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कहानी- प्रणय-निवेदिता (Short Story- Pranay-Nivedita)

अनेक रोमांचित कल्पनाओं में वह हर पल खोई रहने लगी. उसके मन में बार-बार आता कि वह भाग कर जाए और अपने महबूब के सीने से लग कर सुध-बुध खो बैठे, पर लज्जा उसका मार्ग रोक कर खड़ी हो जाती थी. तमाम कोशिशों के बाद भी उसके पैर लालबाग़ के महल की ओर बढ़ नहीं सके.

युद्ध भूमि से लौटने के बाद रोशनआरा कुछ खोई-खोई-सी रहने लगी थी. तमाम लोगों ने कारण जानने की कोशिश की, पर उसने किसी से कुछ नहीं बताया. रहस्य पर पर्दा ही पड़े रहने दिया. रोशनआरा की आंखों के सामने अब हर समय बजाजी निम्वालकर का चेहरा ही नाचता रहता था.

बजाजी का शस्त्र संचालन, स्फूर्ति, विश्वास से भरी आंखें, आत्मबल और उत्साह देखकर रोशनआरा उसे अपना दिल दे बैठी और तभी से उसे अपने हृदय सिंहासन पर बिठाकर उसकी पूजा-अर्चना करने लगी थी. बुतपरस्त हो गई थी वह. रात-दिन बजाजी के काल्पनिक रूप के सामने अपने हृदय की व्यथा-कथा कहती रहती.

उसकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि पराजित होने के बाद भी बजाजी को अब्बा हुजूर ने क़ैद अथवा सजाए मौत क्यों नहीं दी? अब्बा हुजूर दुश्मन पर कभी इतने मेहरबान तो रहे नहीं. रोशनआरा सोचने लगी कि काश! बजाजी हैदराबाद फतह कर लेता. अब्बा हुजूर ने उसे शाही महल में नज़रबंद करवा रखा था. रोशनआरा ने अपने आपसे सवाल किया आख़िर क्या चाहते हैं अब्बा हुजूर? उनके दिल की गहराई का पता लगाना बहुत मुश्किल है.

वक़्त तेज़ी से भाग रहा था, पर कोई रात ऐसी नहीं गई, जब रोशनआरा को ठीक से नींद आई हो. उसकी नींद तो जैसे हमेशा के लिए बजाजी चुरा ले गया था. वह रात भर करवटें बदलती रहती.

रोशनआरा बार-बार खुदा से दुआ मांगने लगी थी कि बजाजी, उसका महबूब उसे शौहर के रूप में मिले. अब तो उसके अलावा किसी दूसरे के बारे में वह ख़्वाब में भी नहीं सोच सकती. वह जानती है कि उसके जिस्म पर भले ही किसी और का हक़ हो जाए, पर उसके मन, प्राण, हृदय पर हमेशा बजाजी का ही अधिकार रहेगा.

रोशनआरा बजाजी को जितना भुलाने की कोशिश करती, वह और याद आने लगता. उसका गोरा चेहरा, उन्नत ललाट, बड़ी-बड़ी रक्तवर्णी आंखें, चौड़ा वक्षस्थल, मज़बूत भुजाएं, औसत दर्जे का क़द, उसके मन प्राण को मथने लगता. बजाजी का चेहरा सामने आते ही उसके मन में तूफ़ान सा मच जाता. उसे नहीं लगता कि यह तूफ़ान अब कभी थमेगा.

मैदाने जंग में बजाजी से हुए मुक़ाबले ने रोशनआरा का जीवन बदल दिया. उसी दिन से वह अपने को बजाजी के अनुकूल गढ़ने लगी थी और हिन्दी, मराठी, गुजराती और संस्कृत भी पढ़ने लगी थी. गीता, रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थों में भी उसकी आसक्ति बढ़ने लगी थी. सही मायनों में समय के साथ-साथ वह काफ़ी हद तक विदुषी हिन्दू कन्या बन गई थी.

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वक़्त तेज़ी से भाग रहा था, पर कोई रात ऐसी नहीं गई, जब रोशनआरा को ठीक से नींद आई हो. उसकी नींद तो जैसे हमेशा के लिए बजाजी चुरा ले गया था. वह रात भर करवटें बदलती रहती. लेकिन आज रोशनआरा अपने को रोक नहीं सकी. रात के दो बज रहे थे, वह आहिस्ता से उठी, चारों ओर घना सन्नाटा था. झाड़-फ़ानूस की धीमी रोशनी चारों ओर फैली हुई थी. पूरा शाही महल गहरी नींद में डूबा था. दास-दासियां भी सो चुके थे.

रोशनआरा आदमकद आईने के सामने जाकर बैठ गई. उसने भरपूर श्रृंगार किया. बेहोश कर देने वाला उसका रूप इस श्रृंगार के बाद और भी खिल उठा. मोती जड़े स्वर्णाभूषण उसके रूप को पाकर धन्य हो गए. रोशनआरा की बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों से मानो मदरस टपकने लगा था.

अभिसारिका बनी रोशनआरा उस महल की ओर बढ़ने लगी, जहां उसका प्रियतम बजाजी नज़रबंद था. किसी प्रहरी का साहस नहीं था कि उसका मार्ग रोकता. वह बजाजी की यादों में इस तरह खो चुकी थी कि उसे न तो प्रहरी की चिंता थी, न राजदण्ड का भय. प्रेम का उन्माद ही ऐसा होता है.

बजाजी को नींद नहीं आ रही थी. किसी तरह से वहां से निकल सके, यही उसकी चिंता थी. यवन के हाथों पराजित होने का उसे बेहद दुख था. वह भीतर ही भीतर छटपटा रहा था. बार-बार यही सोच उसे खाए जा रही थी कि उसके बंदी होने की ख़बर सुनकर महाराज शिवाजी को कितनी पीड़ा पहुंची होगी, माता जीजाबाई कितनी दुखी हुई होंगी. बजाजी बार-बार अपने को धिक्कार रहा था.

अचानक नूपुर की सुमधुर ध्वनि उसके कानों से टकराई. उसे लगा मानो वह ध्वनि किसी अज्ञात जगत से आ रही है. उसी बीच किसी की पदचाप सुनाई पड़ी और बजाजी चौंक कर बैठ गया... रात की निस्तब्धता को भंग करने का साहस कौन कर सकता है?

झाड़-फ़ानूस के मंद प्रकाश में किसी का चेहरा सामने आया. बजाजी चौंक कर उठ बैठा. उसे लगा जैसे सारा महल आलोकित हो उठा है. उसकी दृष्टि रोशनआरा के चेहरे पर पड़ी तो वहीं ठहर गई, अपलक उस निहारता रह गया बजाजी. सतपुड़ा और सहयाद्रि की पहाड़ियों के बीच सुदूर दक्षिण प्रदेश के रहने वाले उस युवक ने ऐसा रूप यौवन पहले कभी नहीं देखा था. वह उसे देवबाला- सी लगी. बजाजी आत्मविस्मृत सा हो उठा.

उसे लगा जैसे कोई अपने सम्मोहन में उसके रोम-रोम को बांध रहा है. बजाजी ने किसी तरह अपने को उस सम्मोहन से मुक्त किया और स्वप्न देखती आंखों पर नियंत्रण कर पूछा, "कौन हो देवी तुम?"

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"मैं रोशनआरा हूं. तुम्हारा चरण रज लेने आई थी बजाजी."

"कौन रोशनआरा? निज़ाम हैदराबाद की शह‌ज़ादी, यवन कन्या?"

"यवन कन्या ज़रूर हूं बजाजी, पर अपने को तुम्हारे अनुकूल ढाल लिया है मैंने. अब मैं मन से यवन कन्या नहीं रही, हिन्दू कन्या बन गई हूं. तुम्हारी प्रतिमा को हृदय मंदिर में स्थापित करके हर पल उसकी पूजा-अर्चना करती हूं देव."

"क्या कह रही हो रोशनआरा? मैं तो तुम्हारा क़ैदी हूं."

"नहीं देव, मैं तुम्हारी बंदिनी हूं. तुमने मुझे बंदी बना लिया है. अब तो मुक्ति पाने का कोई मार्ग ही नहीं रहा."

"तुम भूल रही हो शहज़ादी रोशनआरा, मैं तो तुम्हारे राज्य का शत्रु हूं. मुझे तो मृत्युदंड की प्रतीक्षा है देवी. यदि बच भी गया तो भी स्वतंत्र नहीं हूं. मैं महाराज शिवाजी का एक तुच्छ सेवक हूं. वैसे भी रण चण्डी का पुजारी हूं, देश को यवनों से मुक्त कराने की मैंने प्रतिज्ञा कर रखी है. मैं प्रेम की भाषा नहीं समझता देवी, मुझे तो अस्त्र-शस्त्रों की ही भाषा आती है.

"ठीक है देव, तुम मुझे अपने चरणों में थोड़ा स्थान दे दो. मैं तुम्हारे कंधे से कन्धा मिलाकर देश की यवनों से मुक्त कराने के लिए संघर्ष करूंगी. उसके बाद तुम मेरा विधिवत पाणिग्रहण करना. तुम्हारे साथ मैं हर स्थिति में ख़ुश रहूंगी."

बजाजी तुरंत कोई उत्तर नहीं दे सका. थोड़ा रुक कर उसने कहा, "इन सब बातों पर विचार करने के लिए मुझे समय चाहिए."

रोशनआरा इतना समझ गई थी कि बजाजी उसके रूप प्रभा से चकाचौंध होकर उसके मोहजाल में फंस चुका है. रोशनआरा के लिए यही बहुत था. फिर वह आशा और विश्वास से भरी हुई अपने महल लौट गई. वह भीतर से बहुत ख़ुश थी, आज रात उसने अपने प्रियतम को भर आंख देखा था.

रोशनआरा के चारों ओर अनेक सतरंगी स्वप्न मचल रहे थे. पूरी रात आंखों में ही गुज़र गई. वह स्वप्न में खोई हुई थी कि किसी की आवाज़ सुनकर चौंक पड़ी. सामने एक दासी खड़ी थी. उसने एक नज़र उस पर डाली तो घबराई हुई दासी को बोलना पड़ा, "शहज़ादी साहिबा, मुझे माफ़ करना. मुझसे गुस्ताख़ी हुई. मैंने आपकी नींद में खलल डाला. पर मैं मजबूर थी."

"क्या मजबूरी थी?"

"आपके अब्बा हुजूर ने इसी वक़्त आपको याद किया है."

रोशनआरा भयभीत हो उठी, वह शीघ्रता से उठी. एक ढीला-ढाला गाउन ऊपर से डाल कर तेज गति से अब्बा हुजूर से मिलने चल पड़ी. वहां पहुंचकर उसने देखा कि अब्बा हुजूर की आंखों से चिंगारियां निकल रही हैं. वह सहम गई. डरते-डरते उसने पूछा, "आपने हमें याद किया हब्बा हुजूर."

"तुमने गुनाह किया है, गुस्ताख़ लड़की."

"मैंने अब्बा हुजूर?"

"हां, तुमने."

"कैसे अब्बा हुजूर?"

"नासमझ बनने की कोशिश मत कर. क्या तू बजाजी को नहीं जानती? क्या तू उससे मिलने नहीं गई थी?"

रोशनआरा पर घड़ों पानी पड़ गया. उसकी स्वप्निल आंखों में भय छा गया. खिला हुआ चेहरा मुरझा गया. चेहरे की सारी लावण्यता गायब हो गई और उस पर मौत की छाया दिखाई पड़ने लगी. वह थर-भर कांपती हुई अब्बा हुजूर के कदमों पर गिर पड़ी.

'अब्बा हुजूर, मुझे माफ़ कर दें. दिल पर किसी का ज़ोर नहीं चलता."

अब्बा हुजूर की आंखों से फूटती चिन्गारियां और तेज हो गईं. वे चीख पड़े, "गुस्ताख़ लड़की, जुबान चलाती है."

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रोशनआरा की आंखें पथरा गईं. सिर धड़ से अलग होता दिखाई पड़ा. देखते-देखते उस पर बेहोशी छा गई. आंखें खुलीं तो उसने अपने आपको पलंग पर लेटे हुए पाया. सामने अब्बा हुजूर बैठे थे. इस समय उनकी आंखों में क्रोध नहीं था. उन्होंने रोशनआरा को समझाते हुए कहना शुरू किया, "देख रोशन, अब तो एक ही रास्ता है कि बजाजी इस्लाम मज़हब क़बूल कर ले. अगर वह ऐसा कर लेता है तो मैं उसके साथ तेरा निकाह करवा दूंगा. रहने के लिए तुम्हें लाल बाग़ का महल दे दिया जाएगा. जहां तुम दोनों आराम से रहना, आगे चलकर हम बजाजी को अपनी सल्तनत का वारिस बना देंगे. लेकिन बजाजी ने इस्लाम मज़हब क़बूल नहीं किया तो शाही हुक्म से उसका सिर क़लम कर दिया जाएगा. मैं तुम्हें एक हफ़्ते की मोहलत देता हूं."

रोशनआरा के सामने अब कोई विकल्प नहीं रह गया था. वह भयभीत हिरनी की तरह बजाजी के पास पहुंची और परिस्थितियां समझा कर इस्लाम धर्म स्वीकार करने की प्रार्थना की. बजाजी की रोशनआरा से यह दूसरी भेंट थी. बजाजी एक गहन द्वंद्व में फंस गया. एक ओर रोशनआरा का सौन्दर्य उसे बांध रहा था, दूसरी ओर उसका कर्त्तव्य उसे पुकार रहा था. वह एक अजीब भंवरजाल में फंसता जा रहा था.

रोशनआरा लगातार रो रही थी. वह बार-बार बजाजी से कह रही थी कि यदि उसे कुछ हो गया तो वह ज़िंदा नहीं रहेगी.

रोशनआरा के आंसू बजाजी के हृदय को कमज़ोर करने लगे थे. अचानक उसके मस्तिष्क में बिजली सी चमकी, वह उठ कर खड़ा हो गया. उसने आंसू बहाती रोशनआरा को अपनी बांहों का सहारा देकर उठाया. उसके आंसू पोंछे और गम्भीर वाणी में बोला, "जाओ रोशनआरा, अपने अब्बा हुजूर से कह दो कि मुझे शर्त मंज़ूर है. जिस प्रेम को पाने के लिए बड़े-बड़े लोग तरसते हैं, वह मुझे सहज ही मिल गया है. जीवन में सच्चा प्रेम कितनों को मिल पाता है. अधिकतर लोग प्रेम का ढोंग ही करते हैं. ये आंसू तुम्हारे प्रेम की सच्चाई को बयान कर रहे हैं."

रोशनआरा निहाल हो उठी, "तुमने मुझे ज़िंदगी बख़्श दी बजाजी. तुमने मेरी मोहब्बत की क़द्र की, मैं तुम्हारे हाथों बिन मोल बिक गई. मेरी एक-एक सांस पर तुम्हारा हक़ है. मेरे जिस्म के लहू का एक-एक क़तरा सिर्फ़ तुम्हारा है."

रोशनआरा उल्लास से भरी अपने महल लौट गई. उसने अपने अब्बा हुजूर को बजाजी के निर्णय की सूचना दी. यह सूचना मिलते ही पूरा शाही महल जगमगा उठा. निकाह और धर्म परिवर्तन की तिथियां निश्चित कर दी गईं. बजाजी की नज़रबंदी वापस ले ली गई, राज पुरुष की तरह उसका सम्मान किया गया.

लालबाग़ के महल में उसके रहने आदि का शाही इन्तजाम हुआ. महल को दुल्हन की तरह सजाया गया, रोशनआरा के मन में ख़ुशियों के चिराग़ जल उठे. वह उस दिन का बेक़रारी से इंतज़ार करने लगी जब दुल्हन की तरह उसका श्रृंगार किया जाएगा. काजी निकाह की रस्में पूरी करेगा. मेहर की शर्त रखी जाएगी. उससे पूछा जाएगा कि बजाजी उसे शौहर के रूप में क़बूल है. यह सोचते ही उसका दिल ख़ुशियों से भर उठा. कपोलों पर गुलाब के फूल खिल उठे. वह सोचने लगी, जब उसे अपने हमसफ़र के साथ पूरा जीवन बिताने का मौक़ा मिलेगा तब वह अपने दिल पर कैसे क़ाबू पाएगी, कहीं वह ख़ुशी के मारे अपने महबूब के आगोश में बेहोश न हो जाए.

अनेक रोमांचित कल्पनाओं में वह हर पल खोई रहने लगी. उसके मन में बार-बार आता कि वह भाग कर जाए और अपने महबूब के सीने से लग कर सुध-बुध खो बैठे, पर लज्जा उसका मार्ग रोक कर खड़ी हो जाती थी. तमाम कोशिशों के बाद भी उसके पैर लालबाग़ के महल की ओर बढ़ नहीं सके. उसका एक-एक पल वर्षों के समान बीत रहा था.

बजाजी लालबाग़ के एक संगमरमर के पत्थर पर शाही लिबास में बादशाही रुतबे और शानोशौक़त के साथ बैठा था. इस समय रोशनआरा के अतिरिक्त वह सब कुछ भूल चुका था. न उसे अपने कर्तव्य याद थे, न सौंपी गई ज़िम्मेदारियां, बस हमेशा आंखों के सामने रोशनआरा का चेहरा नाचता रहता.

कहानी- प्रणय-निवेदिता

अचानक किसी फकीर की आवाज़ सुनाई पड़ी. बजाजी ने चौंक कर उसकी ओर देखा, "क्या चाहिए बाबा?"

"खैरात के अलावा फकीर को और क्या चाहिए."

बजाजी ने ताली बजाई और एक सेविका सामने आकर खड़ी हो

"बाबा की झोली भर दी जाए."

बजाजी ने शाही अन्दाज़ में हुक्म दिया.

मोहरों से भरी तश्तरी लिए सेविका हाज़िर हुई. बजाजी ने तश्तरी अपने हाथ में ले ली और ख़ुद फकीर की और बढ़ा, फ़कीर बिना उसकी ओर देखे आगे बढ़ने लगा तो बजाजी ने पुकारा, "बाबा, खैरात तो ले लो."

फकीर ने कोई जवाब नहीं दिया. वह आगे बढ़ता ही रहा. बजाजी उसे बार-बार पुकार रहा था, "बाबा, खैरात तो लेते जाओ." अब तक फकीर काफ़ी दूर निकल आया था. वह रुक गया.

उसने मुड़कर बजाजी की ओर देखा और आक्रोश में भर कर बोला, "किसी राजद्रोही और विश्वासघाती के हाथों से कोई फकीर खैरात नहीं लेता."

बजाजी चौंक पड़ा. उसने फकीर की आवाज़ पहचान ली थी.

"महाराज शिवाजी आप!"

"हां मैं. तुमने एक नारी के रूप यौवन के मोहजाल में फंस कर इतना बड़ा राजद्रोह किया, इतना बड़ा विश्वासघात. तुम राज्य के सेना नायक थे. यह क्या किया तुमने भाई! तुम्हारे इस कुकृत्य से राज्य की सारी प्रजा दुखी है. माता जीजाबाई दुखी हैं, उन्हीं की आज्ञा से मैं तुम्हें लेने आया हूं."

सेविका अब भी अपने स्थान पर खड़ी थी. बजाजी ने उसे भीतर जाने का संकेत दिया. वह तेजी से लौट आई. उसके जाते ही महाराज के कदमों पर पड़ा बजाजी गिड़गिड़ाया.

"महाराज, मैं नारकीय कीट बन गया था. मेरा उद्धार करो प्रभु."

"बजाजी, तुम्हारा हृदय पश्चात्ताप की अग्नि में जल रहा है, इसलिए तुम्हारा प्रायश्चित हो गया. तुमने अपनी भूल सुधार ली बजाजी. अब चलो मेरे साथ."

फकीर ने अपनी झोली में से एक फकीरी लिबास निकाला और बजाजी को देते हुए बोला, "लो, इसे पहन लो. थोड़ी दूरी पर हमारे अश्व प्रतीक्षा कर रहे हैं."

बजाजी ने शीघ्रता से आज्ञा का पालन किया.

फिर दोनों तेजी से एक ओर बढ़े. अभी सदर दरवाज़े से बाहर निकले ही थे कि सामने रोशनआरा खड़ी दिखाई पड़ी. उसने महाराज शिवाजी को झुक कर सलाम किया और बजाजी की ओर देख कर बोली, "पलायन कर रहे हो बजाजी. अचानक तुम्हें कर्तव्य याद हो आए. सभी वादे पल भर में भूल गए. मैं तुम्हारा मार्ग नहीं रोकूंगी, किंतु इतना याद रखना कि तुम्हारे बिना मैं निष्प्राण हो जाऊंगी. ज़िंदगी की आख़िरी सांस तक तुम्हारा इंतज़ार करूंगी. जहां भी रहूंगी, जिस हाल में रहूंगी, तुम्हें कभी भूल नहीं पाऊंगी. मेरे हृदय सिंहासन पर एकमात्र तुम्हारा ही अधिकार रहेगा."

कहते-कहते रोशनआरा बेहोश होकर गिर पड़ी. महाराज शिवाजी सहित बजाजी हैरान नज़रों से बेहोश रोशनआरा को निहारते रह गए.

- रामदेव लाल श्रीवास्तव

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