यों खामखाह बेचारी को तंग किया, लेकिन मैं उसको ग़लतफ़हमी में भी तो नहीं रख सकता था. मैं उसे सारी बातें साफ़-साफ़ बता देना चाहता हूं, ज्योतिष के हिसाब से उसके और मेरे ग्रह मिलते ही नहीं. आज के ज़माने में, भले ही यह बात कुछ अजीब सी लगे, मगर विज्ञान तो विज्ञान ही है. इसलिए जान-बूझकर क्यों मुसीबत मोल ली जाए, दोनों की ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी. इसलिए उसको आगे बढ़ने से किसी-न-किसी प्रकार रोकना ही पड़ेगा. इस संबंध में कुछ न-कुछ तो करना ही होगा.
और फिर कुछ दिनों के बाद ख़ूब सोच-विचार कर मैं उसके घर पहुंचा. यह अच्छा हुआ कि उस दिन उसके माता-पिता किसी ख़ास काम से बाहर गए हुए थे. मैंने बिना कोई भूमिका बांधे उससे सीधे कहा, "मल्लिका, तुम मुझे ग़लत मत समझना, मुझे तुमसे कुछ बहुत ही व्यक्तिगत बातें करनी हैं. क्या तुम इस वक़्त ऐसी मनोस्थिति में हो कि गंभीरता से मेरी बात सुन सको, समझ सको. दरअसल, मैं तुमसे कुछ भी छुपाना नहीं चाहता, तुम तो जानती ही हो कि ज्योतिष पर मुझे कितना पक्का विश्वास है. उसके हिसाब से हमारा संबंध किसी भी प्रकार नहीं बनता, इसलिए सूझबूझ से काम लो. तुम मुझे चाहती हो, मुझसे प्यार करती हो तो करो, मैं भी तुम्हें चाहता हूं. बेहद प्यार करता हूं. यहां तक बिल्कुल ठीक है, लेकिन यही हमारी लक्ष्मण रेखा है. इससे थोड़ा भी आगे कदम न उठाएं, इसी में हमारा भला है."
मेरी बातें सुनकर मल्लिका एकदम मुझसे लिपट गई, फफक-फफक कर रोने लगी. सिसकियों के साथ-साथ वह छटपटाती सी बिफर गई.
"ऐसा नहीं हो सकता, आपके बिना अब मैं ज़िंदा नहीं रह सकती, चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाए,"
"अच्छा, बाबा अच्छा, अब चुप भी हो जाओ. अक्ल से काम लो. नादान न बनो. देखो जो होना होगा, वह तो होकर ही रहेगा, फिर क्यों खामखाह जी छोटा करती हो. चलो, एक गरमागरम चाय हो जाए. बस, इस बारे में आगे बहस बिल्कुल बंद, सोचना-विचारना एकदम बंद."
इसी बीच स्कूल की तरफ़ से एक साल के लिए लन्दन जाने की मेरी बात पक्की हो गई. प्रिंसिपल ने ऐन मौक़े पर यह सब मुझे बताया, वहां से एक अंग्रेज़ अध्यापक अपने स्कूल में पहुंचने वाला है और उसकी जगह मुझे पहुंचना है. इस चक्कर में किसी से मिलना-जुलना भी नहीं हो पाया. कोई चारा न देख मल्लिका से मिले बिना ही, मात्र ख़बर करने के लिए एक-दो पंक्तियां लिखकर मैं इंग्लैंड चला गया.
एक साल तक वहां की गतिविधियों में इतना व्यस्त रहा कि घर पर अपने माता-पिता को भी मुश्किल से दो-चार चिट्ठियां ही लिख सका.
इसका नतीज़ा यह हुआ कि एक दिन प्रिंसिपल ने प्रार्थना सभा में मेरी तारीफ़ के पुल बांधते हुए जब यह घोषित किया कि मि. जोशी को हम छह महीने के लिए और यहीं रखना चाहते हैं, तो काफ़ी देर तक सारा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा. डेढ़ साल के बाद जब वापस अपने स्कूल लौटा, तो काफ़ी कुछ बदल गया था. पता लगा कि मि. चटर्जी का महीनों पहले तबादला हो गया. उन लोगों से सारे संपर्क सूत्र टूट गए थे. लौटते ही मुझे भी न जाने क्या सूझी कि मैं आई.ए.एस. की तैयारी में जोर-शोर से जुट गया और ऊपर वाले की ऐसी मेहरबानी हुई कि पहले ही प्रयास में सफल हो गया. प्रशिक्षण के लिए जब मसूरी में लालबहादर शास्त्री एकेडमी में पहुंचा तो दूर से मल्लिका को भी वहां देखकर चौंक गया. उसने भी मुझे देखा तो दौड़ी-दौड़ी आई और मुझसे लिपट गई.
"अरे मल्लिका तुम यहां कैसे?"
"और आप?" बरसों से बिछुड़े अचानक मिले हम
दोनों एक दूसरे को टकटकी लगाए निहारते ही रह गए. उसने उसी दिन दिल्ली फोन करके अपनी मां को सब कुछ बता दिया. प्रशिक्षण के दौरान भी जब तब हमारी खूब गपशप चलती रहती. दूसरे प्रशिक्षणार्थी हम दोनों को घूर घूर कर देखते रहते. कुछ ही दिनों के बाद दिल्ली से मिसेज चटर्जी ने मेरे पास दो जन्म पत्रियां भेजीं जुड़वाने के 'लिए, अपनी पत्री देखकर मैं एकाएक चौंक सा गया. गांव से इन्होंने मेरी पत्री कब और कैसे मंगवा ली? तो क्या मल्लिका ने उस बार अपने जन्म का समय ग़लत बताया था. क्योंकि इसमें और मेरे हिसाब से बनी उसकी जन्म-पत्री के सातवें स्थान में तो एकदम ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ पड़ गया था, सिर्फ़ तीन घंटे के अंतर से.
अगले दिन छुट्टी थी. हम दोनों घूमते घामते कॉफी पीने के लिए क्वॉलिटी में बैठ गए. बातों ही बातों में मैंने उसे छेड़ना शुरू किया, "लगता है तुम्हारे मां-पिता अब तुम्हारे ब्याह के चक्कर में हैं." मेरे पास दो कुंडलियां भेजी हैं, यह जानने के लिए कि ठीक-ठाक जुड़ती हैं या नहीं?"
"जोशी जी, छोड़िए भी यह सब कुछ. अब मैं कभी भी शादी-वादी के चक्कर में नहीं पडूंगी."
"क्यों? ऐसी क्या मुसीबत हो गई?"
"क्योंकि मैंने बहुत पहले ही दृढ़ संकल्प कर लिया था. आप जब बाहर चले गए थे, तब सब कुछ भूल-भालकर रात-दिन एक ही सहारे जीती रही." यह कहते हुए उसने अपने ब्लाउज के अंदर से मेरा एक छोटा-सा फोटो निकालकर मेरे सामने रख दिया और ख़ुद सिसकती-सिसकती बाहर चली गई.
- डॉ. हरिदत्त भट्ट 'शैलेश'
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