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कहानी- एक और बालिवध (Short Story- Ek Aur Balivadh)

"क्यों, इसमें बुरा क्या है?" जेठानी अपने पानसड़े दांत दिखलाने लगी थीं, "कहा न कि हमारे घर की चौखटें ही हम लोगों के लिए लक्ष्मण रेखाएं बन जाया करती हैं." "यह तो सोचना तक महा पाप होता है जीजी." शालिनी अपना निचला होंठ चबाने लगी थी, "कहा भी है न कि पुत्र वधू, भगिनी, सुत नारी..."‌ जेठानी के कहे पर शालिनी को आश्चर्य ही हुआ था.

जयंत को शहीद हुए महीना भर भी नहीं हुआ कि जेठ उस पर डोरे डालने लगे हैं.

"शालू!" पिछले सप्ताह वे शालिनी के कंधे पर हाथ रखते-रखते रह गए थे, "यूं, रो-रो कर जान ही दे देगी क्या?"

शालिनी अपना निचला होंठ काट कर उधर से दूसरे कमरे में चल दी थी. जेठ देखते ही रह गए थे. अंदर से द्वार पर कंडी चढ़ा कर तमाम रात वह सिसकती-सुबुकती रही थी.

जयंत कितना चाहते थे उसे? जब भी वे घर आते "शालू! शालू!" की रट लगाते हुए उसी के इर्दगिर्द चक्कर काटा करते थे. वह भी तो उन्हीं के नाम की माला जपा करती थी.

जयंत सेना में सेकेंड लेफ्टीनेंट थे. शालिनी और उनका रिश्ता उन्हीं की इच्छानुसार तय हुआ था. बी.ए. के बाद वह बी.एड. करने की सोच ही रही थी कि एक दिन उसने जयंत को चुपके से अपना दिल दे दिया. वे उन दिनों अवकाश पर घर आए हुए थे.

"देखिए साहब!" जयंत के बड़े भाई जगलाल बोले थे, "हमारे भइया फौज में हैं. आप जानते ही हैं कि फौजियों की ज़िंदगी..."

"बहादुरी भरी होती है." शालिनी के पापा ने हंसी का उन्मुक्त ठहाका लगा दिया था. वे स्वयं भी तो वायु सेना के सेवा निवृत्त स्क्वेडन लीडर थे. उन्होंने पूछा था, "आप किस जॉब में है?"

"जी मैं मध्य प्रदेश शासन के रेवेन्यू विभाग में हूं." जेठ ने उन्हें अपने व्यवसाय से परिचित कराया था.

"ठीक है साहब." पापा संतुष्ट हो आए थे, "हमें लड़का पसंद है."

"मुझे एक बात और कहनी है." जुगलाल ने चाय का घूंट भर कर कहा था, "हम लोग जाति के पारसी हैं."

"और हम कायस्थ हैं." पापा ने हंसी का ठहाका लगा दिया था, "मैं जात-पात को नहीं मानता."

"हमें लड़की पसंद है." जुगलाल भी मुस्कुरा दिए थे, "हमें भी केवल कन्या चाहिए और कुछ नहीं."

"यह तो आपकी दरियादिली है." पापा विनम्र हो आए थे, "वरना आज के ज़माने में..."

"नहीं साहब. हमें कोई लोभ-लालच नहीं है." जेठ बोले थे.

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चट मंगनी, पट ब्याह के अनुरूप उसी महीने उनका विवाह हो गया था. जयंत शालिनी को अपने साथ कश्मीर ले गए थे. उन दिनों उनकी पोस्टिंग भी वहीं थी. साल भर तक वह वहीं रही थी. उसके बाद जयंत को उत्तर-पूर्वी सीमांत पर भेज दिया गया था. शालिनी को उन्होंने घर पर छोड़ दिया था.

दो महीने पहले जयंत महीने भर की छुट्टियों पर घर आए हुए थे. शालिनी की प्रसन्नता का कोई ओर-छोर न था. जयंत भी तो उसी में डूबने लगे थे. एक दिन उसकी ठोड़ी उठा कर उन्होंने कहा था, "इस बार मैं तुम्हें उत्तर-पूर्वी सीमांत की सैर करवाऊंगा. फैमिली साथ रखने की अनुमति मिलते ही मैं तुम्हें भी साथ ले चलूंगा."

जयंत डयूटी पर गए तो शालिनी उदास हो आई थी. सीमांत पर पहुंचते ही उन्होंने वहां से अपनी कुशल क्षेम भेजी थी.

उसके सपने कुलबुलाने लगे थे. उनमें वह उत्तर-पूर्वी सीमांत पर कुलांचे भरा करती. किंतु उस दिन तो उसके ऊपर जैसे वज्रपात ही हो गया, जब घर पर तार आया था कि जयंत एक हेलीकॉप्टर-दुर्घटना में शहीद हो गए हैं. शालिनी गुमसुम ही हो आई थी. उसकी आंखें जैसे पथरा गई थीं. धीरे-धीरे उनमें गीलापन भरने लगा था और अब तो उसकी आंखों की बरसात थमती ही नहीं है. बरसती आंखों के कारण उसकी दृष्टि भी धुंधलाने लगी है.

उस घर में शालिनी की स्थिति धोबी के कुत्ते की तरह हो आई है. जो सास कभी उसे सिर-आंखों पर बिठलाया करती थीं, वही अब उसे जब-तब जली-कटी सुनाने लगती हैं. जिस जेठ ने कभी उसकी ओर आंख उठा कर भी नहीं देखा था उन्हीं की नीयत में अब खोट भरने लगा है.

"जीजी..." सुबह उठते ही शालिनी ने जेठानी से गिला-शिकवा किया था, "जेठजी कुछ..."

"हां री." कांता के होंठों पर शातिर मुस्कान उभर आई थी, "लगता है, उन्हें तेरी जवानी पर तरस आ रहा है. हमारे यहां भाभी-बहू के रिश्तों में कोई अंतर नहीं होता."

"जीजी!" शालिनी का तल्ख़ स्वर था, "यह तुम कह रही हो?"

"क्यों, इसमें बुरा क्या है?" जेठानी अपने पानसड़े दांत दिखलाने लगी थीं, "कहा न कि हमारे घर की चौखटें ही हम लोगों के लिए लक्ष्मण रेखाएं बन जाया करती हैं."

"यह तो सोचना तक महा पाप होता है जीजी." शालिनी अपना निचला होंठ चबाने लगी थी, "कहा भी है न कि पुत्र वधू, भगिनी, सुत नारी..."‌ जेठानी के कहे पर शालिनी को आश्चर्य ही हुआ था.

मन का बदलना इतना आसान तो नहीं हुआ करता. मर्द के मन से स्त्री का मन अधिक बलवान हुआ करता है. जेठ का मन नहीं, बल्कि उनकी नीयत में ही खोट भर आया है.

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अपनी समस्या को लेकर शालिनी सास के कमरे में चल दी थी. किंतु सास-जेठानी दोनों ही जैसे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे निकलीं. वे भी तो कांता का ही समर्थन करने लगी थीं, "अरी, वो ठीक ही तो कहती है. हमारे यहां घर की लाज घर में ही बनी रहती है."

"लेकिन जेठ तो पिता के समान हुआ करते हैं." शालिनी का तर्क था.

"यह तुम लोगों में होता होगा." सास खैनी मलने लगी थीं.

जगलाल भोपाल में अकेले ही रहते रहे हैं. महीने में एक-आध चक्कर वे घर का भी लगा जाया करते हैं. चार कन्याओं के पिता होकर भी वे हर समय छैला बाबू बने रहते हैं. उनकी जेब में जेबी दर्पण व कंघी हर समय ही रहा करती है. पिछले सप्ताह जब वे घर आए थे तो शालिनी के लिए ढेर सारे उपहार ले आए थे.

"अरे!" कांता उन साड़ियों को देखती ही रह गई थी.

"ये सब शालू के लिए लाया हूं". उन्होंने दांत निपोर दिए थे. वे वहीं खड़ी शालिनी की ओर घूम गए थे, "क्यों शालू?"

जो जेठ हमेशा ही उसे "बहू!" शब्द से संबोधित करते रहे, उन्हीं के मुंह से अपना नाम सुन कर उसे बड़ा अटपटा सा लगा था. अगले ही क्षण उसने वे साड़ियां एक ओर फेंक दी थीं, "मुझे नहीं चाहिए ये सब."

उस दिन कोप भवन में पड़ी हुई शालिनी को सारा संसार घूमता हुआ प्रतीत हुआ था. उसका अनदेखा भविष्य उसे बुरी तरह से मथने लगा था. वह किधर जाए और कहां जाए? कुछ भी तो निश्चय नहीं कर पा रही थी. तभी जुगलाल ने उसके कमरे में प्रवेश किया था. चौंक कर वह पलंग से उठ गई थी. भयाकुल हिरणी सी वह इधर-उधर देखने लगी थी.

जेठ ने पलट कर अंदर से दरवाजे पर सिटकनियां लगा दी थीं.

शालिनी का माथा ठनका था. जेठ तो नशे में धुत थे. उन्होंने बिना किसी पूर्व सूचना के उसे अपनी बांहों में भर लिया था. वे बहके हुए स्वर में बोले थे, "कैसी है डार्लिंग? फिकर नॉट. जब तक मैं हूं..."

"हटिए!" उसने अपने आपको छुड़ाने का प्रयत्न किया था, "आपको शर्म नहीं आती?"

"शर्म काहे की?" उनकी वही बहकी हुई आवाज़ थी.

"मैंने तेरी जीजी से पूछ लिया है. इन संबंधों पर उसे कोई ऐतराज़ नहीं है."

"ऐतराज़ मुझे है." चड़िका बन आई शालिनी ने उनके गाल पर एक तमाचा जड़ दिया था. "मुझे नहीं मालूम था कि आप इतने नीचे निकलेंगे. आप तो पूरे ही आस्तीन के सांप निकले."

जुगलाल तो पूरे ही चिकने घड़े थे. उन्होंने जैसे पहले से ही निश्चय कर रखा था. वासना के उस कीड़े ने उसे उठा कर पलंग पर डाल दिया था. शालिनी ने पूरी ताक़त लगा कर उनका प्रतिरोध किया था. उसने उन्हें दांतों से भी काट खाया था. अंततः वह लुट कर ही रही थी. जेठ ने उसे कहीं भी मुंह दिखलाने के काबिल नहीं रखा था.

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तब से जीती-जागती शालिनी एक प्रकार से अपने कंधों पर अपनी ही लाश ढोती चली आ रही है. दागी ज़िंदगी की दास्तान वह कहे भी तो किससे? उसकी सुनने वाला भी तो कोई नहीं है. जेठ के प्रति हर समय ही उसके अंतर में नफ़रत की आग सुलगती रहती है. आहत सर्पिणी सी हर समय वह फुफकारती ही रहती है. वह अवसर की प्रतीक्षा में है.

कांता ने बाहर से उसकी तंद्रा भंग की, "अरी, चाय नहीं पिएगी?"

"अं..." शालिनी सामान्य हो आई.

देखा तो अंदर जेठानी टेबल पर नाश्ता लगा चुकी थीं. उनकी चारों बच्चियां नाश्ता लेने लगी थीं. वह भी वहीं चल दी. मन मार कर वह चाय पीने लगी. चाय पीकर बच्चियां बाहर चल दीं.

"शालू..." कांता के अधरों पर रहस्यभरी मुस्कान उभर आई, "तू उनसे घृणा करती है न?"

शालिनी चुपचाप चाय पीती रही. वह जेठानी के चरित्र के बारे में सोचने लगी. अपने सामने वे उसे एकदम ही बौनी लगने लगीं. तीन-चार घरों में भटकनें के बाद ही वह जुगलाल के यहां आई है.

"बोलती नही." कांता ने उसे फिर से कुरेदा.

"आज वे आ रहे हैं क्या?" शालिनी ने पूछा.

"हां." उन्होंने रात की गाड़ी से आने को लिखा है. कांता ने बताया, "तू किसी प्रकार की चिंता न कर. जो बीत गया, उसे भूल जा. धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा."

शालिनी का मन हुआ कि जेठानी के मुंह पर थूक दे. किंतु वह ऐसा भी तो न कर सकी.

"देख री." कांता के स्वर में मिश्री घुल आई, "मैं तो अब मां बनने से रही. फिर क्यों न तेरी कोख... आख़िर वंश बेल भी तो..."

शालिनी खून का घूंट पी कर रह गई. चाय पीकर वह बाहर आंगन में चल दी.

शाम धीरे-धीरे रात में ढलने लगी. कांता एक कमरे में शालिनी के सोने की व्यवस्था करने लगी. वहां उसने अगरबत्तियां जला दीं. वह उसके पास आकर बोली, "शालू, तू कब तक मन मारती रहेगी? तेरे खाने-खेलने के दिन हैं. आज तू उन्हीं के साथ सो ले. बेकार में रंभाने से क्या फ़ायदा?"

शालिनी ने चुप रहना ही ठीक समझा.

"देख..." कांता ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया, "ऐसे में तुझे भी दर-दर भटकने की ज़रूरत नंहीं है, दोनों बहनें एक ही खूंटे से बंधी रहेंगी."

बाहर द्वार पर किसी ने दस्तक दी. कांता उठ गई, "वे आ गए हैं शायद."

बाहर सचमुच ही जुगलाल थे. आज भी वे अपने साथ बहुत सारा सामान लाए हुए थे. शालिनी को देख कर वह मुस्कुरा दिया, "कैसी है शालू?"

शालिनी ने मुंह फेर लिया. जुगलाल ने कपड़े बदले. कांता उन्हें खाना खिलाने लगी. शालिनी अपने बचाव का उपाय सोचने लगी. कैसे उस नर-पिशाच से छुटकारा मिले?

जेठानी ने किनारे वाला कमरा ऐसे ही सजा दिया था जैसे कि कभी जयंत के लिए सजाया था. देख कर शालिनी की आंखें भर आईं. मन मार कर वह उसी कमरे में चल दी.

आधी रात के आसपास जुगलाल अंदर कमरे में आ गए. शालिनी अब भी अपने बचाव का रास्ता नहीं सोच पाई थी. तभी उसे एक उपाय सूझ आया.

"कैसी है डार्लिंग?" कमरे में आते ही जुगलाल ने उसके लिए अपनी दोनों बांहें पसार दीं. उनके मुंह से शराब के भभाके उठ रहे थे.

शालिनी बाहरी मन से मुस्कुरा दी, "आज मेरा... दूसरा ही दिन है. आप कल-परसों..."

"ओह..." जुगलाल ने हिचकी भरी, "यह तो अच्छी बात है. कल सुबह-सवेरे सबसे पहले मेरा ही मुंह देखना. इससे हमारा कुल दीपक भी हमारी ही शक्ल का होगा."

शालिनी चंडिका बनती-बनती रह गई. तो क्या वह बदमाश उसे बच्चे जनने की‌ मशीन भर समझे हुए है? वह चुप ही रही. किसी प्रकार उसने वह रात काट दी.

तीसरा दिन भी आ गया. जेठ सुबह से ही छैला बाबू बनने लगे. उधर शालिनी अंदर ही अंदर प्रतिशोध की आग में दहक रही थी. उसी मनोदशा में उसने जेठ को ठिकाने लगाने का निश्चय कर लिया. उसने सुन रखा था कि अधिक नींद की गोलियां लेने से आदमी हमेशा के लिए सो जाया करता है. बाज़ार से वह नींद की गोलियां ख़रीद लाई. उन्हें पीस कर उसने एक ओर रख दिया.

"शालू." दोपहर को जेठ ने उसके कमरे में आकर कहा, "तो आज हम दोनों नए सिरे से सुहागरात मनाएंगे."

"आप पीते भी हैं न?" उसने भोलेपन से पूछा.

"हां!" जुगलाल ने कंधे उचका दिए, "पीकर तो मुझे नर्क भी स्वर्ग दिखाई देने लगता है."

"ठीक है." शालिनी मुस्कुरा दी, "तो आज मैं आपको अपने ही हाथों से पिलाऊंगी."

"जियो." जुगलाल का खुरदरा हाथ उसके कंधे पर आ लगा, "साकी और शराब दोनों का नशा बुलंदियों को छूने लगता है. आज तो मैं जीते जी स्वर्ग चला जाऊंगा."

शालिनी की शह पाकर जुगलाल को बिन पिए ही नशा सा चढ़ने लगा. वे दूसरे कमरे से बोतल उठा लाए.

"जब मैं आऊं तो जाम तैयार रखना."

"ठीक है." शालिनी ने वह बोतल ले ली.

आधी रात हो आई थी. शालिनी पिसी हुई नींद की गोलियों को ग्लास में डाल चुकी थी. बाहर आहट हई, वह ग्लास में शराब उंडेलने लगी. ऐसे में उसकी आंखों के आगे एक दूसरा ही दृश्य नाचने लगा.

वह कोर्ट के कठघरे में खड़ी है.

सरकारी वकील दलील-पर-दलील देता हुआ उसे दोषी सिद्ध करता आ रहा है.

द्वार की चीं-चूं ने शालिनी के उस दृश्य को धो-पोंछ दिया सामने खड़े जुगलाल को देख कर उसका कलेजा तेजी से धड़कने लगा. अंदर के दृश्य को देख कर उनकी बांछें ही खिल आई. सेंटर टेबल पर शराब का ग्लास लबालब भरा रखा था. उनके मुंह में पानी भर आया.

"हम आ गए जानेमन." किसी खलनायक के अंदाज़ में जुगलाल उसी की बगल में आ बैठे

"साकी और शराब भी तैयार है. शालिनी ने उनके हाथ में वह जाम थमा दिया, "आज तो मैं भी जीते जी..."

जुगलाल घूंट पर घूंट भरने लगे. हर घूंट उन्हें मदहोश करने लगा. ग्लास खाली करते ही वे नीचे एक ओर लुढ़क गए. उनका मुंह खुला का खुला ही रह गया. शालिनी ने पिच्-्से  उनके मुंह पर थूक दिया, अगले ही क्षण उसके हाथ अटैची में कपड़े ठूंसने लगे. शराब की बोतल और ग्लास दोनो को तोड़ कर उसने उन्हें गटर में फेंक दिया. उधर जुगलान एकदम ठंडे पड़ चुके थे.

बाहर सांय-सांय कर रात गुज़रती जा रही थी. भयाकुल शालिनी वहां से जल्द से जल्द भाग जाना चाहती थी. हाथ में अटैची लिए हुए वह कमरे से निकल कर बाहर सड़क पर आ गई.

अशांत शालिनी की आंखों के आगे अब एक दूसरा ही दृश्य उजागर होने लगा. उसे फांसी के फंदे पर चढ़ाया गया है. उससे उसकी दिली इच्छा पूछी जा रही है. भविष्य की तो कल्पना मात्र से ही उसका सारा शरीर पसीने से तर-बतर हो आया.

"जो होगा देखा जाएगा." शालिनी स्वयं को धैर्य बंधाने लगी. वह और भी तेज़-तेज़ कदमों से बस अड्डे की ओर जाने लगी.

- डॉ. शीतांशु भारद्वाज

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