
अश्लेषा
"तुम्हारे होने से ही तो मैं मां हूं! तुम हो तो हर दिन मेरा मदर्स डे है." मैंने मिष्ठी को गोद में बिठाकर सीने से लगा लिया. मिष्ठी के मुख पर ख़ुशी की बड़ी सी मुस्कान थी जिसकी रौशनी में मेरा घर संसार का सबसे सुंदर घर लग रहा था मुझे.
घर के काम समेटकर जब कमरे में आई तो कमर में दर्द हो रहा था. सोचकर आई थी कि थोड़ी देर अब आराम से बिस्तर पर लेटी रहूंगी.
लेकिन यह क्या?
मेरे राइटिंग टेबल पर पानी फैला हुआ था और उस पानी में बेटी के खिलौने के ढेर सारे बर्तन पड़े थे. एक कटोरी में उसने बिस्किट का चूरा बना कर रखा था. पानी में बिस्किट के भीगे टुकड़े पड़े थे. एक प्लेट में वह बिस्किट के चूरे में पानी मिलाकर गूंथ रही थी.
देखते ही मेरा पारा चढ़ गया. ज़रा सी भी गंदगी या फैलारा मुझसे कभी सहन ही नहीं होता था. बेटी को भी सख्त अनुशासन में रखा था मैंने. और यहां तो मेरे सारे काग़ज़, डायरियां रखी हुई हैं.
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"ये क्या कर रही हो मिष्ठी मेरा पूरा टेबल ख़राब करके रख दिया तुमने! तुम्हे पता है न फैलारा और गंदगी मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है. अभी साफ़ करके गई थी अब दुबारा सब साफ़ करना पड़ेगा. कर क्या रही हो तुम. हटो यहां से." मैं झल्ला कर बोली. कहां तो आराम करने आई थी और कहां फिर से टेबल पोंछना.
"मां यहां बैठो न..." मेरे ग़ुस्से पर ध्यान न देकर अपने मे ही मगन मिष्ठी ने अपनी बिस्किट की लुगदी में सनी नन्ही हथेलियों से मेरे हाथ पकड़े और बड़े मनुहार से मुझे पलंग पर बिठाने लगी.
"हाथ मत छुओ मेरे, बिस्किट लगा दिए तुमने मेरे हाथों पर. ज़रा देखो कितने गंदे हाथ है तुम्हारे." मैं और चिढ़ गई.
"मां प्लीज़ बैठो न." मिष्ठी बहुत ही मनुहार से बोली.
मैं चिढ़ती हुई ग़ुस्से में बैठ गई. वह टेबल पर जाने क्या खटर-पटर करने लगी.

"हैप्पी मदर्स डे मां..." मिष्ठी के हाथों में खिलौना ट्रे थी, जिसमे एक कप में पानी भरा हुआ था और एक प्लेट में बिस्किट के आटे का ढेर. चेहरे पर मेरे लिए कुछ करने की अपार ख़ुशी से दमकती मुस्कान थी.
उसकी उस भोली, निश्छल मुस्कान की दमक ने अचानक मन के भावों को बदल डाला. बदलती भावनाओं ने आंखों में नमी भर दी और उस नमी ने मेरे चेहरे से ग़ुस्से की सारी रेखाओं को बहा दिया.
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"ये क्या है?" मैंने मुस्कुराकर उसका हाथ थामकर पूछा.
"ये केक है और ये आपके लिए चाय, कल पापा ने बताया था आज मदर्स डे है, अपनी मां के लिए कुछ अच्छा करना तो मैंने आपके लिए चाय और केक बनाई है." वह बड़े उत्साह से बोली.
"बहुत सारा थैंक यू मेरी बिटिया."
मैंने उसे बांहों में भर लिया और गाल चूम लिए. अब न मुझे उसके हाथ चिपचिपे लग रहे थे और न ही टेबल का फैलारा बुरा लग रहा था.
अचानक ही जैसे कमरा ही नहीं सारी दुनिया बहुत ख़ूबसूरत हो उठी. टेबल पर पसरे बर्तनों और फैले पानी में भी एक सुंदरता थी, मां होने के एहसास की सुंदरता, घर में एक बच्चे के होने के कोमल एहसास की छुवन की सांत्वना. ये बेतरतीबी ही तो जीवन का उल्लास है, जीवन की सबसे क़ीमती नेमत है, सबसे बड़ी ख़ुशी है. मेरे मातृत्व की सार्थकता है.
"तुम्हारे होने से ही तो मैं मां हूं! तुम हो तो हर दिन मेरा मदर्स डे है." मैंने मिष्ठी को गोद में बिठाकर सीने से लगा लिया.
मिष्ठी के मुख पर ख़ुशी की बड़ी सी मुस्कान थी जिसकी रौशनी में मेरा घर संसार का सबसे सुंदर घर लग रहा था मुझे.

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