लोग भले ले लें बदला पर, हम न कभी ले पाएंगे
दिल के अंदर द्वेष नहीं है, यह जग को दिखलाएंगे
ग़ैर समझ कर भले बिखेरें, कितने कांटे राहों में
शूल भले हमको मिलते हों, फूल सदा दे जाएंगे
मोड़ लिया मुख अच्छाई से, इसमें उनका दोष नहीं
ख़ुद वो भटकेंगे नित बीहड़ में, संग जग को भटकाएंगे
सही तरीक़ा जीने का यह, हाथ पकड़ कर सदा चलें
जो भी उलझन सम्मुख आए, हम मिलकर सुलझाएंगे
टीस-पीर मन को दे पीड़ा, दूर अगर होते अपने
नेह भरा मलहम हौले से, ज़ख़्मों पर सहलाएंगे
बोझ नहीं होते हैं रिश्ते, इनसे दूर नहीं होते
भूले से यदि बिखर गए ये, पुनः इकट्ठा लाएंगे
जीवन का यह मर्म अनूठा, एकाकीपन घातक है
संबंधों को नित्य सुवासित, मिलकर करते जाएंगे
- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी
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