- संजीव निगम
शायद जीवन के यह ढके पक्ष तुम्हें चौंका रहे है. अचम्भा मत करो. जीवन हमारे सोचने, समझने और पढ़ने से कहीं ज़्यादा जटिल और नग्न है. मैं तो ख़ैर उसकी बात क्या मानती, लेकिन यह सोचकर भी घिन आती है कि कितनी दयनीय परिणति हो सकती है प्रेम विवाह की भी. कभी-कभी मुझे लगता है कि प्रेम को लड़कियों की पढ़ाई का एक अनिवार्य विषय बना देना चाहिए, ताकि वे प्रेम और आकर्षण में अन्तर समझ सकें.
आज की इस रात जब घर के सब लोग बाहर चौक में नवरात्रि के डांडिया रास में मस्त होकर सब कुछ भूले हुए हैं. मैं घर पर बैठी तुम्हारे पत्र का जवाब लिख रही हूं. मेरे न चाहते हुए भी मेरी एकाग्रता तोड़ते हुए डांडिया के गीत के स्वर कमरे के भीतर सरक आते हैं.
"हूं तो कागड़िया लखी-लखी थाकी, कानूड़ा तारा मन मा न थी..." इसके अतिरिक्त राधा और कह भी क्या सकती है कि 'मैं तो पत्र लिख-लिख कर थक गई, लगता है कि कृष्ण तेरे मन में मेरे लिए प्यार ही नहीं है...' है न! कितनी सरल और करूण पुकार राधा के मन की. ऐसा लगता है जैसे प्यार का अथाह समुद्र चट्टान से टकराकर हताश वापिस लौट रहा है. कितना व्यापक है राधा का सन्तोष जो पत्र लिख-लिखकर थकने के बाद भी क्रोध में नहीं बदलता है, बल्कि सिर्फ़ यही सोचकर रह जाता है कि कृष्ण के मन में मेरे लिए प्यार ही नहीं रहा. क्यों किशोर, कितनी अजीब बात है, जो बीता कल स्वीकार न कर सका, उसी को दायित्व दिया आने वाले कल को दिशा देने का. शायद प्यार को सहज रूप से स्वीकार न कर पाने की कमी के कारण ही कृष्ण अन्ततः विनाश के सूत्रधार बने.
ख़ैर जाने दो, इस तरह से सोच-विचार करते रहने के कारण तुम तो पहले से ही मुझे फिलॉसफर कहते रहे हो. लेकिन सच बताऊं तो यदि मैं इस प्रकार से सोच न पाती तो शायद आज तुम्हारे पत्र का जवाब न दे पाती. इस पत्र के द्वारा तुमने दूसरी बार मेरे सामने विवाह का प्रस्ताव रखा है. तुम्हें याद तो होगा ही कि पहली बार तुमने कब यह प्रस्ताव रखा था.
तुम कुछ ही मुलाक़ातों में मुझ पर इतने आकर्षित हो गए थे कि अपनी दो साल पुरानी मंगेतर से सम्बन्ध तोड़कर मुझसे विवाह करना चाहते थे. मैं मानती हूं कि मैं भी तुम्हारे प्रति आकर्षित थी. सच तो यह है कि मैं पहली ही मुलाक़ात में तुम्हारे सोचने के ढंग से प्रभावित हो गई थी.
ओफ़! कितने प्रगतिशील विचार ओढ़ रखे थे तुमने.' तुमने वही कहा जो मैं किसी पुरुष के मुंह से सुनना चाहती थी. नारी स्वतंत्रता और स्त्री-पुरुष समानता की बातें किताबों में पढ़ते-पढ़ते मैं तंग आ चुकी थी. अपने आसपास के जीवन में इन बातों को एक छलावे की तरह ही पाया था मैंने, किन्तु तुमने इतनी गम्भीरता से इन बातों को मेरे सामने रखा था कि अचानक ही मुझे ये सब कितनी व्यावहारिक लगने लगी थी.
मैं यह सोचकर बहुत ख़ुश थी कि आख़िरकार मैंने एक ऐसे पुरुष का साथ पा लिया, जिसका साथ मेरे व्यक्तित्व को सार्थकता प्रदान करेगा और मैं तुम्हारी ओर खिंचती चली गई. पर उस दिन होटल के फैमिली केबिन में साथ बैठकर चाय पीते हुए तुमने अचानक मुझसे कहा, "दिव्या, मैं अपनी मंगेतर को छोड़कर तुमसे विवाह करना चाहता हूं."
चाय के प्याले में घूमता चम्मच ज़ोर से ठक करके बजा और रूक गया. मेरे आसपास सब कुछ जैसे थम गया था. मुझे याद है कि कितना अटकते हुए मैंने तुमसे पूछा था, "तो... तुम्हारी सगाई हो चुकी है." उसके बाद तुमने भावुकता से भीगे स्वरों में न जाने क्या-क्या कहा था. पर मैं उन्हें नहीं सुन रही थी, बल्कि अपने अन्दर की दृढ़ता को आवाज़ दे रही थी.
तुम्हें तो ज़रूर याद होगा कि मैंने तुमसे क्या कहा था. मैंने कहा था, "तुमने अपनी मंगेतर की बात को छुपाया इसका मुझे दुख नहीं है. दुख है तो इस बात का कि तुम भी औरों जैसे ही निकले. उतने ही आत्म केन्द्रित, उतने ही पाशविक, सिर्फ़ अपना ही सोचा."
और मैं वहां से उठकर चली गई थी. उसके बाद हमारे सम्बधों ने वापिस मित्रता का जामा पहन लिया था. मैं तुमसे नफ़रत करके स्वयं को कमज़ोर नहीं करना चाहती थी. मैं स्वाभाविक रहना चाहती थी. किन्तु तुम नहीं जानते, तुम्हारी इस एक बात ने मेरे मन में बने तुम्हारे व्यक्तित्व के चित्र में कितनी गहरी लकीर खींच दी थी.
आज मुझे याद आ रहा है कि एक बार मेरे गोरे रंग की प्रशंसा करते हुए तुमने कहा था, "गोरे रंग को लेकर मेरे मन में हमेशा एक ग्रन्थि रही है. गोरा रंग मेरी कमज़ोरी है, जो ईश्वर ने मुझे नहीं दिया है."
अब मुझे लगता है कि मेरे शरीर का गोरा रंग ही तुम्हारे आकर्षण का केन्द्र रहा है और मैं समझती रही थी कि तुमने मेरे भीतर झांक कर मेरी गहराइयों को पहचाना है. किन्तु फिर भी सच मानना किशोर यदि तुम आरम्भ से ही अपनी वास्तविकता के साथ मुझसे मिलते तो शायद आज मुझे इतनी तकलीफ़ नहीं होती. कम से कम तुम्हारे आकर्षण का केन्द्र तो स्पष्ट रहता. उस पर किसी लफ्फाजी का आवरण तो न पड़ा होता.
धीरे-धीरे रात गहराने लगी है और साथ-साथ डांडिया के स्वर भी तीव्र होते जा रहे हैं. उसके सधे हुए स्वर बता रहे है कि नाचने वाले कितनी तन्मयता से नाच रहे है. लेकिन मेरे विचार भटकने लगते हैं, बहुत मुश्किल से रोक पाती हूं. तुमसे कुछ कहना चाहती थी पर समझ नहीं आता कैसे शुरू करूं.
कुछ दिन पहले मेरे पड़ोस में रहने वाली हेमा आई थी. उसका पति उसे रोज़ बुरी तरह से मारता है. जानना चाहते हो क्यों? क्योंकि वह अपनी ज़िन्दगी की इस जोंक यानी अपने पति के भोगने के लिए कोई अन्य स्त्री नहीं जुटा पाती है. सिहर गए न यह बात सुनकर, लेकिन यह भी एक सच है, कड़वा-तीखा धारदार सच. तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं कि इन दोनों ने प्रेम विवाह किया था और यह स्त्री मेरे पास इसलिए आई थी कि वह किसी तरह से मुझे इस कार्य के लिए तैयार कर सके.
शायद जीवन के यह ढके पक्ष तुम्हें चौंका रहे है. अचम्भा मत करो. जीवन हमारे सोचने, समझने और पढ़ने से कहीं ज़्यादा जटिल और नग्न है. मैं तो ख़ैर उसकी बात क्या मानती, लेकिन यह सोचकर भी घिन आती है कि कितनी दयनीय परिणति हो सकती है प्रेम विवाह की भी. कभी-कभी मुझे लगता है कि प्रेम को लड़कियों की पढ़ाई का एक अनिवार्य विषय बना देना चाहिए, ताकि वे प्रेम और आकर्षण में अन्तर समझ सकें.
इस घटना के थोडे दिन बाद एक और युवक से मेरा परिचय हुआ. वह भी मुझसे शादी करने को आतुर था. अपनी नज़रों में वह भी बड़ा सभ्य सुशिक्षित था. उसके विचार सुने. अरे बाबा, वे तो तुमसे भी कहीं ज़्यादा क्रान्तिकारी थे. वह कहता था कि वह अपनी पत्नी को पूर्णतया स्वच्छन्द रखेगा. उसके किसी कार्य में कोई दखल नहीं देगा, चाहे पत्नी कहीं आए-जाए, किसी से हंसे-बोले या कुछ भी करे.
मैंने उससे पूछा, "और आप पत्नी से क्या चाहेंगे." तो उत्तर में उसने जो कुछ कहा उसका अर्थ यह निकलता था कि वह पत्नी को स्वतंत्रता देने की आड़ में अपनी आवारगी को मान्यता दिलाना चाहती था.
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अब ये तुम्हारा पत्र आया है जिसमें तुमने लिखा है- "दिव्या, मैंने अपनी मंगेतर से सम्बन्ध पूरी तरह तोड़ लिए हैं. अब मैं फिर से तुम्हारे सम्मुख विवाह का प्रस्ताव रखता हूं. तुम स्वीकार करोगी न!"
कितने अफ़सोस की बात है कि तीन साल तक किसी की भावनाओं से खिलवाड़ करने के बाद उसकी जगह मुझे नए खिलौने की तरह इस्तेमाल करना चाहते हो, छि.
याद है, मैंने तुम्हारी मंगेतर के विषय में जानने के बाद हुई हमारी किसी मुलाक़ात में तुमसे कहा था, "किशोर हम मित्र ही ठीक हैं. तुमने जिसको साथ निभाने का वचन दिया है, उसी के रहो. जो विचार तुम्हारे मुंह से निकले हैं एक बार, उन पर मज़बूती से खड़े रहो तो मेरी नज़रों में तुम बहुत ऊंचे उठ जाओगे. मैं सचमुच अपनी आंखों से एक ऐसे आदमी को देखना चाहती हूं, जो नारी की अस्मिता व स्वतंत्रता की अमूर्त बातों को जीवन प्रदान कर सके."
उस समय तुम मान गए थे, लेकिन तुम्हारा वह मानना अपने आपको क्षणिक लज्जा से बचाना भर ही था. नारी के समक्ष अपनी हार को छुपाने वाला पुरुषों का घायल अहम्भाव.
बुरा न मानना किशोर, कभी-कभी मेरे सामने हेमा के पति, उस नवयुवक का व तुम्हारा चेहरा गड्ड-मड्ड होने लगता है. ऐसा लगता है कि रंगमंच पर तीन अभिनेता एक ही पात्र को अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत कर रहे हों और मैं ग़ुस्से से जलने लगती हूं. मन करता है तुम लोगों के चेहरों से मुखौटें नोंच कर तुम्हारी असलियत को बेपरदा कर दूं.
पत्र बहुत लम्बा हो गया है. अपने मन की बात न मिल पाने के कारण तुम्हें वैसे ही झल्लाहट हो रही होगी. बाहर गीत के बोल बदल गए हैं लेकिन मेरे मन में वही कड़ी गूंज रही है, "कानूड़ा तारा मन मा न थी."
याद रखना किशोर, महाकवियों ने राधा की करूणा का चाहे कितना बखान किया हो, लेकिन मेरी दृष्टि में दो ही चीजें सत्य है एक राधा का कृष्ण के प्रति प्यारं व दूसरी राधा की दृढ़ता जिसके कारण कृष्ण के चले जाने के बाद भी, राधा अनुगामिनी नहीं बनी, बल्कि अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए वहां रही, उसी जगह. प्यार व दृढ़ता दोनों में राधा ने कृष्ण को मात दे दी. शायद इसीलिए राधा का नाम पहले आता है, कृष्ण का बाद में.
मेरे इस पत्र से तुम अपना निष्कर्ष निकालने को स्वतंत्र हो. मुझे जो कहना था, कह दिया. मैं बार-बार पत्र न लिख सकती हूं और न लिखूंगी. तुम्हारा भी कोई उत्तर न ही आए तो अच्छा है. यही हमारे सम्बन्धों की इति है और एक नई मज़बूती की शुरूआत.
बस,
दिव्या
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