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कहानी- परदेसी (Short Story- Pardesi)

मेरा भारत, सपनों का भारत बन कर रह गया है. मेरा वह कस्बा, वहां की टेढ़ी-मेंढी गलियां सब मुझसे छूट गए हैं. इस पराई धरती पर में घुट कर ही रह जाऊंगा.

आज मुझ पर 'धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का' वाली लोकोक्ति चरितार्थ हो रही है, मेरा यह त्रासद जीवन मुझे संत्रस्त कर रहा है. बारह वर्ष पहले साह अंकल ने मुझसे कहा था, "मनु बेटे तू चिंता न कर! वहां तू साल-छह महीने में ही मालामाल होने लगेगा, तेरे परिवार की सारी ग़रीबी छूमंतर हो जाएगी."

"नहीं, साहजी." मां ने हाथ हिला कर मनाही कर दी थी. "मुझे अपने मनु को कहीं भी नहीं भेजना है, वह यहीं ठीक है."

"वाह बहन जी..." चालाक चतुर साह अंकल भी तो मां को बरगलाने लगे थे, "आप भी कैसी बातें करती हैं. लोग तो विदेश जाने के लिए तरसते हैं.

और आप हैं कि..."

"देखो भैया!" मां गंभीर हो आई थी, "अपना देश, अपना ही हुआ करता है. पराए देश में परदेसी बन कर जीना भी कोई जीना होता है?"

"परदेसी रह कर भी आदमी करोड़ों कमा सकता है." उन्होंने कंधे उचका दिए थे, "विदेशों में काम की कोई कमी नहीं है. वहां तनख़्वाह भी तो यहां से कई गुना अधिक होती है और फिर कनाडा तो सोने की चिड़िया है."

"क्यों मनु!" पापा की आंखों में लालच के बादल छा गए थे, "तू क्या कहता है?"

"अंकल ठीक कहते हैं पापा." मैंने भी तो उन्हीं का समर्थन कर दिया था.

"साल-दो साल की ही तो बात है. मैं कौन सा वहां हमेशा रहने के लिए जा रहा हूं?"

पापा और मेरे समझाने पर मां मुझे यहां भेजने पर सहमत हो आई थी. उसने गहरा उच्छवास भर कर कहा था, "ठीक है जी, मर्द बच्चा कहीं भी आ-जा सकता है."

हमारे कस्बे के शंकर साह वर्षों पूर्व कनाडा में बस गए थे, वहां उनका बेकरी का व्यवसाय था. वे पापा के लंगोटिया यार थे. यहां की सारी संपत्ति को बेच-बाच कर वे सपरिवार कनाडा चल दिए थे. मांट्रियल में उन्होंने छोटी-सी बेकरी खोल ली थी. पापा को वे पत्र भेजते रहते थे. एक दिन पापा ने उन्हें मेरी बेरोज़गारी की दास्तान लिख भेजी थी. इस पर उन्होंने लिखा था कि इस बार भारत आने पर वे मुझे भी अपने साथ ही ले जाएंगे.

मैंने एम.ए. के बाद कंप्यूटर साइंस में डिप्लोमा कर लिया था. इधर-उधर हाथ-पांव मारने पर भी मुझे कोई जॉब नहीं मिल पा रहा था. उधर, मां-पापा को छोटी बहन के विवाह का घुन चाटता जा रहा था. वह भी तो पहाड़ ही बनती जा रही थी. मां-पापा हर समय ही साह अंकल का गुणगान करते रहते थे.

साह अंकल से मैं भी तो बड़ी-बड़ी उम्मीदें रखने लगा था. मित्रों के बीच में अक्सर ही कनाडा के चर्चे करता रहता, मित्र कहते कि कनाडा जाकर तुम्हारे दोनों ही हाथों में लड्डू होंगे.

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"वो कैसे भई?" मैं पूछता.

"वहां नौकरी और छोकरी दोनों ही मिल जाएंगे." कहकर वे ज़ोर के ठहाके लगा देते. दिनभर भटकने के बाद शाम को जब मैं घर आता, तो वहां कनाडा की ही चर्चा चलती रहती. एक दिन मां ने पापा से पूछा था, "क्यों जी, साहजी कहीं हमें दिन दोपहरी के सपने तो नहीं दिखला रहे हैं?"

"नहीं भई." पापा मुस्कुरा दिए थे.

"शंकर मेरा लंगोटिया यार रहा है. वह हमें धोखा नहीं दे सकता." और एक दिन जब साह अंकल का पत्र आया तो हमारा परिवार ख़ुशी के मारे फूला न समाया था. वे दो महीने के लिए भारत आ रहे थे. उन्होंने लिखा था कि वहां उन्होंने मेरी नौकरी की भी बात पक्की कर ली है. मुझे वे अपने साथ‌ले जाएंगे.

साह अंकल के आने पर हमने उनका पुरज़ोर स्वागत किया था. उन्होंने पापा के आगे सारी योजना रख दी थी. मां मुझे विदेश भेजने पर अगर-मगर करने लगी थी. तीन घंटे हमारे यहां रहने के बाद अंकल उठ खड़े हुए थे, "गणपत भाई, आप लोग अच्छी तरह से सोच लेना. रात को मैं यहीं आऊंगा."

"अजी सोचना क्या है?" पापा ने कह दिया था, "मनु भी तो आपका ही बेटा है. उसके लिए आप क्या कमी करेंगे."

तभी तो साह अंकल ने कंधे उचका दिए थे, "मैंने सारी बात पक्की कर ली है. इसे वहां तीन हज़ार डॉलर महीने के मिला करेंगे यानी कि नब्बे हज़ार रुपए माहवारी."

मैं चमत्कृत हो आया था. अपने यहां जितना साल में भी नहीं कमाया जाता है, परदेस में वह एक ही महीने में कमा लूंगा. मन ही मन मैं लड्डू फोड़ने लगा था. मैं कनाडा जाने की तैयारियां करने लगा था.

अंकल बोले थे, "वो ऐसा है, गणपत भाई मनु के पासपोर्ट वीजा में दो तीन महीने तो लग ही जाएंगे. मैं वहां पहुंच कर इसकी नौकरी के काग़ज़ात भिजवा दूंगा."

“किराए के रुपए कितने लगेंगे?" मां ने पूछा था.

"यही कोई पैंतीस हज़ार."

"पैंतीस हज़ार?" मां उन्हें फटी-फटी आंखों से देखने लगी थी.

इस पर साह अंकल ने मां को बीस हज़ार रुपए थमा दिए थे, "इस समय तो मेरे पास इतने ही हैं. बाकी रकम में वहां पहुंचने पर भेज दूंगा."

पापा ने पूछा था, "इतनी बड़ी रकम हम लोग कहां से दे पाएंगे?"

"मैं मनु की तनख्वाह में से काट लूंगा." उन्होंने कहा था.

हमें लुभावने सपने दिखलाकर साह अंकल कनाडा चल दिए थे. मेरे लिए तो एक-एक दिन काटना कठिन होने लगा था. तन से मैं भारत में रहता किंतु मन कनाडा में ही भटकता रहता था. तीन महीने में मेरा पासपोर्ट आदि सब कुछ बन गया था. हमें साह अंकल के पत्र का इंतज़ार था. एक दिन सचमुच ही मेरी नौकरी के काग़ज़ात आ पहुंचे थे.

और तब स्वदेश से उड़कर मैं इस पराए देश में आ पहुंचा था. पराई धरती, पराए लोग, एक पखवाड़े तक मैं साह अंकल का ही मेहमान बना रहा था. उनके परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटा और एक बेटी थी. राहुल स्थानीय अस्पताल में डॉक्टर थे. रति उन दिनों पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही थी.

"मनु!" एक दिन रति ने मुझ पर मोहक मुस्कान बिखेर कर पूछा था, "कनाडा कैसा लगा?"

"स्वर्ग की धरती." मैं उस पराए मुल्क का गुण गान करने लगा था, "अगर ज़मीं पर स्वर्ग है, तो यहीं है."

सचमुच में यहां सभी भौतिक सुख-सुविधाएं उपलब्ध हैं. यहां के समाज में कोई भी छोटा-बड़ा नहीं होता. सभी काम करते हुए मौज मस्ती का जीवन बिताते हैं. खाने-पीने की कोई कमी नहीं है. सभी तो टिन फूड लिया करते हैं. आरंभ में मुझे यह सब अच्छा लगा था. किंतु धीरे-धीरे मुझे उस स्वर्ग में दरारें दिखाई देने लगी थीं. अपने देश की तुलना में यहां अनेक प्रकार की खामियां नज़र आने लगी थीं. यहां विवाह को एक सामाजिक समझौते के रूप में लिया जाता है. स्त्री-पुरुष वस्त्रों की भांति अपने जीवनसाथी बदला करते हैं. संयुक्त परिवार की तो यहां कल्पना तक नहीं की जा सकती.

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साह अंकल ने मुझे एक बैंक में नौकरी दिलवाई थी. वेतन तीन हज़ार डॉलर प्रति माह था. मैं उस परिवार से कहीं अलग रहना चाहता था. किंतु वे लोग मुझे अपने ही यहां रहने का आग्रह किया करते थे. दो-तीन महीने में रति ने मुझे बहुत से भारतीयों से मिलवा दिया था. सप्ताहांत में दो दिन की छुट्टियां हुआ करती हैं. उनमें में साह अंकल के बेटे और बेटी के साथ दूर-दूर के नगरों में रह रहे अप्रवासियों से मिल लिया करता था. वहां के अप्रवासी सप्ताहांत की छुट्टियों में एक-दूसरे को दावतें दिया करते थे.

"तो आप भी यहां आ फंसे?" एक पंजाबी युवक ने किसी पार्टी में मेरे कान में कहा था. "इसमें फंसने की क्या बात है मित्र?" मेरी आंखें उसे घूरने लगी थीं बार-बार.

"सब पता चल जाएगा बादशाओ." उसने मेरा कंधा थपथपा कर कहा था, "वो कहते हैं न कि कैद में है बुलबुल, सैय्याद मुस्कुराए, रहा भी न जाए और सहा भी न जाए."

"मैं तो यहां दो-एक वर्ष के लिए ही आया हूं." मैंने उस युवक से कहा था.

"यहां कुछ कमा कर मैं अपने परिवार का उद्धार करना चाहता हूं."

"यह सब भ्रम है प्यारे।" युवक मुस्कुरा दिया था. "पेट काट कर भी कुछ बचाओगे तो भी नहीं बचा पाओगे,व. यहां की सोने की चिड़िया के पंख नोचने टेढ़ी खीर है."

खैर मैंने कह दिया था, "जो होगा, देखा जाएगा, ओखली में सिर दिया है तो मूसल से क्या डर?"

साह अंकल का व्यवसाय अच्छा चल रहा था. उनके बेकरी का माल भारतीय बहुल नगरों में जाया करता था. वहां रहने वाले सभी भारतीयों में वे ताऊजी के नाम से जाने जाते थे. अपने घर में वे मुझे पुत्रवत स्नेह दिया करते थे. रति को भी वे मुझसे मिलने का अधिक से अधिक अवसर दिया करते थे.

एक उम्र होती है जब हम सब फिसलने लगते हैं. साह अंकल भी तो मुझे उसी फिसलनभरी राह पर धकियाते जा रहे थे. रति ने मुझ पर ऐसे डोरे डाले कि जल्द ही मैं उसका दीवाना होने लगा था. हमारे पांव कुछ ज़्यादा ही खुलने लगे थे.

भारत से मां-पापा बराबर मुझे अपनी ग़रीबी का एहसास करवाते रहते थे. मैं भी उन्हें समय-समय पर धन भेजता रहता. मां ने मेरे लिए उसी कस्बे की एक अच्छी लड़की पसंद कर ली थी. हर पत्र में उसका आग्रह होता कि मैं भारत आकर अपना विवाह कर लूं. एक दिन अपनी यह परेशानी मैंने साह अंकल को बता दी थी. सुनकर वे मुस्कुरा दिए थे.

"तुम्हारी मां बहुत भोली है, उस बेचारी को तो सतयुग में जन्म लेना चाहिए था."

"ऐसी क्या बात हो गई?" मैंने चौंक कर पूछा था.

"अरे भई." उनका हाथ मेरे कंधे पर आ लगा था. "तुम्हें रति भी तो चाहती है न."

"जी!" मेरी गर्दन झुक गई थी.

"अपने माता-पिता को मना कर दो." उन्होंने कहा था.

"हां, रुपए-पैसों से उन्हें तोल दो. कम पड़े तो मुझसे ले लो. बोलो, कितने डॉलर..."

"जी, इसकी ज़रूरत नहीं है." मैंने उनके आगे हाथ पसारना ठीक नहीं समझा था.

साह अंकल और उनके परिवार ने सचमुच मुझे बुलबुल बनाकर रख दिया था. रति और मैं भी तो सीमाओं का उल्लंघन था, "मनु ऐसा करो कि अपने मां-पापा को भी करने लगे थे. एक दिन साह अंकल ने कहा यहीं बुलवा लो."

"ठीक है." मैं उनसे सहमत हो आया था.

मैंने माता-पिता के लिए हवाई जहाज के टिकट भेज दिए थे और तीन महीने बाद वे यहीं चले आए थे.

"आइए, समधी साहब." साह अंकल ने पापाजी का पुरज़ोर स्वागत किया था.

"समधी!" सुन कर मां तो अवाक् ही रह गई थी.

"हां, समधिन." वे बेशर्मी से हंस पड़े थे.

"हम आप लोगों से मनु का हाथ मांग रहे हैं.”

सुनकर मेरे मां-पापा हतप्रभ रह गए थे. साह अंकल तो कनाडा बुलवा कर मुझे घर जवाई बनाने पर ही तुले हुए थे. फिर विवश होकर मां-पापा को उनकी बात माननी ही पड़ी थी. उसी महीने मेरा और रति का विवाह हो गया था. मेरे मां-पापा यहां महीने भर तक रहे थे. जाते समय पापा ने कहा था, "कभी बहू को लेकर आना, अच्छा."

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"जी पापा!" मेरी गर्दन झुक गई थी.

"अब तो बरखुरदार, तुम दोनों अलग रहो." दूसरे ही महीने साह अंकल ने मुझसे कहा था. "खाओ-पिओ और वैवाहिक जीवन का आनंद लो. इस देश का ऐसा ही रिवाज़ है."

मन मार मैं रति के साथ अपने नीड़ के निर्माण में जुट गया था. यहां काम करते हुए मुझे स्वदेश की याद आती रहती. जब भी मैं स्वदेश चलने की बात करता, रति उसे टाल दिया करती. दिन, महीने और वर्ष भी बीत गए. अब यहां मेरे दो बच्चे हैं. मैं उसी बैंक में अफसर हो गया हूं. रति भी एक विज्ञापन एजेंसी में ऊंचे ओहदे पर है.

परसों ही तो मुझे अपने भानजे कमल का पत्र मिला है. बी.एस.सी. पास करने के बाद वह भी यहीं आना चाहता है. तो क्या उसे भी इस दलदल में फंसाऊं? मैं उसके पत्र का उत्तर नहीं दे पा रहा हूं. उधर, मेरे मां-पापा भी तो बुढ़ापे की कगार पर पहुंच चुके हैं. बहन का विवाह पांच वर्ष पहले ही हो चुका है.

"मनु! ऐ मनु!" कल शाम बाहर से कोई मेरे द्वार पर दस्तक देने लगा था.

द्वार खोलकर मैंने बाहर साह अंकल को देखा था. मेरे मुंह से निकल पड़ा था, "आप?"

"हां." वे सोफे पर बैठकर अपनी मूंछें सहलाने लगे थे, "सोचा, तुम्हारे हालचाल ही पूछता चलूं?"

मुझे उनके आगमन पर ख़ुशी नहीं हुई थी. तभी वे मुझे एक विचित्र सूचना देने लगे थे. "तुम्हें यह जानकर ख़ुशी होगी कि तुम्हें कनाडा की नागरिकता मिल चुकी है."

मेरी अंतरात्मा चीत्कार कर उठी थी. मेरे इर्दगिर्द यह सब क्या हो रहा है? मैंने थूक गटक कर कहा था, "आपने तो मुझे कहीं का भी नहीं रख छोड़ा."

"कैसी बात करते हो." वे गंभीर हो उठे थे.

"और तुम हो कि... यहां के लिए तो लोग तरसते रहते हैं."

"यह तो अपनी-अपनी सोच है." मैं इतना ही कह पाया था.

"खैर." वे उठ खड़े हुए थे.

"तो यहीं के गुण गाया करो."

"तुम्हें सूचित करना था, कर दिया."

साह अंकल चल दिए थे, उसी रुग्ण मनःस्थिति में मैं रति के कमरे में चल दिया था. मैंने उससे कहा था.

कहानी- परदेसी

"पापा ने यह अच्छा नहीं किया. उन्होंने तो मुझे घर जवाई बना कर ही रख छोड़ा है."

"वो क्या होता है?" रति के माथे पर बल पड़ गए थे.

"ग़ुलाम." मैं सिर खुजलाने लगा था.

"यानी कि खरीदा हुआ दास."

मेरा भारत, सपनों का भारत बन कर रह गया है. मेरा वह कस्बा, वहां की टेढ़ी-मेंढी गलियां सब मुझसे छूट गए हैं. इस पराई धरती पर में घुट कर ही रह जाऊंगा.

आज सुबह रति ने मुझसे पूछा था, "मनु, इन दिनों तुम दिन-ब-दिन डूबते से जा रहे हो. क्या बात है?"

"यह सब तुम्हारे पापा की बदौलत हो रहा है." मेरे कथन में व्यंग्य था.

"क्या मतलब?" वह चौंक पड़ी थी.

"उन्होंने हमारी ग़रीबी पर तरस खाकर मुझे धोबी का कुत्ता बना दिया है." मैंने अपने कथन को स्पष्ट किया था.

"ओ डार्लिंग, अपने आपको एडजस्ट कर लो."

"मुझे एडजस्ट करना ही तो नहीं आता न. मैं उस पर झुंझला पड़ा था, "यह मेरे वश का नहीं है, मैं अपनी मातृभूमि को नहीं भुला पा रहा हूं. मैं उसकी गंध के लिए भटक रहा हूं."

"आख़िर तुम चाहते क्या हो?" उसने कुछ रिक्तता से पूछा था.

"मैं यहां से स्वदेश जाना चाहता हूं."

"तुम ऐसे नहीं जा पाओगे."

"तो?"

"तुम्हें बाकायदा मुझे तलाक़ देना होगा." रति ने कंधे उचका कर कहा था, "तभी तुम्हारा मुझसे पिंड छूटेगा."

तलाक़ शब्द से मेरा माथा झनझना उठा था. रति ने तो सहज ढंग से कह दिया था, किंतु मेरे संस्कार उसे स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं.

मैं अपने दो मासूम बच्चों को छोड़ कर स्वदेश चला आऊं. इसे मेरी आत्मा स्वीकार नहीं कर पा रही है. रति के मन की मैं नहीं जानता, संभव है, वह इसे सहजता से स्वीकार कर ले. किंतु मेरा संस्कारित मन, यह सब स्वीकार नहीं कर पा रहा है. आप ही बताइए कि मैं क्या करूं? कहां जाऊं?

- डॉ. शीतांशु भारद्वाज

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