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कहानी- दर्द या कृतज्ञता (Short Story- Dard Ya Kritagyta)

"...‌ देखो जब तक घर के बाहर रहूं तुम ख़ूब पढ़ना, क्योंकि घर आने के बाद मैं तुम्हें किसी से बंटते हुए नहीं देख सकता. तब तुम्हारे पास कोई किताब मैं सहन नहीं कर पाऊंगा. मैं रहूंगा सिर्फ़ मैं. तुमसे दूर रहने की बात मैं सपने में भी नहीं सह पाऊंगा..."

विचारों में मग्न अपर्णा बहुत देर से छत पर बैठी है. अपना नाम सुनकर चौंक गई, शायद नीचे बैठे उदित ने उसे पुकारा था. उदित उसका पति अपने दोस्त अमर से बातें करते हुए हंस रहा था. शादी से पहले उदित उसके भाई अर्पित का दोस्त था. अर्पित का दोस्त उदित और उदित का दोस्त अमर, इन तीनों दोस्तों की तिकड़ी थी. अर्पित न बहुत शांत और न गंभीर. उसे ऊंचे स्वर में बोलते हुए किसी ने नहीं सुना होगा. अपर्णा भी शांत प्रकृति की ही थी. भाई के साथ उसके दोनों दोस्त आते-जाते थे. अपर्णा का अक्सर चाय-नाश्ते के साथ उनके कमरे में जाना होता था. ऐसा शायद कभी नहीं हुआ कि अमर के चुटकुलों और बात-बेबात ठहाकों में कभी उदित खुलकर हंसे हों. हालांकि अर्पणा बहुत कम बोलती थी, लेकिन जब कभी भी उसका सामना अमर से होता, तो वह उसे हंसाने के लिए फ़ालतू की बक-बक किया करता.

धीरे-धीरे अपर्णा भी भाई के दोस्तों से घुलने-मिलने लगी. कारण भी था, उसकी और अर्पित की उम्र में बस एक ही वर्ष का अंतर था. वह यूनिवर्सिटी में भी अर्पित से एक वर्ष पीछे थी. अर्पित, अमर और उदित बीए द्वितीय वर्ष में थे और वह प्रथम वर्ष में. घर पर जब तीनों दोस्तों की बैठक होती तो अपर्णा भी उसमें शामिल होती.

उसे याद आने लगे वो दिन जब सरकारी नौकरी में गजटेड पोस्ट के अधिकारी उसके पापा, यहां तबादला होकर आए थे. अर्पित बीए प्रथम वर्ष में था और वह इंटर में. एक वर्ष एडजस्ट होने और पढ़ाई पूरी करने में निकल गया. मां के न होने से अपर्णा को पिता और भाई का ध्यान एक गृहिणी की तरह रखना पड़ता था. अपर्णा ने यूनिवर्सिटी पेडमीशन ले लिया. अर्पित पहले से ही वहां का स्टूडेन्ट था. इन तीनों दोस्तों की तिकड़ी में अपर्णा भी यूनिवर्सिटी में आने के बाद शामिल हो गई थी.

मां के न होने के कारण चौकड़ी अपर्णा के घर ही जमती. अपर्णा को आज भी यह सोचकर आश्चर्य होता है कि उसका स्वभाव तो उदित से मिलता था, लेकिन वह आकृष्ट अमर की तरफ़ हुई थी. अमर में थी भी ग़ज़ब की आकर्षण क्षमता. औसत कद, सिर पर हल्के घुंघराले बाल और उत्तम स्वास्थ्य. वह सभी लोगों में जल्दी घुल-मिल जाता था. बात-बात पर हंसने से उसकी सरलता झलकती थी. बात कितनी भी गंभीर हो वह उसे चुटकुले की तरह पेश करता.

कभी-कभी पापा भी उस चौकड़ी में शामिल हो जाते और अमर के ठहाकों का आनंद लेते. भरी जवानी में पत्नी के गुज़र जाने के बाद अपना सारा स्नेह उन्होंने अपने दोनों बच्चों पर लुटाया. बच्चे भी पापा तक ही सीमित थे. तीन सदस्यों के इस छोटे से परिवार में ये दो सदस्य कब जुड़कर परिवार का हिस्सा बन गए कोई नहीं जान पाया.

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पापा निःसंदेह उदित की ओर आकृष्ट थे. उदित उन्हें अपर्णा की ही तरह शांत और गंभीर लगता, लेकिन अपर्णा के मन को तो अमर अच्छा लगा. शीघ्र ही वे दोनों भावी जीवन के सपने बुनने लगे.

"अपर्णा तुम्हें पढ़ना बहुत अच्छा लगता है न, देखो मैं जब तक घर के बाहर रहूं तुम ख़ूब पढ़ना, क्योंकि घर आने के बाद मैं तुम्हें किसी से बंटते हुए नहीं देख सकता. तब तुम्हारे पास कोई किताब मैं सहन नहीं कर पाऊंगा. मैं रहूंगा सिर्फ़ मैं. तुम्हारे हाथों में, आंखों में और मन में. तुमसे दूर रहने की बात मैं सपने में भी नहीं सह पाऊंगा." उसकी आंखों में झांकता अमर बोले जा रहा था और वह शर्म से लाल मुस्कुरा रही थी. अमर की यही बक-बक तो उसे अच्छी लगती थी.

परंतु विधाता को उनके भावी जीवन के सपने और योजनाएं पसंद नहीं आई, तभी तो उसकी शादी अमर से न होकर उदित से हुई. अर्पित तो पहले से ही विदेश में था. अमर भी विदेश चला गया. याद है अपर्णा को कि कैसे पापा को दिल का दौरा पड़ा था तब उदित ने ही सारी दौड़भाग की थी. अर्पित विदेश में था, पापा की बीमारी की बात जानकर भी वह आ नहीं सका और अपर्णा पापा की अंतिम इच्छा को ठुकरा नहीं पाई.

नीचे से आती बातों और ठहाकों की आवाज अपर्णा को वापस उसी दुनिया में ले आई. उदित से उसकी शादी के बाद भी अमर बीच-बीच में आता रहा. लेकिन इस बार वह पूरे चार साल बाद आया है. दोनों मित्र पुरानी यादों में खोए कभी बात करते हैं और कभी ठहाका लगाते हैं.

घर का नौकर रामू आज छु‌ट्टी पर है, यह ध्यान आते ही अपर्णा नीचे उतरने लगी. अमर की पसंद का खाना वैसे भी वह ख़ुद ही बनाना चाहती है. वह किचन में ही थी कि अमर की घबराई हुई आवाज़ सुनकर ड्रॉइंगरूम में दौड़कर आ गई. उदित अपनी छाती पर हाथ रखे तड़प रहे थे. शायद उन्हें माइनर हार्ट अटैक हुआ था. अमर पानी दवा, डॉक्टर के लिए चिल्ला रहा था. फोन ख़राब था. घर में नौकर नहीं.

अमर ने दौड़कर टैक्सी बुलाई और उदित व अपर्णा को लेकर तुरंत अस्पताल पहुंचाया. दो दिन की भागदौड़ और परिश्रम के बाद आज उदित को होश आ गया. अपर्णा दो रातों की जागी थकी और परेशान थी. अमर ने अपर्णा को घर जाने के लिए कहा, लेकिन उदित ने दोनों को ही घर जाने के लिए कहा कि तुम दोनों ही तीन दिन के थके परेशान हो. अब तो रामू आ गया है. तुम लोग घर जाकर थोड़ा आराम कर लो. रात को रामू यहां रह जाएगा. उसने अधिकार का प्रयोग करते हुए अपर्णा को अमर के साथ घर जाने को कहा.

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अमर और अपर्णा घर आ गए. उसने समीप बैठकर अपर्णा के कंधे पर हाथ रखा.

"अपर्णा तुम बहुत परेशान हो रही हो थोड़ा आराम कर लो." अपर्णा चुपचाप उसके कंधे से सट गई. अमर उसके बालों में उंगलियां फिराने लगा. आंखें बंद किए हुए अपर्णा का चेहरा उसे प्यारा लगने लगा. स्मृतिपटल पर सात-आठ वर्ष पहले की यादें ताज़ा होने लगीं, "मैं तुम्हें किसी के साथ बंटने नहीं दूंगा..." अपर्णा की आंखों से दो बूंद आंसू ढुलककर उसके गालों पर आ गए. अपने गालों से अपर्णा के गाल सटा लिए. अपर्णा ने भी अमर की छाती में सिर छुपा लिया, जैसे उसे युगों के बाद ऐसी शांति मिली हो.

अगले दिन सुबह सब प्रकृतिस्थ था. अमर के साथ अपर्णा सुबह ही अस्पताल आ गई, लेकिन एक तूफ़ान आकर गुज़र चुका था, अपर्णा, अमर और उदित पर भी.

पंद्रह दिन बीत गए, उदित स्वस्थ होकर घर आ गए. अमर भी अमेरिका वापस चला गया. आज अमर को गए हुए भी एक माह बीत गया था. लॉन में बैठे उदित उसकी सेवा भावना की प्रशंसा कर रहे थे. उसकी ओर देखकर बोले, "मेरी बीमारी के कारण तुमने अपना ध्यान नहीं रखा. तुम्हारा चेहरा पीला पड़ गया है, दुबली भी लग रही हो." अपर्णा चौंक गई लेकिन तुरंत संभलते हुए बोली, "हां उदित, मैं भी सोच रही हूं, अब सारे चेकअप करा लिए जाएं." अपनी कुर्सी से उठकर उदित अपर्णा के पास आ गया, "ओह अपर्णा, सचमुच? इतने दिन बाद आख़िर भगवान को भी मुझ पर रहम आ गया." उसने अपर्णा का हाथ पकड़कर चूम लिया.

नए प्राणी के आगमन की ख़ुशी में दोनों का मौन मुखरित हो उठा. उसी समय उदित ने नए मेहमान के लिए सारे सपने बुन डाले.

इतने सालों बाद घर में ख़ुशी आई थी, लेकिन विधाता को न जाने क्या मंज़ूर था. उदित बेहद ख़ुश और सुंदर भविष्य के सपने चुनता हुआ घर पहुंचने की ललक में अपनी मोटर साइकिल दौड़ा रहा था कि अचानक संतुलन खो बैठा और एक कार से टकरा गया. घर पर ख़बर आई. अपर्णा बदहवास पागल सी हो गई. उसकी आंखों में दो महीने पहले वाला मंज़र घूम गया. अभी तो उदित की कमजोरी भी दूर नहीं हुई. उफ् भगवान ये क्या हो गया. इस बदहवासी में उसने सबसे पहले अमेरिका फोन लगाया, अमर से बात करते हुए वह रोने लगी, "आ जाओ..." के अलावा उससे कुछ बोलते नहीं बन रहा था. उसने यह भी नहीं सोचा कि अभी दो-ढाई महीने पहले ही वह वापस गया है. हालांकि अपर्णा का भाई भी है, लेकिन उसका होना न होना बराबर ही है. क्योंकि उसने विदेशी लड़की से शादी करके वहीं की नागरिकता ग्रहण कर ली है. बहन से तो उसका रिश्ता टूट सा चुका था.

उदित बहुत ज़्यादा घायल हो गया था. डॉक्टरों ने अपर्णा को समझाते हुए बताया था कि अब यह पिता नहीं बन सकेंगे. न जाने कैसे उदित भी यह बात जान गए थे, परंतु संतान के आगमन की सूचना ने उदित को उतना घायल नहीं किया जितना इस वंचित सुख पर होते. एक हफ़्ते में अमर भी आ गया. अमर बड़ी तन्मयता से मौसंबी का रस निकाल रहा था और उदित मुग्ध देख रहे थे, वह कृतज्ञता से बोले, "अमर तू हमारे लिए देवदूत है."

"अरे यार भगवान पर भरोसा रख, वह सब ठीक करता है. उसकी बिगाड़ी में भी हमारी बनी होती है."

"सच मान अमर, अगर अपर्णा प्रेग्नेंट न होती तो में इस ऐक्सीडेंट में जीकर भी मर जाता. मैं उसे बहुत प्यार करता हूं. अगर ये ऐक्सीडेंट तीन महीने पहले हो जाता, तो मैं आत्महत्या कर लेता." उसकी आंखों की कोर आंसुओं से भीग गई.

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"कैसी बात करता है, तू पागल हो गया है क्या? हमारे लिए सबसे बड़ी बात है कि तू बच गया. अपर्णा का सिंदूर सलामत है. मेरी तो ऊपर वाले से यही प्रार्थना है कि तुझे, अपर्णा और बच्चे के साथ हंसता-खेलता हुआ मैं देखूं. फ़ालतू बातें मत सोचा कर, यह तो नियति का खेल और भाग्य का विधान है."

"तू ठीक कहता है अमर कभी-कभी विधाता भी अजीब तरीक़े से विधान रचता है. अच्छा एक बात बता, तूने शादी क्यों नहीं की? क्या तुझे साथी की कमी नहीं लगती? यहां या अमेरिका कहीं कोई लड़की पसंद नहीं आई?"

"तू तो इतने प्रश्न एक साथ कर रहा है, समझ ले तूने की तो मैंने की. अब इस उम्र में एक अधेड़ को अपनी लड़की कौन देगा. कहते हैं न, जोड़े ऊपर वाला बनाता है, जब उसी ने नहीं बनाया तो मैं क्या कर सकता हूं."

"तू सच कह रहा है, सब कुछ ऊपर से ही लिखा आता है. सोच इतने बरसों से हम लोग बच्चे का इंतज़ार कर रहे थे और जब वो घड़ी आई, तो ये कांड हो गया. शायद मेरे भाग्य में एक ही बच्चे का सुख था."

"तो तूने क्या क्रिकेट टीम बनाने की सोची थी. देख एक सूरज है एक चांद है, एक ही बच्चा सारे बच्चों की कमी पूरी कर देगा. देश को तरफ़ भी तो देख, पढ़े-लिखे लोग भी जब दस-बारह बच्चे पैदा करेंगे तो कल ज़मीन पर आदमी कीड़े की तरह बिल-बिलाएगा."

जूस निकालना छोड़कर अमर ने कुर्सी की पुश्त पर अपना सिर टिका लिया और आंखे छत पर.

अपर्णा कमरे में आई तो अमर फिर अपनी दुनिया में लौट आया और अपर्णा से बोला, "लो जूस निकालो, पिलाओ प्यार से पति को. यह तुम्हारा काम है. कल यहां से छुट्टी मिल जाएगी फिर दो-तीन दिन में मैं भी जाने वाला हूं."

"अरे नहीं यार यह तो मेरा ख़ूब ध्यान रखती है, अब तो मुझे इसका ध्यान रखना है."

अमर शोखी से बोला, "हां-हां अपना ध्यान रखा करो, हम सब की आशाएं बच्चे पर ही टिकी हैं. मुझे बेटे का चाचा बनना है." बोलते बोलते अमर ने अपर्णा की तरफ़ देखा, अपर्णा की आंखें बरसने को आतुर थीं.

"किस मिट्टी का बना है यार. तूने कभी पाने की इच्छा ही नहीं की. कुछ पाना चाहा ही नहीं."

लेकिन अमर अभी भी अपर्णा की तरफ़ देख रहा था. एकांत क्षणों की अनुभूति सी उस रात की बातें अमर को झकझोर रही थीं. अपने तमाम सूनेपन के बदले मिला उन अनमोल क्षणों का सुख वह कैसे भूल पाएगा. अपर्णा की आंखों की गहराई में उसे इतना कुछ मिल गया है कि दुनिया के सब सुख छोटे हो गए हैं. इस प्यार के क्षण की सुरक्षा में उसे कुछ भी करना पड़े वह पीछे नहीं हटेगा और तीन दिन बाद अमर वापस लौट गया.

लॉन चेयर पर बैठी अपर्णा पत्रिका पढ़ रही थी. लॉन पर उदित और उत्कर्ष एक-दूसरे को पकड़ने का खेल खेल रहे थे. उत्कर्ष का भागते हुए तोतली बोली में कुछ बोलना अपर्णा को अच्छा लग रहा था. वह कभी-कभी नज़रें उठाकर देख लेती थी. अमर जब पटर-पटर बातें करता था तब भी उसे इसी आनंद की अनुभूति होती थी. अचानक उत्कर्ष ने उदित के बाल पकड़ लिए, "देखो अपर्णा, तुम्हारा बेटा तो मेरे रहे-सहे बाल भी नोंच देगा."

अपर्णा ने उठकर उत्कर्ष की मु‌ट्ठी खुलवाई और बोली, "आपने भी इसे सिर पर चढ़ा रखा है. इसमें मेरा क्या दोष."

"एक ही तो हैं. इसे जन्मसिद्ध अधिकार है, सब कुछ करने का. चाहे बाल नोचें या..."

अपर्णा ने ध्यान से देखा उत्कर्ष के सिर पर घने और घुंघराले बाल थे. बालों का स्टाइल देखकर अपर्णा को कुछ भूला सा याद आ गया. अमर के बालों से उत्कर्ष के बालों का स्टाइल कितना मिलता था.

"मेरे भी बचपन में इतने घने बाल थे, मां बताती या मुझे." उदित ने अपर्णा से कहा.

लेकिन अपर्णा तो कुछ और सोचने लगी थी. उदित की बात वह सुन नहीं पाई. उसने उत्कर्ष को अपनी गोद में बैठाने की चेष्टा की, तोतली भाषा में वह बकर-बकर न जाने क्या बोलने लगा और अचानक चुप होकर हंसने लगा. अपर्णा पत्ते सी कांप गई. उस रात की बात कलेजा बेधने लगी. उसी रात के अनमोल क्षणों का परिणाम था उत्कर्ष. उसे पहले केवल संदेह था, लेकिन अब उत्कर्ष की बातें सदेह को विश्वास में बदलने लगी थीं.

उस ऐक्सीडेंट के बाद जब डॉक्टर ने बताया था कि उदित अब पिता नहीं बन सकेंगे, तब उदित ने उत्कर्ष की आशा में अपना दुख भुला दिया था. अपनी सारी मुहब्बत, सारा प्यार अपने इकलौते बेटे पर लुटाते वह ख़ुश थे. उस पुत्र से जो उनका नहीं था. अगर यही बात उदित जान जाएं तो कल्पना मात्र से ही सिहर उठी वह. लेकिन अमर तो उत्कर्ष को देखते ही पहचान जाएगा कि वह उसी का बेटा है, तब क्या वह अपने पितृ स्नेह पर काबू रख पाएगा?

उसे विश्वास था कि अमर जान कर भी यह बात कभी मुंह पर नहीं लाएगा, लेकिन वह कैसे सामना कर पाएगी अमर की प्रश्न करती आंखों का?

अभी कल ही तो अमर की चिट्ठी आई है, वह इस महीने में कभी भी आ सकता है.

उदित को नई कार लेनी थी, लेकिन वह कहते हैं अमर आने वाला है उसके साथ ही सेलीब्रेट करना है इस ख़ुशी को.

कहानी

अमर के आने की ख़ुशी थी या भय, अपर्णा की आंखों से नींद उड़ गई थी.

निश्चित समय पर अमर आया. अपर्णा उसे लेने एयरपोर्ट पर नहीं जाना चाहती थी. उदित सुबह से ही शोर मचाए थे, "तुम और उत्कर्ष जल्दी तैयार हो जाओ." कई बार उसने सोचा कि वह उदित से स्पष्ट मना कर दे. परंतु न चलने का कारण उदित ने पूछा, तो वह क्या जवाब देगी? बेमन से तैयार हुई. उसकी ओर देखते ही उदित बोले- "ये कौन-सी साड़ी पहनी है? वह क्यों नहीं पहनी, जो पिछली बार अमर तुम्हारे लिए लाया था. कितना अच्छा लगेगा उसे देखकर, अभी समय है तुम साड़ी बदल लो."

साड़ी बदल कर वह आई और तीनों समय से कुछ पहले ही एयरपोर्ट पहुंच गए. अपर्णा की घबराहट बढ़ती जा रही थी. उदित ने एक बार पूछा भी था कि तबियत ठीक नहीं है, अपर्णा ने टाल दिया.

जैसे ही प्लेन के आने की घोषणा हुई अपर्णा कांप गई. अमर दूर से ही हाथ हिलाता, हंसता हुआ लगभग भागता सा आया. सबसे हेलो कहते हुए उत्कर्ष को गोद में उठाकर चूमने लगा, अपने पुराने अंदाज़ में ही मस्त उत्कर्ष से बतियाता हुआ चल रहा था. लगता ही नहीं था कि यह उन दोनों की पहली मुलाक़ात है. उदित ने झुंझला कर कहा भी था, "लगता है तू तो इसी से मिलने आया है."

"हां-हां में अपने बेटे से मिलने आया हूं." उदित तो सामान्य रहे, लेकिन अपर्णा चौंक गई.

चारों घर आए. यंत्रवत सब काम करती अपर्णा की आवाज़ तभी सुनाई पड़ती जब वह किसी काम के लिए रामू को आवाज़ देती. डाइनिंग टेबल पर सभी साथ बैठते तो अमर और उत्कर्ष की ही बक-बक चालू रहती.

एक दिन नाश्ते में गाजर का हलवा देखकर अमर चहक उठा, "वाह! मज़ा आएगा. खाने का मज़ा तो भारत में ही है. अपर्णा तुम्हें अब भी मेरी पसंद याद है?"

अपर्णा कुछ बोलती कि उससे पहले ही उत्कर्ष बोल पड़ा, "अंकल ये आपकी पसंद नहीं, मेरी पसंद है." चौंककर अपर्णा ने अमर की ओर देखा. अमर अपर्णा की आंखों में झांकने लगा. घबरा गई थी अपर्णा. वह तो समय पर उदित आ गए और जल्दी ही नाश्ता शुरू हो गया.

अमर की पसंद का रंग चयन कर कार ख़रीदी गई और फिर सब पिकनिक मनाने गए. प्राकृतिक वातावरण में झरने के किनारे उन लोगों ने खाया-पिया. उत्कर्ष झरने के किनारे जाने की ज़िद करने लगा. उदित उसे लेकर चले गए, अमर और अपर्णा अकेले रह गए. अभी तक अपर्णा अमर से अकेले में नहीं मिली थी. जब-जब ऐसी परिस्थिति आई तो अपर्णा ने टाल दी. आज दोनों आमने-सामने थे लेकिन लंबी ख़ामोशी थी.

वातावरण की शांति भंग करते हुए अमर ने ही कहा, "अपर्णा कोई बात है, जो तुम्हें परेशान किए हुए है." अपर्णा ने कोई उत्तर नहीं दिया.

"तुम न बताओ पर, मैं जानता हूं कि तुम मुझसे घबरा रही हो. मैं उत्कर्ष को देखते ही पहचान गया था. तुम्हारी घबराहट का कारण भी यही है. अपर्णा मैंने तुम्हें प्यार किया है, परेशान नहीं करूंगा. उत्कर्ष तुम्हारा है, तुम दोनों का है. मैं तो पहले भी खाली हाथ रह गया था और आज एक बार फिर रह जाऊंगा तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा. सुनो अब जाने के बाद मैं तुम्हें परेशान करने नहीं आऊंगा, लेकिन तुम्हें ख़ुद मर कर भी प्यार करता रहूंगा. मेरी आत्मा भी तुम्हें ख़ुश देखना चाहेगी. उस एक बात को भूल जाओ अपर्णा."

दो बूंद आंसू अपर्णा की आंखों से गालों पर छलक आए, लेकिन अमर ने उन्हें पोंछा.

उदित ने आते ही पूछा, "तू और चुप, ये आश्चर्य कैसे?"

अमर के बोलने से पहले ही उत्कर्ष ने कहा, "पापा आप नहीं जानते हैं, दोनों मेरे बारे में सोच रहे थे. मैं नहीं था न फिर बकर-बकर कौन करता." शाम को सब घर आ गए.

पंद्रह दिन बाद अमर वापस चला गया. चलते समय उसने उत्कर्ष को बहुत प्यार किया. अपने से भींचकर उसे चूमता रहा. अमर की आंखें भर आईं. सबसे नज़रें बचाकर आंसू पोंछकर हाथ हिलाता वह आगे बढ़ गया.

कुछ दिन बाद आधी रात के बाद फोन की घंटी घनघना उठी. फोन उदित ने उठाया, "हेलो हां कैसे-कब?"

किसी अज्ञात आशंका से अपर्णा भी डरने लगी. उधर से बताया गया कि पिछले कई दिनों से अमर बहुत परेशान थे. शायद हृदय पर दबाव पड़ने के कारण हार्टफल हो गया.

उदित चिल्लाए, "अपर्णा अमर नहीं रहा..." आगे के सारे शब्द उदित के रुंधे स्वर में घुल गए.

एक लंबी सांस खींच कर अपर्णा ने आंखें बंद कर लीं. सोते हुए उत्कर्ष को उठाकर सीने से चिपका लिया. बंद आंखों से ढुलकते हुए आंसू उसका तकिया भिगोने लगे. अपर्णा ख़ुद नहीं जानती थी कि उसके ये आंसू दर्द के हैं या कृतज्ञता के.

- मधु सक्सेना

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