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कहानी- प्रेम (Short Story- Prem)

उसकी ग़लतफ़हमी मुझे तो मीठी लगी, पर लड़की को कैसी लगी, यह देखने के लिए मैंने उसका चेहरा देखा. वहां कोई नाराज़गी नहीं थी, बल्कि शर्म से लाल हुआ चेहरा और हल्की मुस्कान थी. मतलब वह ग़लतफ़हमी उसे भी अच्छी लगी थी.

लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन के सामने खड़ी टू-बाय-टू लग्जरी बस में मैं तो चढ़ गया, लेकिन बस में कहीं बैठने की जगह दिखाई नहीं दी. प्रयागराज तक खड़े-खड़े जाना संभव नहीं था, इसलिए निराश होकर मैं नीचे उतरने ही वाला था कि पीछे की ओर दो सीटों में एक जगह खाली दिख गई. खिड़की के पास गॉगल्स पहने एक स्मार्ट सी युवती बैठी थी. शायद वह किसी के लिए जगह रोककर बैठी थी, फिर भी पूछ लेना उचित लगा, क्योंकि टिकट तो किसी को दी नहीं गई थी. अतिरिक्त बस लगाई गई थी, इसलिए टिकट काउंटर पर बैठे आदमी ने सभी से कहा था, “पहले बस में बैठ जाइए, टिकट बाद में कंडक्टर आ कर काट देगा.”

“यहां कोई आने वाला है मिस?” मैंने उस युवती से पूछा.

खिड़की के बाहर किसी से बात करता हुआ वह ख़ूबसूरत चेहरा मेरी ओर मुड़ा. अपारदर्शी गहरे काले गॉगल्स के पीछे छुपी आंखें जैसे मुझे सिर से पैर तक परख रही हों, ऐसा लगा. फिर हल्की मुस्कान के साथ उसने कहा, “नहीं, बैठ जाइए.”

राहत की सांस लेते हुए मैंने अपना सामान एक ओर रखा और उसके पास बैठ गया. मेरे 'थैंक्स' के जवाब में मुस्कुराकर वह फिर खिड़की के बाहर एक अधेड़ महिला से बातें करने लगी. उस महिला की बातों से मुझे लगा कि वह उसे छोड़ने आई है. वह कह रही थी, “सीधे प्रयागराज तक जाना है, तो संभलकर जाना, बीच में कहीं उतरना मत. आज कोई साथ में नहीं है. मैं अभी फोन कर दूंगी. बड़े काका लेने आ जाएंगे. तू चिंता मत करना, ध्यान से जाना बेटा! अगर परिवहन निगम की बस मिल गई होती तो अच्छा होता. खैर, टिकट थोड़ा महंगा ही सही. चल अब, आना फिर, मैं जाती हूं.”

बच्चे बड़े हो जाएं, चाहे कितने ही स्मार्ट और समझदार क्यों न हों, ज़्यादातर बुज़ुर्ग ऐसे ही समझाते रहते हैं. उनकी बातों से मुझे लगभग यक़ीन हो गया कि यह सुंदर संगत प्रयागराज तक की है और बिल्कुल अकेली है. पहले कभी मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ था, इसलिए मन में एक अलग सा रोमांच होने लगा.

वह महिला चली गई तो युवती ने मेरी ओर देख कर हल्की मुस्कान दी. मैंने बातचीत बढ़ाने का मौक़ा पकड़ लिया. मैंने पूछा, “आपकी मां थीं?”

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“नहीं, फुआ थीं. यहां लखनऊ में अकेली रहती हैं. पिछले हफ़्ते वह मुझे अपने साथ कुछ दिनों के लिए यहां ले आई थीं. ज़रूरी कामों की वजह से वह मुझे छोड़ने नहीं जा सकीं. अब मेरी कॉलेज की परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं तो क्या करूं, अकेली ही जाना पड़ रहा है. वैसे आप कहां तक जाएंगे?”

एक अंजान, ख़ूबसूरत लड़की मेरे जैसे एक साधारण, अंजान युवक के मामूली सवाल का जवाब इतना खुल कर, इतनी सहजता से मुस्कुराते हुए विस्तार से देने लगे तो यह मेरे लिए चींटी के लिए गुड़ जैसा था.

“जहां आप जा रही हैं, वहीं प्रयागराज.” मैंने कहा.

वह खिलखिलाकर हंस पड़ी, “वाह, अच्छा है फिर तो.”

बात आगे बढ़ानी थी, लेकिन तभी टिकट देने वाला आ गया. मैंने पैसे देते हुए कहा, “प्रयागराज की एक टिकट.”

फिर उसकी ओर देखकर सुधार किया, “आपकी टिकट भी ले लेता हूं, दो दीजिए.”

वह आदमी टिकट देते हुए हंस कर बोला, “अरे, आप भी कमाल हैं. बस में भी मज़ाक करते हैं. मेरी बहन साथ हो तो उनकी टिकट आपको ही लेनी पड़ेगी न?”

कहकर वह आगे बढ़ गया.

उसकी ग़लतफ़हमी मुझे तो मीठी लगी, पर लड़की को कैसी लगी, यह देखने के लिए मैंने उसका चेहरा देखा. वहां कोई नाराज़गी नहीं थी, बल्कि शर्म से लाल हुआ चेहरा और हल्की मुस्कान थी. मतलब वह ग़लतफ़हमी उसे भी अच्छी लगी थी.

“मैं अभी आपको पैसे दे दूंगी.” उसने कहा.

मैंने औपचारिकता से कहा, “कोई जल्दी नहीं है, प्रयागराज तक तो साथ ही हैं.”

बस चल पड़ी. हाईवे पर तेज़ रफ़्तार से दौड़ने लगी. खिड़की से आती हवा मेरे पास बैठी युवती के आकर्षक बालों को बिखेर रही थी. शायद इसी वजह से वह और भी सुंदर लग रही थी. अब अचानक मेरा ध्यान उसके सौंदर्य पर गया. गहरे आसमानी रंग की सलवार-कमीज़, उसी रंग का कढ़ाई, मैच करता दुपट्टा जो बार-बार उड़कर मुझे छू रहा था. हाथ-पैरों में कोई गहना नहीं, कानों में पतली झालर वाले झुमके. सुनहरे फ्रेम का काला गॉगल्स उसकी स्मार्टनेस को और बढ़ा रहा था. बस अफ़सोस यही था कि चश्मे के कारण उसकी आंखों की सुंदरता देख नहीं पा रहा था. फिर भी यह सच था कि मैं उसकी ओर खिंच चुका था. चुप्पी तोड़ने के लिए मैंने पूछा, “आपने अपना नाम नहीं बताया. चलो, शुरुआत मैं करता हूं, मेरा नाम प्रकाश है. आपका?”

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“निशा… मेरा नाम निशा है. प्रयागराज की इलाहाबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में थर्ड ईयर में हूं. स्टेशन के पास ही रहती हूं. प्रयागराज में उतर कर पता दे दूंगी. और हां, टिकट के पैसे तो मुझे आपको देने ही हैं, याद दिलाइएगा. कभी घर आएंगे तो अच्छा लगेगा.”

वह हर बात विस्तार से बताती थी. उसकी यह आदत मुझे अच्छी लगी. मैंने भी अपनी बात शुरू की, “मैं भी प्रयागराज में ही रहता हूं. यहां एक इंटरव्यू देने आया था, लेकिन अच्छा नहीं गया, मूड ख़राब था. आप की तरह मेरी भी परिवहन निगम की बस छूट गई तो यह लग्जरी मिल गई. और आप मिल गईं तो मूड भी ठीक हो गया.”

“आपका मज़ाक करने का अंदाज़ कुछ अलग है, मुझे पसंद आया.”

उसकी तारीफ़ से मैं और उत्साहित हो गया. ऊंचाहार के एक महंगे रेस्टोरेंट पर बस रुकी. मैंने कहा, “चलें, चाय-नाश्ता कर लेते हैं.”

“नहीं, मुझे नीचे नहीं उतरना,” उसने कहा.

मेरे आग्रह पर बोली, “तो आप यहीं कुछ हल्का-फुल्का ले आइए, साथ खाएंगे.”

मैं जलेबी और वेफर्स ले कर आया. खाते-खाते जब-तब उसका हाथ मेरे हाथ से टकराता तो शरीर में सिहरन दौड़ जाती. मुझे समझ आ गया था कि वह जान-बूझकर ऐसा कर रही है. यात्रियों की कमी थी तो मैंने हिम्मत करके उसका हाथ पकड़ लिया.

“आप भी…” कहते हुए उसने शरमा कर हाथ छुड़ा लिया. फिर बस चल पड़ी. मेरे भीतर प्रेम के अंकुर फूट चुके थे. एक हल्के झटके में उसने मुस्कुराकर पूछा, “आप मुझे…”

“प्यार करता हूं.” मैंने बिना झिझक कह दिया. “हां निशा, आप मुझे अच्छी लगती हैं, मैं आपसे प्यार करता हूं.”

कुछ देर सन्नाटा रहा. फिर अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ कर गंभीर स्वर में पूछा, “क्या आप मुझसे शादी करेंगे?”

मैं अवाक रह गया. मैंने सिर हिलाया. प्रयागराज आने तक हम चुप रहे.

बस से उतरते समय उसने कहा, “मेरी छड़ी सीट के नीचे रह गई है, ज़रा ला देंगे?”

मैं बस में लौटा. सीट के नीचे से छड़ी निकाली और जैसे हाथ में सांप आ गया हो. वह सफेद छड़ी, लाल मुड़े हुए सिरे वाली, ऊपर घंटी लगी हुई. दिल जैसे चूर-चूर हो गया.

मैं नीचे उतरा, छड़ी उसके हाथ में थमाई, टिकट के पैसे लिए बिना और उसकी ओर देखे बिना मैंने भागने की सोची. देखने की ज़रूरत ही क्या थी? कहीं वह फिर न पूछ ले कि क्या मैं उससे शादी करूंगा?

पर मैंने एक ही कदम बढ़ाया था कि अंतरात्मा से आवाज़ आई कि क्या इसी तरह प्रेम किया जाता है. अगला कदम मैं आगे नहीं बढ़ा सका. मुड़कर मैंने उसका हाथ थाम कर कहा, "चलो, मैं तुम्हें घर तक पहुंचा देता हूं."

वीरेंद्र बहादुर सिंह 

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