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कहानी- एक चटखती हुई चट्टान (Short Story- Ek Chatkhati Huyi Chattan)

कुछ सामाजिक शिष्टाचार अत्यंत दुखदाई होते हैं. राहत पहुंचाने की जगह यंत्रणा की घड़ी और लंबी खिंचती जाती है. जैसे-जैसे लोगों की गहमा गहमी बढ़ती गई, मां की त्योरियां चढ़ती गईं. इस मातमपुर्सी से फ़ुर्सत पाने में रात के एक बज गए. लोग आते, अफ़सोस जाहिर करते और चाय की प्याली पीकर चल देते.

प्रिय इड़ा,

शायद तुम्हें नहीं मालूम कि मैं इन दिनों दिल्ली में हूं. अपने प्यारे शहर से मेरा बास्ता नाम मात्र को रह गया है. वहां मां-बाप है, भइया-भाभी हैं और उनके बच्चे हैं, पर इससे क्या होता है? मेरे वहां रहने का औचित्य एक प्रश्नचिह्न बन गया है. ठहरो, विस्तार से बताती हूं. छह महीने बीत गए मुझे यहां दिल्ली आए हुए, लोगों को देखा-पहचाना है. आम महानगरों की तरह इसके भी कुछ ख़ास क़ायदे क़ानून हैं, जो निभाती चलो, तो सब कुछ ठीक, वरना पग-पग पर मुसीबतें तुम्हारे स्वागतार्थ खड़ी हैं...

तीन साल पहले तुम मॉरीशस में शादी के लंबे दो साल बिता कर आई थी. तुम्हारे घर-परिवार में ख़ुशी ही ख़ुशी थी. चाची ने कठिन जीवन बिता कर तुम्हें शिक्षित किया था. तुम्हारा कोई नज़दीकी रिश्तेदार मॉरीशस जा बसा था. उसी ने उस सुदर्शन डॉक्टर का पता भेजा था और सुदिन आते देर नहीं लगी. विदा की घड़ी में मैंने देखा था- तुम्हारे आंसू सच्चे थे मेरे लिए. तुम्हें याद होगा इड़ा. हमारी एक-रंग दोस्ती से आस-पड़ोस की औरतें कैसी-कैसी बोलियों का ज़हर उगलती थीं. सच इड़ा, जो कहना चाह रही हूं, वह शुरू नहीं हो पा रहा है, अज़ीब कशमकश की आंधी भीतर चल रही है.

लो, अपनी बात शुरू कर रही हूं, "कहीं तुम बदल गयी हो, तो शायद यह पत्र रास नहीं आया. बुरा मत मानना, सखी. आश्वस्त भाव से लिख रही हूं कि मेरी इड़ा कम से कम मेरे लिए नहीं बदली होगी. पापा की हालत तुमसे छिपी नहीं थी. कलकत्ते की नौकरी बात ही बात में छोड़ दी और घर पर ही जम गए. पीने और बीते दिनों की जुगाली के सिवा कोई दूसरी चीज़ पसंद नहीं थी. शाम को बाकायदा पिताश्री पीने की महफ़िल सजाते. बड़े भाईसाहब की तबीयत हुई, तो पिताश्री की एकाकी महफ़िल में शरीक हो गए. फिर आपसी कहासुनी से तक़रार शुरू होती है और पूर्ण विराम मुझ पर यह कहते हुए, "नीलू जैसी बदक़िस्मत औलाद पैदा करने का कोई हक़ पापा को नहीं था...' लगा देते.

पापा सह नहीं पाते हैं गालियां देते हुए कोने की छड़ी उठाने के लिए लपकते हैं और लड़खड़ा कर गिर जाते हैं. ठहाका लगाते हुए भाईसाहब उनको उठाते हैं. मेरे दिल्ली आने से पहले अक्सर नाटक का यही दृश्य मंचस्थ होता था.

यहां मंझले भाईसाहब के साथ हूं. ऊंचे पद पर हैं- कार, कोठी, नौकर-चाकर तथा मॉडल नुमा बीवी है. कचकड़े के पुतले सा एक बच्चा जो नौकरानी (शिष्ट शब्द में आया) की निगरानी में पल रहा है. चंद शब्दों में कभी मां दुलार भी लेती है. यहां आने पर भाईसाहब भी बदले-बदले से नज़र आते हैं. रात-दिन व्यस्त रहने का नाटकीय भाव इनके चेहरे पर रहता है. तुम्हें याद होगा कि हम दोनों के लिए कितने सहज थे. हंसने-हंसाने में माहिर, मेरी किताबों और फीस की चिंता इनको ही थी. आज अपने उसी प्रिय भाई के साथ बातचीत के लिए तरस गई हूं. इतवार को कहने के लिए खाने के वक़्त मैं साथ होती हूं. बस नपी-तुली बातचीत, जिसका कोई ख़ास मतलब नहीं. अब मैंने जाना है किसी-किसी के लिए ज़िंदगी की राहें कड़े कोस में तब्दील हो जाती है.

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... बड़े भाईसाहब की सिफ़ारिश और खोज के फलस्वरूप मेरा ब्याह हो गया. मंझले भाई साहब एक दिन के लिए आए और पापा के हाथ में अपने हिस्से की रकम थमा कर चले गए. कहा- शादी पर आना संभव नहीं है. बचे-खुचे मां के ज़ेवर भी बिक गए. पापा और भी चिड़चिड़े हो गए थे. मां के बर्ताव में भी बदलाव आ गया था. ब्याह के लिए दस दिन पहले लड़‌केवालों का पैग़ाम आया कि अच्छा होगा, शादी किसी देव स्थल में सम्पन्न हो. परकटे पंछी की तरह मैं बेबस थी...

...‌ मेरा पत्र लिखना अभी पूरा नहीं हुआ है. मन क्रमशः मृतपाय-सा होता जा रहा है. यह मेरा खंडित आवेश था, जो कई वर्षों से बलात् दबा पड़ा था, जिसे इड़ा के पत्र में उडेल कर आज मुझे मुक्ति मिली है. इन दिनों नियमित डायरी लिखती हूं. अचानक इड़ा का स्मरण हुआ और स्मृतियां एक अदम्य कोलाहल में बदलती गई. आज किन्हीं रावसाहब के यहां पार्टी है, वह भी रात भर चलने वाली पार्टी. भैया-भाभी वहीं गए हैं. एक दिन मैंने पूछ ही डाला - इतनी रात गई पार्टियों में क्या होता है भाभी?"

"आपका सवाल ही ग़लत है बीबी. यह आपके पूछने-समझने की चीज़ नहीं, अपने काम से मतलब रखिए."

कोठी में कैसा मनहूस सन्नाटा है. रात के ग्यारह बजे हैं. अभी उनकी वापसी में घण्टों की देर है. आया बच्चे के पास बैठी-बैठी ऊंघ रही होगी. एक रात मेमसाहब ने सोते हुए पकड़ लिया. स्टूल में ठोकर मार दी थी. बेचारी आया का दुबला-पतला मरियल शरीर फर्श पर गिर पड़ा था. मैंने यह कु-कृत्य देखा था और दबी मुट्ठियों में अग्नि-कण की सुगबुगाहट महसूस करने लगी हूं. बाल्कनी में आकर खड़ी हूं. आस-पास के बंगलों में अभी कितनी खामोशी छायी है. रात की एक बादलय में युक्तिपट्स की गंध चुलती जा रही है. यहां कर सुख-दुःख, रोना-हंसना एक यात्रिक अनुशासन के अधीन है. अपने शहर में सुख-दुःख एक उधड़े हुए सत्य-सा फैला है. एक समय इड़ा भी मेरी ही तरह फटेहाली में जी रही थी, पर एक बड़ा भारी फर्क था हमारे बीच. उसकी मां ममता लुटाती चकती न थी. वहां मेरी मां ने कभी मुझे प्यार नहीं किया था. बी.ए. हमने एक साथ पास किया था. उसकी मां ने लड्डू बांटे थे घर-घर जाकर, मेरा मुंह मीठा कराते हुए बोली थीं, "और तरक्की करो. औरत किस पद को हासिल नहीं कर सकती?" सपनों का एक इंद्र धनुष उगा था पल भर के लिए, फिर बुझ गया गहन अंधेरे में, हवा और तेज हो गयी है. पैड लेकर अपने बिस्तर पर आ गयी हूं. इड़ा को लिखा अधलिखा पत्र जो पूरा करना है.

"इस भयावह नाटक का पटाक्षेप अत्यंत कुत्सित व घिनौना था. इड़ा, इसी से... पत्र लिखना थोड़ी देर के लिए मैंने रोक दिया था. लड़के की पहली ब्याहता मर चुकी थी. एक लड़की थी, जो समृद्ध ननिहाल में पल रही थी. हज़रत एक्साइज़ में दारोगा थे. शादी देव स्थल में ही हुई. ब्याह की रस्में नाम-मात्र की हुई. तेज नशे में डबे रहने के कारण पापा सभा-स्थल तक पहुंच नहीं पाये थे. ब्याह के बाद जनाब का मिजाज़ सातवें आसमान पर पहुंच गया था. बड़े भाई साहब को डांटते हुए कहा, "होश की बात कीजिये. देने के नाम पर जो टरकाया है, उससे कम बेइज़्ज़ती मेरी नहीं हुई है. रिश्ता हो चुका, वर्ना हुजूर के होश ठिकाने लगा देता. भाई साहब की धिग्धी बंध गयी थी. अब दृश्य का अंतिम चरण हाज़िर है सुहागरात या क़यामत की रात कहूं- कुछ समझ में नहीं आता. नशे में धुत्त एक काला जिन्न मेरे सामने खड़ा था, "नखरे छोड़ो, लाजवंती. तरस लाकर यह शादी की है." वह रीछ मुझे नोचने-खसोटने लगा था. काश, मेरे पास भी एक पाशविक ताक़त होती. कुछ देर बाद वह दैत्य बेख़बर सो गया. रातभर मैं पागल की तरह कमरे में चक्कर लगाती रही. कभी यह ख़्याल मन पर बार-बार हावी होता कि सोये ही में उसकी गर्दन दबा दूं. फिर सोचती कि ऐसा कर नहीं पायी, तो यह राक्षस मेरा कीमा बना देगा.

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दिन में औरतों की अदालत में नये-नये जले-कटे बोल सुनने को मिलते- "अपना भाग सराहे, कूड़े से महल में चली आयी. मुझे तो दाल में काला लगता है. कैसी पकी पकायी लगती है?.." फिर भी मैं विचलित नहीं होती थी, पर रात का ख़्याल आते ही सारा शरीर झनझना उठता. एक आवेग मन की सीमाओं को तोड़ने लगता. सच इड़ा, कुछ दिन और ठहर जाती, तो सचमुच मुझसे खून हो जाता. आख़िरी रात भी उस नर पशु ने अपनी वहशी हरकतें शुरू की थीं और मैंने उसके मुंह पर थूक दिया था. फिर मेरी ज़ोरदार कुटायी हुई. मैंने भी हाथ के नाखूनों का भरपूर प्रयोग किया था. सुबह के उजाले में चेहरे पर उगी तेज-तर्रार खरोचों ने बड़ी राहत बख़्शी थी. बड़े भाईसाहब आए और उनके साथ एक साड़ी में सदा-सदा के लिए मैं विदा कर दी गयी. घर पहुंचने पर एक समां बंध गया. पापा शायद नशे में थे. पहले तो मुझे देख कर रोने लगे. फिर गरजती आवाज़ में बोले, "ठीक कर दूंगा. सब सालों को ठीक कर दूंगा. मेरी बेटी गूंगी-बहरी है? पढ़ी लिखी है- ख़ुद अपने पांवों पर खड़ी हो जाएगी."

अब घर पर मेरी जैसी जलालत हो, उस घोर नरक से तो मुक्ति मिली. शाम होते ही मेरी रुसवाई की ख़बर जंगली आग की तरह मुहल्ले भर में फैल गई. भारत में कुछ सामाजिक शिष्टाचार अत्यंत दुखदाई होते हैं. राहत पहुंचाने की जगह यंत्रणा की घड़ी और लंबी खिंचती जाती है. जैसे-जैसे लोगों की गहमा गहमी बढ़ती गई, मां की त्योरियां चढ़ती गईं. इस मातमपुर्सी से फ़ुर्सत पाने में रात के एक बज गए. लोग आते, अफ़सोस जाहिर करते और चाय की प्याली पीकर चल देते. उस रात पापा ने शराब नहीं पी थी और बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगे थे. मेरी इच्छा हो रही थी कोई मेरे टुकडे-टुकड़े कर डाले, मारते-मारते मुझे बेदम कर दे, मगर कोई हाथ कहीं से नहीं उठा.

बिजली चली गई थी. दमघोंटू अंधेरा आसपास सिमट गया था. रात को चूल्हा ठंडा रहा- यह थी मेरे पुनार्गमन की एक मनहूस शुरुआत. सुबह रसोई में मां का हाथ बंटाने आई तो मां की चुप्पी शूल सी चुभती रही. मेरे बोलते रहने पर भी मां हां-हूं में जवाब देती रही. भाईसाहब के दफ़्तर जाने से कुछ देर पहले भाभी उठीं और नहाने चली गईं. नहाकर निकलीं, तो बच्चों को पास बुला कर फुसफुसाहट भरी आवाज़ में कुछ निर्देश देने लगीं. दिन में पता चला मुझे कहीं भेजने का षड्यंत्र रचा जा रहा है. मझले भाईसाहब अब एक प्रभावशाली व्यक्ति बन गए हैं. एकमात्र पापा की इच्छा नहीं थी कि मैं कहीं जाऊं.

दूसरे हफ़्ते अचानक एक रात किसी ने मेरा नाम ले कर पुकारा, "नीलू..." मझले भाई साहब थे. मैंने ही दरवाज़ा खोला. हंसते हुए भाईसाहब बोले, "कैसी हो, नीलू?" सुबह तक चलने वाली आपातकालीन बैठक में मझले भाईसाहब का निर्णय सर्वोपरि माना गया, "नीलू मेरे साथ दिल्ली जाएगी. वहां कुछ न कुछ हो ही जाएगा." बड़े भाईसाहब और भाभी का चेहरा खिल गया- चलो बला टली.

दिल्ली आकर मैंने सब को चिट्ठी लिखी. किसी ने जवाब नहीं दिया. कुछ दिन बाद दो पक्तियों का लिखा हुआ पापा का कार्ड मिला. रिश्ते-नातों के बंधन छिन्न-भिन्न हो गए.

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यहां रहते हुए जब दो महीने यूं ही कट गए और कोई रास्ता मेरे लिए नहीं बना, तो एक रोज़ हिम्मत करके मैंने पूछ ही लिया, "खाली बैठे-बैठे मन नहीं लगता है. मैं कुछ करना चाहती हूं." भाईसाहब एक मिनट तक मुझे देखते रहे, फिर बोले, "यहां तुम्हें क्या तकलीफ़ है? देखेंगे कोई ऐसी जगह हो तुम्हारे लायक! फ़िक्र की क्या बात है. पास में लाइब्रेरी है- जाया करो." मैं भीतर ही भीतर घुटती रही. वह जा चुके थे. रोज़मर्रा की बेलौस ज़िंदगी के टुकड़े डायरी में टांकती हूं, तो अच्छा लगता है. अक्सर सोचती हूं कि परास्त भाव से मृत्यु का स्वीकार अंतर की क्रूर परवशता का बोध दिलाता है. पत्र बहुत लंबा हो गया है... सुबह में ज़्यादा देर नहीं है, किंतु मेरी अपनी सुबह, अभी बहुत देर है इड़ा. यहां एक पार्वती दीदी हैं. बच्चों के लिए हाथ से सिले कपड़ों का थोक व्यापार करती हैं. उन्होंने मुझे काम दिया है अपने केंद्र में. पांच घण्टे की कड़ी ड्यूटी है. जी को फिर आशातीत संतोष है. बाकी वक़्त लिखने-पढ़ने में लगाती हूं. पत्रकारिता में उतरने का एक चोर ख़्याल मन में पल रहा है. अब विदा दो. स्वतः विराम नहीं लिया, तो लिखती चली जाऊंगी, तुम्हें देखने की बड़ी इच्छा है.

तुम्हारी नीलू (नीलिमा)

... बत्ती बुझा कर लेट गई हूं. आकाश सफ़ेदी से भरने लगा है. मेरी आंखें झेंप रही हैं. पास के लेटर बॉक्स में चिट्ठी छोड़ दूं. फिर चैन की नींद लूं, तभी गाड़ी का हॉर्न सुनाई देता है...

- अमरेंद 'अमर'

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