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कहानी- मां तो मां है… (Short Story- Maa Toh Maa Hai…)

“तुम लोगों की इंजीनियरिंग में गालियों की भी क्लास लगती थी क्या? क्या गंदी-गंदी गालियां इसने नेहा को दी हैं! बोलते हुए भी शर्म आती है. मैंने बेटी को बेचा नहीं है, ना ही वह तुम्हारे साथ भाग कर आई है. अब निर्णय करो या तो सुधर जाओ या तलाक़ दे दो! अब बर्दाश्त की चरम सीमा पार हो गई है. तुम पढ़े-लिखे ज़रूर हो, लेकिन संस्कारी नहीं हो!”

“आप लोग अमेरिका जाकर क्यों बच्चों को डिस्टर्ब करना चाहते हैं! आप यहां एंजॉय कीजिए उनको वहां करने दीजिए. आप लोगों की अवस्था ऐसी है कि वहां आपकी तबीयत ख़राब होने पर आपको वापिस लौटना होगा. वहां का इलाज बहुत महंगा है. अनूप तो अमेरिका जाना ही नहीं चाहता था. यदि वह जाना चाहता तो इंजीनियरिंग करते ही चला जाता. आरंभ से ही आपकी बेटी से अनूप की नाराज़गी का कारण यही है कि वह हाउसवाइफ रहना चाहती है, नौकरी नहीं करना चाहती, जबकि कैलिफोर्निया अमेरिका का सबसे महंगा शहर है. वहां उसने नेहा की ज़िद के कारण ही ट्रांसफर करवाया है, स़िर्फ इसलिए कि वहां उसकी सहेली रहती है.”

मेरी बेटी के सास-ससुर को जब पता चला कि हम अमेरिका अपनी बेटी और दामाद के पास कुछ महीनों के लिए जा रहे हैं तो अचानक हमारे घर पहुंचकर उसकी सास अपनी कुत्सित मानसिकता को हमारे सामने भाषण के रूप में उड़ेल कर वापिस जाने के लिए दरवाज़े की ओर लपकी.

मैं अवाक् हतप्रभ रहकर उनका यह अनर्गल बेसिर पैर का अप्रत्याशित भाषण सुनती रही. बेसाख्ता मेरे मुंह से बस इतना निकला, “नेहा को कोरोना काल के कारण यहां आए चार वर्ष हो गए हैं और उसका कहना है कि वीजा अपडेट के लिए अभी आने का वह रिस्क नहीं लेना चाहती, क्योंकि भारत आने के बाद वीजा की डेट पोस्टपोन होने की सूचनाएं मिल रही हैं. वह डेढ़ वर्ष बाद बेटी की बारहवीं की परीक्षा होने के बाद ही भारत आने का सोचेगी. उससे पहले उसका यहां आना असंभव है. हम अपनी बेटी से इतने वर्ष मिले बिना नहीं रह सकते इसलिए अपना प्रोग्राम हमें मजबूरी में बनाना पड़ा है.”

मैंने अनावश्यक उन्हें सफ़ाई दी. समय बहुत बदल गया है, लेकिन अभी भी लोगों की मानसिकता यही है कि बेटी की मां को अपनी विवाहित बेटी के घर रहने का अधिकार नहीं है. उनके इस दिल को कचोटने वाली बातों को सुनने के बाद थोड़ा अपने को संयमित करते हुए मैं बोली, “पानी तो पीकर जाइए!” इतना तो मुझे कहना था, आख़िर मैं बेटी की मां हूं, उनका पद मेरे से बहुत ऊंचा है. लेकिन मेरी बात अनसुनी करते हुए वे दरवाज़े से बाहर निकल गईं. पीछे-पीछे समधी साहब भी चलने को उठे तो मेरे पति उनको लिफ्ट से नीचे उनकी गाड़ी तक छोड़ने गए. जाते समय मेरे पति ने दोनों हाथ जोड़कर उनको नमस्ते किया. समधी जी ने तो बदले में नमस्ते कहा, लेकिन समधन निर्विकार ही रहीं.

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उनके जाने के बाद हमारा मन बहुत कसैला हो गया. हुंह... ख़ुद तो कभी अमेरिका बच्चों से मिलने जाती नहीं, जाने कैसा पत्थर दिल कलेजा है! हमें भी नहीं जाने देना चाहतीं. बच्चों के बिना कैसा हमारा एंजॉयमेंट और ऐसे बच्चे किस काम के जो माता-पिता के आने पर डिस्टर्ब होते हैं! उसके बेटे के एंजॉयमेंट में खलल पड़ सकता है. नेहा तो कितनी ख़ुश हुई जानकार कि हम उससे मिलने आ रहे हैं. ये अपने ज़िद्दी बेटे का स्वभाव जानती नहीं हैं क्या! भला वह क्या नेहा के कहने से कैलिफोर्निया शिफ्ट होगा. उसके ख़ुद के कॉलेज के साथियों का एक पूरा ग्रुप वहां रहता है. उन्हीं के कारण वह वहां रहने गया है.

मुझे हंसी के साथ ग़ुस्सा भी आया, यह सोचकर कि वे स्वयं ही बोली थीं कि नेहा को हमसे दूर रखने के लिए ही उसने अमेरिका में नौकरी ढूंढ़ी है. नेहा और हम तो यह बिल्कुल भी नहीं चाहते थे. अपने बेटे की करतूतों को जानते हुए भी इनको कितना गुरूर है. नाज़ों से पली मेरी बेटी घर की सफ़ाई, खाना बनाना, कपड़े धोना, बाज़ार का सारा काम, अपनी बेटी से संबंधित सभी कार्य वहां अकेले ही संभालती है. दामाद तो पत्ता भी नहीं हिलाता (अमेरिका में मेड अत्यधिक महंगी होने के कारण सभी कार्य स्वयं करने होते हैं). उस पर शिकायत है कि वह नौकरी नहीं करती. उसको संस्कार ही ऐसे मिले हैं कि घर और नौकरी में तालमेल हो तभी नौकरी करना. बच्चे और घर को नौकरी करने के कारण नेगलेक्ट नहीं करना! मां-बेटे की कैसी मानसिकता है.

सच ही कहा है कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है. उनको पता नहीं कि जिस घर में बिना सपोर्ट के महिलाएं नौकरी करती हैं, वह घर कितना नेगलेकटिड होता है. बच्चे भी अनाथ से हो जाते हैं. आख़िर स्त्री भी लोहे की तो बनी नहीं है, कितना काम करेगी! पूरा परिवार पैसे का भूखा है. फिर दामाद की अच्छी-ख़ासी तनख्वाह है और वह कितना फिज़ूलख़र्च है. फिर क्यों वह नौकरी करके मुसीबत मोल ले. दोनों की लव मैरिज है.

शादी के पहले तो वह कहता था, “शी इज़ माय लाइफ.” अब क्या हो गया है! मेरी बेटी शादी के पहले दिखने में बहुत ख़ूबसूरत और नाज़ुक सी थी. उसके इसी रूप पर वह रीझ गया था. अब वही उसको भारी पड़ रहा है. नेहा के मधुर स्वभाव के कारण उसको उसके ससुराल के रिश्तेदार और अमेरिका में भी सभी परिचित बहुत पसंद करते हैं, जैसा वह बताती है. मुझे तो लगता है, इससे दामाद को उससे ईर्ष्या होती है. कहां फंस गई मेरी बेटी... मन ही मन बुदबुदाई. मेरी आँखों में आंसू आ गए.

आख़िर अमेरिका जाने का भी दिन आ गया. हमें लग रहा था कि जैसे हम कोई अपराध कर रहे हैं. भरे मन से हमने जाने की तैयारी की. 18-19 घंटे का हवाई सफ़र 4-5 घंटे का लंदन में दूसरी फ्लाइट के इंतज़ार में रुकना, कुल मिला कर 24 घंटे के थका देने वाले सफ़र के बाद हम कैलिफोर्निया के एयरपोर्ट पर पहुंचे.

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बाहर दामाद, बेटी नेहा और उसकी बेटी रिंकू हमारा इंतज़ार कर रहे थे. हमें देखते ही नेहा हमसे लिपट गई. रिंकू काफ़ी लंबी हो गई थी. उसको पांच वर्ष पहले देखा था. तब से काफ़ी बदली लग रही थी. मैंने एक नज़र में भरपूर उसके व्यक्तित्व का आकलन किया. फिर सोचने लगी, तब पांचवीं कक्षा में थी, सिर्फ़ ग्यारह वर्ष की. अब दसवीं में है, किशोरावस्था के सोलहवें वर्ष में. किशोरावस्था में तो एकदम से बच्चों में बदलाव आना स्वाभाविक है, और भी मेरे मन में विचार आ-जा रहे थे. घर पहुंचकर गाड़ी रुकी, तभी मेरे विचार तंतुओं को झटका लगा. घर का दरवाज़ा खुलते ही कुत्ते ने हमारे ऊपर कंधे तक फैलकर हमारा स्वागत किया.

मुझे डरा देखकर नेहा बोली, “डरिए नहीं, यह काटेगा नहीं. बाहर से आने वालों का यह इसी तरह स्वागत करता है.” प्रत्येक कुत्ता पालने वाला यही कहता है, लेकिन बेटी ने कहा तो मैंने मान लिया. अंदर जाकर घर का मुआयना लेते हुए मैंने देखा भव्य सा दोमंज़िला महल था, जिसमें बड़ा सा डाइनिंग टेबल, बड़ा सा सोफ़ा...

मैं जानती थी यह नेहा की चॉइस तो नहीं हो सकती. दामाद को दिखावे की बहुत आदत है. बड़ा मकान, बड़ी गाड़ी... भौतिक सुखों का दीवाना है इसलिए तो अमेरिका में रह रहा है. रिश्ते निभाने में तो ज़ीरो है. माता-पिता से और अपनी इकलौती बहन से भी उसकी बिल्कुल नहीं पटती.

अमेरिका या विदेश में दो ही तरह के लोग रहना पसंद करते हैं. एक जो रिश्तों की ज़िम्मेदारी से भागना चाहते हैं, दूसरा जो अत्यधिक कमाई करके भौतिक सुख प्राप्त करना चाहते हैं. दामाद दोनों ही कारणों से अमेरिका में रहने गया है और अमेरिका आने का दोष मेरी बेटी को दिया जाता है.

मेरी बेटी ने ससुराल में सबसे मधुर संबंध बनाने की पूरी कोशिश की. ख़ुद उसकी सास कहा करती थी कि नेहा बहुत सहनशील है. अमेरिका में रहते हुए मैंने महसूस किया कि दामाद के कॉलेज के सहपाठी भी उसे घमंडी और बड़बोला होने के कारण बिल्कुल पसंद नहीं करते थे. बात-बात पर सबको ज्ञान देने की उसकी बहुत बुरी आदत है, लेकिन नेहा को बहुत पसंद करते थे.  उसके कारण ही लोगों का मिलना-जुलना संभव हो पा रहा था.

अगले दिन से दिनचर्या आरंभ हो गई. मकान पांच-छह महीने पहले ही ख़रीदा गया था. घर में अभी भी काम चल रहा था. सुबह से शाम तक लेबर काम कर रहे थे. मैंने देखा दामाद तो अपने कमरे में सो रहे हैं और नेहा ही उनको किसी सामान की ज़रूरत पड़ने पर बाज़ार से लाकर दे रही है. घर का एक-एक काम नेहा अकेले ही करती थी. दामाद तो अपने कमरे में वर्क फ्रॉम होम के बहाने पूरा दिन ही पड़ा रहता था. बस जब उसे भूख लगती, तभी बाहर दिखाई पड़ता था. हम भी अपने उम्र के कारण नेहा की पहले की तरह मदद नहीं कर पा रहे थे. कभी-कभी लगता था कि हम अमेरिका आकर उस पर बोझ बन गए हैं. मिलने वाले लोगों से पता चला कि दामाद ने मकान की अच्छी-भली दीवारों को भी तोड़कर दुबारा से प्लास्टर करवाया है. जब उसने उनसे बताया कि पांच वर्ष बाद ही इस मकान को बेच कर वह दूसरा मकान ख़रीदेगा, यह सुनकर वे हैरान हुए कि फिर मकान को ठीक कराने में क्यों इतने पैसे और समय के साथ ऊर्जा की बर्बादी की है.

नौकरी बदलना, सिटी बदलना और मकान ख़रीदना और बेचना तो जैसे उसकी हॉबी है. सात वर्ष पहले हम अमेरिका आए थे, तब दूसरी सिटी में था और हमारे रहते हुए मकान ख़रीदा था. सामान की शिफ्टिंग के साथ नए मकान में सामान जमाने में मैंने और मेरे पति ने नेहा की भरपूर मदद की थी. दामाद को तो कुछ लेना-देना नहीं था. तब भी दामाद का व्यवहार नेहा के प्रति अच्छा नहीं था, जो वह मूक रहकर सहती रहती थी.

मैंने एक दिन नेहा को कहा, “तेरे अंदर स्वाभिमान नाम की कोई चीज़ नहीं है! क्यों कुछ बोलती नहीं है? क्यों उसकी ज़्यादतियों को सहती है?” प्रत्युत्तर में वह बोली, “ममा उसकी आदत है ऐसा व्यवहार करने की. मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. जवाब देकर बात ही बढ़ेगी. यह तो अपनी आदत छोड़ेगा नहीं. रिंकू की पढ़ाई अच्छे स्कूल में हो रही है. मुझे सारी सुविधाएं मिली हुई हैं. फिर क्यों बात बढ़ाना!” मैं हैरान थी उसके जवाब पर. विवाह के पहले तो वह ऐसी नहीं थी. फिर सोचने लगी रिंकू अमेरिका में ही पैदा हुई है. बड़ी हो जाएगी तो अपने पापा को सुधार देगी. आजकल के बच्चे बहुत बोल्ड होते हैं. रिंकू उस समय तो बहुत वाचाल थी, लेकिन बहुत छोटी थी.

वहां पर वीकेंड पर पार्टी का बहुत रिवाज़ है. कभी किसी के घर पर पॉटलक, कभी किसी रेस्तरां में सभी मिलते थे. एक अच्छी बात यह थी कि सभी अपना-अपना पेमेंट करते थे. घर पर भी सभी मिलकर मेजबान की किचन साफ़ करके यहां तक कि बर्तन साफ़ करके लौटते थे. बिना किसी आयोजन के या बिना बुलाए किसी के घर कोई नहीं जाता था. हम लोग कभी नेहा के साथ बाज़ार या मंदिर चले जाते थे, जहां खाने की भी बहुत अच्छी व्यवस्था होती थी. पिछली बार की तरह इस बार भी कहीं घूमने का प्रोग्राम नहीं बना, इसके पीछे बेटी की स्वयं की आमदनी नहीं होना ही था. हम भी डॉलर में ख़र्चा करने में समर्थ नहीं थे.

घर का वातावरण इतना बोझिल था कि थोड़े दिनों में ही ऊब होने लगी. एक तो अमेरिका में बाहर जाने के लिए बच्चों पर निर्भर रहना पड़ता था, ऊपर से पास-पड़ोस में कोई बोलने-चालने वाला नहीं था और घर का वातावरण भी मनहूसियत लिए हुए हो तो ऊब होना स्वाभाविक था. लेकिन नेहा को तकलीफ़ होगी, इसलिए उससे कुछ नहीं कहते थे. हर वीकेंड पार्टी में जाना भी बेमानी लगता था, क्योंकि हमें इसकी बिल्कुल आदत नहीं थी. देर रात तक खाना और पीना देखकर मुझे वितृष्णा सी होने लगती थी. घर में भी अकेले रहना भारी लगता था.

दामाद तो घर लौटने का नाम ही नहीं लेता था. एक दिन मैंने थोड़ा घर लौटने की जल्दी दिखाई तो उसने रास्ते में इतनी रैश ड्राइविंग की कि घर पहुंच कर ही जान में जान आई. यदि उसको टोकते तो वह सुनने वाला नहीं था.

एक दिन तो हद हो गई किसी बात पर वह नेहा पर चिल्लाते हुए बोला, “तुम अच्छी बेटी हो, मां हो, लेकिन अच्छी पत्नी नहीं हो! मुझे तुमने कितनी बीमारियां दे दी हैं (जबकि उसके माता-पिता को डायबिटीज़ है, ऊपर से शराब और सिगरेट की लत, भला बीमारियां तो लगेंगी ना!) उसके बाद ऊपर की मंज़िल पर जाकर ताबड़तोड़ गंदी गालियों की बौछार शुरू कर दी. रिंकू भी अपनी मां के बगल में खड़ी थी. दोनों कुछ नहीं बोलीं. हम अंदर कमरे में हतप्रभ सब सुन रहे थे. उस समय तो मैं कुछ नहीं बोली, लेकिन मन ही मन तय किया कि इस बार आर या पार फ़ैसला करके जाऊंगी. इस बार रिंकू को चुप-चुप और सहमा-सहमा होने का कारण अब मुझे समझ में आया कि उसकी यह आदत किशोरवय के कारण नहीं है, बल्कि घर के वातावरण का ही उस पर दुष्प्रभाव पड़ा है. मैंने उसको अपने पापा से कभी सहज भाव से बात करते हुए नहीं पाया. यह देखकर मेरा मन कचोटने लगता.

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अगले दिन हम नेहा के साथ उसकी आत्मीय सहेली गरिमा के पास गए. उसका पति राकेश दामाद का सहपाठी था. मैंने पूरी घटना उसको सुनाई तो राकेश बोला, “आंटी आप नेहा को अपने साथ इंडिया वापिस ले जाइए. महीने में कम से कम इस तरह के दो एपीसोड तो होते ही हैं.”

मैं अवाक सकते की हालत में थोड़ी देर के लिए सोच में पड़ गई. फिर मैंने उन दोनों से कहा, “इस संडे को तुम दोनों हमारे घर पर आना. मुझे तुम दोनों को विटनेस बनाकर कुछ उससे बात करनी है.” दोनों ने सिर हिलाकर हामी भर दी.

रविवार को वे ग्यारह बजे घर आ गए. आने के आधे घंटे बाद राकेश दामाद से बोला, “आंटी को तुमसे कुछ बात करनी है.” अप्रत्याशित कुछ सोचते हुए वह बैठ गया. मेरे पति और नेहा, जो हमेशा कुछ भी बोलने से रोकते थे, उनकी भी पूरी सहमति थी. वे दोनों भी बैठ गए.

मैंने दामाद और राकेश दोनों की ओर देखते हुए बोला, “तुम लोगों की इंजीनियरिंग में गालियों की भी क्लास लगती थी क्या? क्या गंदी-गंदी गालियां इसने नेहा को दी हैं! बोलते हुए भी शर्म आती है. मैंने बेटी को बेचा नहीं है, ना ही वह तुम्हारे साथ भाग कर आई है. अब निर्णय करो या तो सुधर जाओ या तलाक़ दे दो! अब बर्दाश्त की चरम सीमा पार हो गई है. तुम पढ़े-लिखे ज़रूर हो, लेकिन संस्कारी नहीं हो!” दामाद भौंचक्का सा सुनता रहा. उसके पास कोई जवाब नहीं था. फिर अचानक उठ कर चला गया. नेहा की आंखों से आंसू बहने लगे, जैसे उसके मन की बात मैंने कह दी हो. गरिमा और राकेश से मेरी आंखों ही आंखों में बात हुई और थोड़ी देर में वे वापिस लौट गए.

उनके जाने के बाद मैंने नेहा से पूछा, “बेटा मैंने कुछ ग़लत तो नहीं बोला.” उसने प्रत्युत्तर में बोला, “नहीं ममा, आपने ठीक बोला. एक तो मेरी लव मैरिज़ है, दूसरा रिंकू का फ्यूचर अमेरिका में ही है और मैं डिपेंडेंट वीजा पर हूं और यह सोचकर कि समय के साथ यह बदल जाएगा, मैं सब सहती आई हूं. लेकिन मेरे सहते रहने से इसकी हिम्मत बढ़ती जा रही है. अब तो ग़ुस्सा आने पर जो भी चीज़ हाथ के आसपास होती है मुझ पर फेंक कर मुझे शारीरिक रूप से भी प्रताड़ित करने का दुस्साहस करने लगा है. आपको पता है कि यहां मानसिक रूप से या शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने पर तुरंत पुलिस बुलाई जा सकती है, लेकिन मुझे भी जैसे आदत सी पड़ती जा रही है. शायद मैं कभी निर्णय नहीं ले पाती. आपने मुझे रास्ता दिखा दिया है. अमेरिका में रहते हुए इंडिया लौटने की सोचना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन मैं अब थक गई हूं. एक वर्ष बाद रिंकू कॉलेज चली जाएगी. तब तक मैं भी जॉब लेने की कोशिश करूंगी, जो भी होगा देखा जाएगा, लेकिन अब मैं एक साल बाद इसके साथ नहीं रहूंगी. यह मेरा आख़िरी फ़ैसला है.” एक सांस में मन की व्यथा पहली बार मेरे सामने उड़ेलते हुए वह रुआंसी हो गई.

मैं विस्फारित नेत्रों से उसकी बात सुन रही थी. मेरी आंखों में आंसू आ गए. मैंने उसे गले लगाते हुए कहा, “नहीं, अब तू बिल्कुल नहीं सहेगी. हमारा हर तरह से तुझे सपोर्ट है. लव मैरिज में भी तो ग़लत चॉइस हो सकती है, इतना क्यों सोचना. तुझे तो बहुत पहले यह ़फैसला ले लेना चाहिए था. तूने कभी बताया नहीं इसलिए हम भी कुछ सोच नहीं पाए. खैर देर आए दुरुस्त आए. तेरी सास अपने बेटे के एंटरटेनमेंट के बारे में जानती हैं इसलिए वह नहीं चाहती थी कि हम तेरे पास आएं, क्योंकि भेद खुल जाने पर हम तुझे तलाफ़ लेने के लिए बाध्य करेंगे तो उनके बेटे का क्या होगा! ग़लती तो उनकी है, जिन्होंने अपने बेटे को संस्कारहीन बनाया है.” यह कहकर मैंने उसे एक छोटे बच्चे की तरह ढेरों प्यार किया. उसके चेहरे पर आत्मविश्‍वास की चमक देखकर मुझे तसल्ली हुई. 

सुधा कसेरा

सुधा कसेरा

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Photo Courtesy: Freepik

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