आर्यन ने शांत भाव से गर्व के साथ जवाब दिया कि आप ने ही तो बताया है कि हमें सबके साथ करुणा से पेश आना चाहिए. जब उसने कीडा होकर अपना स्वभाव नहीं छोड़ा तो मैं साधु होकर अपना स्वभाव कैसे छोड़ सकता था. इस पर उन्होंने प्रश्नवाचक निगाह से सबको देखा.
पुराने समय की बात है. एक गुरु के आश्रम में बहुत से शिष्य रहते थे. उस समय गुरुकुल में रहकर पढ़ाई करने और वहां के सारे नियमों को मानने वालों को ब्रह्मचारी या साधु कहा जाता था. उनसे उम्मीद की जाती थी कि वे एक अच्छे साधु की तरह व्यवहार करें. एक शिष्य, जिसका नाम आर्यन था, गुरुजी की बातों को ध्यान से सुनता और पूरा-पूरा पालन करने की कोशिश करता.
हाल ही में उन्हें सदाचार और साधु के लिए उपयुक्त व्यवहार का पाठ पढ़ाया गया था. उस समय शिष्य नहाने और कपड़े धोने नदी पर जाते थे और पानी भरकर भी लाते थे. एक बार वो नदी में नहाकर पूजा कर रहा था. तभी नदी के बहाव के साथ एक जोक बहती हुई आई और उसके पैर से चिपक गई. जोक उसका खून पीने लगी और उसे दर्द महसूस हुआ. आर्यन ने उस जोक को अपने पैर से निकाला और दोबारा नदी में डाल दिया. कुछ देर बाद वो दोबारा बहती हुई आई और उसका खून पीने लगी।न. उसने दोबारा जोक को नदी में डाल दिया. ये क्रम चलता रहा.
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सब वापस आए और पढ़ाई शुरू हुई तो गुरु ने आर्यन के चेहरे पर दर्द महसूस किया. पूछने पर उसने अपना घाव दिखा दिया. गुरुजी ने सारी बात बताने को कहा. पूरी बात ध्यान से सुनने के बाद उन्होंने आर्यन से पूछा कि उसने जोक को मारा क्यों नहीं?
आर्यन ने शांत भाव से गर्व के साथ जवाब दिया कि आप ने ही तो बताया है कि हमें सबके साथ करुणा से पेश आना चाहिए. जब उसने कीडा होकर अपना स्वभाव नहीं छोड़ा तो मैं साधु होकर अपना स्वभाव कैसे छोड़ सकता था. इस पर उन्होंने प्रश्नवाचक निगाह से सबको देखा. सबसे पूछा कि आर्यन ने सही किया या नहीं. सभी ने उसकी बहुत तारीफ़ की.
तब गुरुजी ने सबको समझाया कि आर्यन की बात आधी सही है. ये साधुत्व नहीं मूर्खता है. कीड़े की प्रवृत्ति रखने वालों की उन बातों को उपेक्षित करना, जिन्हें दिल पर लेकर हम अपना नुक़सान करेंगे; उनसे बदला न लेना साधु होकर साधु का स्वभाव न छोड़ना है.
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ख़ुद को तकलीफ़ देने वाली बातों को सहते जाना साधुत्व नहीं है. तुम उस जोक को नदी में कहीं दूर फेंक सकते थे जहां से वो तुम्हें नुक़सान न पहुंचा सकती हो.
याद रखो, अच्छाई अकेली काफ़ी नहीं होती. ख़ुद को सुरक्षित रखना भी उतना ही ज़रूरी है जितनी दया. कहां करुणा ख़त्म हो जानी चाहिए और आत्म रक्षा शुरू ये तय करने के लिए विवेक बहुत ज़रूरी है.

भावना प्रकाश

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