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कहानी- एक डिलीवरी बॉय की आपबीती (Short Story- Ek Delivery Boy Ki Aapbiti)

वे मुस्कुराईं, “ले लो. तुमने खाना नहीं पहुंचाया… आज तुमने साथ पहुंचाया है.” मैंने पैसे ले लिए. लेकिन जेब में नहीं रखें. हाथ में ही पकड़े रहा. जाते-जाते उन्होंने कहा, “और हां, आज घर जाकर मां को फोन ज़रूर करना.”

मैं ज़्यादातर शाम की शिफ्ट करता हूं. उस दिन रात क़रीब 9 बजे आख़िरी ऑर्डर उठाया. रेस्टोरेंट से पैकेट लिया तो देखा- ऑर्डर छोटा था, बस एक सादा खिचड़ी, दही और दो केले. पता शहर के पुराने हिस्से का था. एक जर्जर-सी बिल्डिंग. ऊपर तीसरी मंज़िल.

डोरबेल दबाई. दरवाज़ा एक बूढ़ी अम्मा ने खोला. सफ़ेद बाल,कांपते हाथ, आंखों पर मोटा चश्मा. चेहरे पर थकान थी, लेकिन आवाज़ में मिठास.

“बेटा, ज़रा अंदर रख दो… हाथ कांपते हैं.”

मैं खाना टेबल पर रखकर मुड़ा ही था कि उन्होंने पूछा, “दो मिनट बैठोगे? अकेले खाना अच्छा नहीं लगता.”

मैंने घड़ी देखी. शिफ्ट ख़त्म हो चुकी थी. थोड़ा थका था. लेकिन पता नहीं क्यों, मैं बैठ गया.

कमरे में सन्नाटा था.

दीवार पर पुरानी घड़ी टिक-टिक कर रही थी. एक कोने में भगवान की छोटी सी तस्वीर और सामने दीवार पर दर्जनों फोटो.

वे धीरे-धीरे खिचड़ी खाने लगीं. हर दो कौर के बाद मेरी तरफ़ देख मुस्कुरा देतीं. फिर बोलीं, “जानते हो बेटा, मैं रोज़ बाहर से खाना नहीं मंगाती. आज बस मन किया… किसी इंसान की आवाज़ सुनने का.”

मैं चुप रहा

उन्होंने सामने लगी तस्वीर की ओर इशारा किया, “ये मेरे पति हैं, रेलवे में थे. पांच साल पहले चले गए.”

फिर दूसरी तस्वीर, “ये बेटा है, कनाडा में रहता है. बहुत अच्छा है… हर महीने पैसे भेजता है.”

फिर थोड़ी देर चुप रहीं, मुस्कुराईं, मगर इस बार आ़खें भीग गईं, “बस… समय नहीं भेज पाता.”

कमरे में अचानक घड़ी की टिक-टिक बहुत तेज़ सुनाई देने लगी.

उन्होंने एक कौर और खाया.

“ये बेटी है, बंगलुरु में. अपनी दुनिया में ख़ुश है. होना भी चाहिए. बच्चे अगर उड़ें नहीं तो मां-पिता ने पाला ही क्या?”बोलते-बोलते उनकी आवाज़ भर्रा गई, लेकिन चेहरे पर शिकायत नहीं थी, बस खालीपन था.

उन्होंने मुझसे पूछा, “तुम्हारी मां है?”

मैंने कहा, “हां.”

“फोन करते हो रोज़?”

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मैं चुप हो गया. सच ये था कि मैं भी कई-कई दिन घर फोन नहीं करता था. थकान, काम, भागदौड़… हर बार यही सोचकर टाल देता था कि कल कर लूंगा.

उन्होंने मेरी चुप्पी पढ़ ली. हल्के से बोलीं, “मां-पिता पैसे नहीं गिनते बेटा… आवाज़ गिनते हैं.”

मेरे भीतर कुछ चुपचाप टूट गया.

खाना ख़त्म हुआ. उन्होंने पानी पीया.

फिर पर्स से 500 रुपए निकालकर मेरी ओर बढ़ाए.

“ये टिप नहीं है. ये उस आधे घंटे की क़ीमत है, जिसमें तुमने मुझे अकेले नहीं खाने दिया.”

मैंने तुरंत मना किया, “नहीं अम्मा, ये नहीं ले सकता.”

वे मुस्कुराईं, “ले लो. तुमने खाना नहीं पहुंचाया… आज तुमने साथ पहुंचाया है.”

मैंने पैसे ले लिए. लेकिन जेब में नहीं रखें. हाथ में ही पकड़े रहा.

जाते-जाते उन्होंने कहा, “और हां, आज घर जाकर मां को फोन ज़रूर करना.”

उस रात मैंने बिल्डिंग के नीचे बाइक स्टार्ट नहीं की.

पहले मां को फोन लगाया. उधर से आवाज़ आई, “आज अचानक? सब ठीक है ना?”

बस इतना सुनते ही गला भर आया. मैंने कहा, “हां मां… बस, आपकी आवाज़ सुननी थी.”

उधर कुछ सेकंड ख़ामोशी रही. फिर मां बोली, “खाना खाया?” और मैं सड़क किनारे खड़ा रो पड़ा.

उस रात के बाद मैं रोज़ मां को फोन करने लगा.

और सिर्फ़ मां को ही नहीं, हर डिलीवरी, अब मेरे लिए सिर्फ़ ऑर्डर नहीं रही. किसी घर में दवा जाती है, किसी घर में अकेलापन, किसी घर में इंतज़ार, किसी घर में बस एक आवाज़ की ज़रूरत होती है...

मैं अब दरवाज़ा खुलने पर जल्दी नहीं करता, चेहरा देखता हूं, आवाज़ सुनता हूं, कभी पूछ लेता हूं, “और सब ठीक?”

ज़्यादातर लोग बस, “हां” कहते हैं.

कुछ लोग मुस्कुरा देते हैं और कुछ के चेहरे बता देते हैं कि उन्होंने पूरे दिन किसी से बात नहीं की.

दो महीने बाद उसी पते पर फिर ऑर्डर आया.

मैं भागकर गया.

दरवाज़ा किसी और ने खोला.

पड़ोस वाली आंटी थीं.

धीरे से बोलीं, “अम्मा पिछले हफ़्ते चली गईं.”

कुछ सेकंड तक मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा.

हाथ खाली थे, लेकिन भीतर कुछ भारी गिर चुका था.

उन्होंने अंदर से एक छोटा लिफ़ाफ़ा लाकर दिया और कहा, “तुम्हारे लिए छोड़ गई थीं.”

कांपते हुए हाथों से खोला.

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अंदर 500 रुपए थे और एक छोटी सी पर्ची.

उस पर लिखा था-

बेटा,

अगर ये पढ़ रहे हो तो मैं जा चुकी हूं. धन्यवाद, उस रात मेरे साथ खाना खाने के लिए. तुमने मुझे खाना नहीं, सम्मान दिया. और हां, मां को फोन करते रहना."

- अम्मा

आज भी वो 500 रुपए मेरे बैग की अंदर वाली जेब में रखे हैं, ख़र्च नहीं किए, क्योंकि उस रात पहली बार समझ में आया, हर दरवाज़े के पीछे सिर्फ़ एक ग्राहक नहीं होता; कभी एक मां होती है, कभी एक इंतज़ार, कभी एक आख़िरी बातचीत...

हम सब अपनी-अपनी भूख लेकर जी रहे हैं, किसी को रोटी चाहिए, किसी को दवा और किसी को बस दो मिनट साथ. इंसान को हमेशा पैसे की नहीं, कभी-कभी बस मौजूदगी की डिलीवरी चाहिए!..

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