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कहानी- प्यार की जीत (Short Story- Pyar Ki Jeet)

दिशा ने बहुत क़रीब से देखा प्रयाग को, लगा जैसे वह उसमें समा गया है, बहुत ऊंचा हो गया था वह दिशा की नज़रों में. उसे लगा जैसे यही प्यार है. जिसे चाहो, उसे समझ पाओ. दूर रहकर भी मन में समाए रहो. उसके अनकहे को भी समझ कर मान सको, यही तो प्यार है. दिशा ने प्रयाग के चारों ओर अपनी बाहें कस लीं. इस पल को वह खोना नहीं चाहती. यही एक पल उसकी ज़िंदगी का सहारा बन जाएगा.

दिसंबर की सर्द हवाएं मानों सीना चीरकर आरपार निकल जाना चाहती हैं. सांझ कब काली रात में ढाल गई थी पता ही न चला. दूर जलती रोशनियां भीतर के अंधेरे को जैसे और गहरा कर रही थीं, अंधेरा जब मन में हो तो बाहर का उजाला बेमानी हो जाता है. दिशा के मन का अंधकार भी इसी तरह गहरा होता चला जा रहा था. (वह जैसे खुद ही अपने से सवाल कर रही थी-प्यार क्या है? वह जो शिशिर ने किया था, जिसमें प्यार को पाना ही अंतिम लक्ष्य होता है या प्यार वह है जो दिशा ने किया तन-मन घुलाते हुए, अपने सारे सामाजिक दायित्वों को निभाते हुए). भीतर ही भीतर कुछ सुलग रहा था उसके मन में कि ‌वह प्रयाग को नहीं भूल पाई अब तक और आज यह सुलगन जैसे उसके सीने में धधक उठी थी. प्रयाग ने भी तो उससे प्यार किया था. कैसा था यह प्यार जिसने ख़ामोशी की एक लंबी दीवार दोनों के बीच खड़ी कर दी थी. दोनों ही इस दीवार को तोड़ना, इस दीवार को फांदना चाहते थे, लेकिन कहां हो पाया वह सब. वक़्त के धारे में बहते बहते वे सिर्फ़ नियति को ही कोस पाए इसके सिवा और कुछ वश में नहीं था उनके.

और दिशा, देह और मन के दो पाटों के बीच पिसती जैसे अब ख़ुद अपने को गंवा चुकी है. प्रश्न जब अनुत्तरित रह जाते हैं, तब एक अनोखी कसक छोड़ जाते हैं. मन, नित नई परिभाषाएं कल्पना में ढालने लगता है.

एक कल्पना टूटती है तो दूसरी सिर उठाकर खड़ी हो जाती है, पूरी चाहे एक भी न हो, पर आधी-अधूरी इन कल्पनाओं के मध्य एहसास के आईने चटखने लगते हैं. दिशा को तो इस चटखन की चुभन भी चुप रह कर भुगतनी होती है. स्टेटस, प्रेस्टीज, सोसायटी कितने ही ऐसे शब्द हैं, जो हथौड़े की तरह दिशा के कानों में बजते हैं और अपने पीछे छोड़ जाते हैं एक निर्विकार चुप्पी. ब्याह के पंद्रह बरस बीत चुके हैं, पर आज भी दिशा लजाई सी, सकुचाई सी नववधू सी लगती है. शिशिर भी तो यही कहता है तुम आज भी वही हो, वैसी ही भोली, वैसी ही कमनीय, लेकिन अगले ही पल शिशिर को चुप हो जाना होता है. बड़ी-बड़ी आंखें उठाकर दिशा देखती है तो लगता है जैसे वह कुछ पूछ रही है और अनायास ही शिशिर जैसे कटघरे में खड़ा हो जाता है. शिशिर का एक अपराध ही बरसों से उसे हर पल सजायाफ्ता अपराधी सा बनाकर कोड़े बरसाता चला जाता है.

दिशा को पाना ही उसका एकमात्र लक्ष्य था, पर दिशा क्या उसे आज भी पा सकी है? आज भी एक अनचीन्ही सी दूरी उन दोनों के बीच कायम है. दिशा, जो शिशिर के दो हंसते-खेलते बच्चों की मां है, दिशा, जो सुघड़ गृहिणी है, दिशा, जो शिशिर की सहधर्मिणी है, उसके सुख-दुख की संगिनी है, लेकिन इसके आगे दिशा ने अपने को सौ पर्तों के पीछे छुपा रखा है. शिशिर उस लक्ष्मण रेखा को पार करके कभी आगे नहीं बढ़ सका है. शिशिर कल की उस खिलखिलाती, शैतान और बचकानी सी लड़की को अक्सर दिशा में तलाशता था, जो कॉलेज की उसकी संगिनी थी.

वे तीनों दोस्त थे- शिशिर, दिशा और प्रयाग, इस तिकड़ी को तोड़ने की दोस्तों ने लाख कोशिशें की, लेकिन सफल न हो सके. और जब तिकड़ी टूटी तो एक पल में सब ढह गया जैसे, दिशा की मां ने ही सबसे पहले भांपा था. दिशा की नज़रों में प्रयाग के लिए अजीब से रंग थे, जो दिशा न समझ सकी थी, जो दिशा न कह सकी थी, वह मां ने समझ लिया था. पड़ोस में ही रहते थे प्रयाग के मां-पिता. जब मां ने रिश्ते की बात चलाई तो सारे सपने ढह गए दिशा के. उल्टे सिक्के सा फेर दिया प्रयाग की मां ने उसे.

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कहा प्रयाग तो दिशा को बहन जैसी मानता है. पर दिशा की मां को समझने में देर न लगी कि बहन की आड़ में वे साफ़ टरका रही हैं.

दिशा को जब पता चला तो बहुत भड़की वह, "तुम्हें वहां जाने की ज़रूरत क्या थी?" मां जानती थी. ये उसके अहं का प्रश्न था और अहं का प्रश्न उसके तन और मन दोनों को ही तोड़ गया. प्रयाग से मिलना वह टालने लगी थी.

"चलो न मां, हम मामा के यहां चलें." उसने कहा था तब.

मां समझ गई थीं कि जिस मामा के घर जाने से उसने पिता की मृत्यु के बाद तक साफ़ इन्कार कर दिया था, वहां वह यों ही नहीं जा रही है. यह पलायन वह इस शहर से नहीं, अपने आप से कर रही है.

प्रयाग के सामने वह अपने आपको सम्भाल नहीं पाएगी, बिखर जाएगी. यही सोचकर वह उससे दूर चली जाना चाहती है, वे इसे समझ रही थीं.

मामा ने मां-बेटी को बहुत लाड़ से रखा. दिशा उनके प्यार में अगला-पिछला भूलकर फिर से पढ़ाई में जुट गई.

तभी दोनों को तलाशता शिशिर पहुंचा. मां और मामा की पारखी निगाहों ने समझ लिया था कि यह तलाश यों ही नहीं है, शिशिर की आंखों में बरसता नेह का सागर मां को आश्वस्त कर गया.

आखिर सब सोच-समझ कर उन्होंने तय किया कि दिशा का ब्याह शिशिर के साथ कर दिया जाए, दिशा कुछ न कह सकी.

एक अनाम आशा के नाम पर वह मां और मामा को कब तक लटकाए रखती. उस रिश्ते की कसक को सीने में दफ़न करने के सिवा और वह कर भी क्या सकती थी. कभी-कभी उसके जी में आता था, वह जाए प्रयाग के पास और उससे पूछे कि क्या गुनाह था उसका जो यों जीते जी उसने सपनों की राख हुई चिता पर जल मरने की सज़ा दिशा को दे दी. एक धुंधली सी आशा थी. उसे क्या पता शिशिर की तरह प्रयाग भी आ जाए उसे ढूंढ़ता हुआ. लेकिन न प्रयाग आया और न ही उसकी कोई ख़बर, और ख़बर जब मिली तब तो सब ख़त्म हो गया था.

ब्याह के दो बरस बीत चुके थे. दिशा ने काजल को जन्म दिया था. नन्हीं काजल अब भैया के आने की राह ताक रही थी. आज भी याद है निशा को वह काली अंधेरी रात. दिशा और शिशिर एक पार्टी से लौटे थे. शिशिर उस दिन बहुत नशे में था.

दिशा ने पीने के लिए शिशिर को डांटा, "क्या ज़रूरत थी वहां इस कदर पीने की?"

"अरे सोसायटी में रहते हैं, कुछ काम ऐसे भी करने पड़ते हैं." शिशिर ने कहा.

"ज़रूरत क्या है. जिस चीज़ को मन न माने."

"बहक गया था." शिशिर बोला.

"मन की मानता तो तुम मेरी बगल में नहीं बैठी होतीं."

"क्या मतलब?"

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"मतलब ये कि मैं जब शादी का प्रपोजल लेकर आया था, तब मुझे प्रयाग ने भेजा था. चिट्ठी भी दी थी तुम्हारे नाम, पर मेरी नीयत तुम्हारी ख़ूबसूरती देख कर डोल गई. सोचा क्यों न प्रयाग और तुम्हारे बीच की दूरी का फ़ायदा उठा लिया जाए, सो चिट्ठी फाड़कर फेंक दी और आज तुम मेरी हो."

"ओह शिशिर, तुमने ये क्या किया." अगर होश में होता शिशिर तो देख पाता कि दिशा की आंखों के रंग कैसे बदल गए हैं. वह दिन और आज का दिन, दिशा की आंखों में अब सिर्फ़ एक शून्य है, एक रिक्तता है. वह बुत की तरह दुनिया के सारे कामकाज करती है, पर उसमें जीवन कहीं नहीं है. उसकी जीवन्तता को जैसे किसी ने सोख लिया है. और आज वे दोनों उसी प्रयाग के सम्मान में आयोजित एक पार्टी में जा रहे हैं. सुबह चार बजे की फ्लाइट से वह वापस अमरीका जा रहा था.

दिशा ने सुना उसने अब तक शादी नहीं की, यायावर की तरह यहां-वहां भटकता है. उसकी पेंटिंग्स की राजधानी में प्रदर्शनी थी. दिशा और शिशिर को वहीं मिला था वह. शिशिर ने नए साल की शुरुआत का जश्न साथ मनाने की बात कही तो वह तुरंत मान गया. दिशा की और उसकी प्यासी दृष्टि शिशिर से भी नहीं छिपी रही, पर शायद शिशिर एक प्रायश्चित करना चाहता था.

पार्टी में भी वह इधर-उधर बतियाता रहा. दिशा एक कोने में बैठी थी. प्रयाग लोगों से घिरा ठहाके लगा रहा था. जाने क्यों दिशा को लगा इन ठहाकों के पीछे वही शून्य और रिक्तता है जैसी वह ख़ुद भुगत रही है. दया हो आई, उसे अपने प्रयाग की अभिव्यक्ति भी ज़रूरी है. ख़्यालों में गुम वह जाने क्या सोचती रहती, लेकिन प्रयाग ने टोक दिया, "मेरे साथ डांस करोगी?"

विवश सी दिशा उठी और फ्लोर पर कदम से कदम मिलाने लगी प्रयाग के साथ. दिशा ने देखा बालों की एक सफ़ेद लट प्रयाग के माथे पर झूमने लगी थी. उदास सी आंखों में एक अनोखा आकर्षण पैदा हो गया था. लापरवाही से पहने गए कपड़ों ने उसे जैसे और भव्य बना दिया था. दिशा को लगा अगर वह प्रयाग के सीने पर अपना सिर रख दे तो बरसों से सीने में दबी उसकी आग शांत हो जाएगी. लेकिन एक आशंका ने फिर सिर उठाया, कहीं आग और भड़क उठी तो उसके शांत जीवन में तूफ़ान नहीं उठ खड़ा होगा. शिशिर शायद यहीं कहीं होगा. लेकिन शिशिर भी तो अनुभव करे प्रिय से जुदा होने का एहसास. दिशा ने अपना सिर प्रयाग के सीने पर टिका दिया.

"दिशा?"

"कैसे हो?"

"देख तो रही हो, कैसा बेतरतीब हो गया हूं. कोई सम्भालने वाला भी तो नहीं है."

"तुमने ढूंढ़ा ही नहीं होगा."

"ढूंढ़ा था, मिल भी गया था, पर..."

"पर क्या, प्रयाग..."

"छोड़ो, जाने दो, बताओ तुम कैसी हो? देख रहा हूं और ग्रेसफुल लगने लगी हो. तुम ख़ुश तो हो दिशा?"

"क्यों, वहम है तुम्हें?"

"हां."

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"तुम्हारी आंखों में मैं वही आग देख रहा हूं, जो मेरे सीने में भड़क रही है. इस आग को दबा दो दिशु, वरना तुम्हारी ज़िंदगी तबाह हो जाएगी." "तुम जानते हो मेरे साथ क्या हुआ है?"

"जानता हूं, शिशिर ने सब स्वीकार कर लिया है. लेकिन उसका दोस्त हूं न, मैंने उसे माफ़ कर दिया है. चाहता हूं, तुम भी भूल जाओ."

"मैं नहीं भूल सकती, मैं कुछ भी नहीं भूल सकती. शायद भुलाना इतना आसान नहीं है." "फिर भी हम कोशिश तो कर सकते हैं, दिशु, जो प्यार करते हैं वे कहीं भी रहें, हमारे हैं. देखो ना, मैं देश-विदेश भटकता हूं, कितनी ही लड़कियों से संबंध है मेरे, पर सब में मैं तुम्हें ही तलाशता हूं. मेरी यह तलाश कभी पूरी नहीं होगी, जानता हूं. लेकिन देखो न, अब तो अकेले रहने की आदत ही पड़ गई है मुझे. चाहूं तो आज भी पा सकता हूं तुम्हें, लेकिन तब तुम्हारी जो छवि मैंने अन्तर में बसा रखी है, वह धूमिल पड़ जाएगी. शिशिर अच्छा पति है, दिशु, माफ़ कर दो उसे. वह प्यार करता है तुम्हें, खो देगा तो जी नहीं सकेगा. वह मानता है कि वह आज भी नहीं पा सका है तुम्हें. मुझे उस पर दया आती है. बोलो माफ़ कर सकोगी उसे?"

दिशा ने बहुत क़रीब से देखा प्रयाग को, लगा जैसे वह उसमें समा गया है, बहुत ऊंचा हो गया था वह दिशा की नज़रों में. उसे लगा जैसे यही प्यार है. जिसे चाहो, उसे समझ पाओ. दूर रहकर भी मन में समाए रहो. उसके अनकहे को भी समझ कर मान सको, यही तो प्यार है. दिशा ने प्रयाग के चारों ओर अपनी बाहें कस लीं. इस पल को वह खोना नहीं चाहती. यही एक पल उसकी ज़िंदगी का सहारा बन जाएगा.

हॉल की बत्तियां अचानक गुल हो गई. घड़ी ने बारह बजाए और हाल धमाकों से गूंज उठा. बधाइयों का दौर चल पड़ा. लोग मुस्कुरा रहे थे. एक आंसू दिशा की आंख से टपका और वह प्रयाग से अलग हो गई. आंखों ने आंखों से अलविदा कहा और दोनों भीड़ में गुम हो गए.

थोड़ी देर बाद शिशिर और दिशा अपने बसेरे की ओर लौट रहे थे. दिशा का सिर टिका था शिशिर के कंधे पर.

ठीक उसी वक़्त एक हवाई जहाज़ उड़ा और एक मुसाफ़िर कोहरे की धुंध के बीच किसी अपने से बहुत दूर चला गया, शायद उसके बहुत पास आने के लिए.

- पुष्पा गोस्वामी

कहानी- प्यार की जीत

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