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कहानी- निर्णय (Short Story- Nirnay)

"... उनके जवाब के पहले ही मैं अपना निर्णय दे रही हूं. मैं इंसान हूं… कोई धातु नहीं जिसे कसौटी पर परखा जाएगा. आज वो स्वयं विकलांग होते हुए भी शारीरिक कमी को नहीं समझ पा रही हैं. विकलांगता उनके शरीर में नहीं, बल्कि उनकी मानसिकता में है..."

पूरे घर में हर्ष का माहौल था. ख़ुशी की‌ जॉब लग गई थी. अभी हाल ही में उसने बीटेक की डिग्री पूरी की थी. ख़ुशी की दादी, मां, पापा, भाई सभी ख़ुशी को गले लगा रहे थे. ख़ुशी को एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी मिल गई थी. कुछ दिन बाद जॉब जॉइन करने के लिए ख़ुशी के दिल्ली जाने की तैयारी होने लगी थी. ख़ुशी को सबसे ज़्यादा अपने भाई से दूर होने का मलाल हो रहा था, जो उसे अक्सर छेड़ता रहता था.

फिर वो दिन भी आ गया जब ख़ुशी के पापा और ख़ुशी दोनों दिल्ली जाने लगे. ख़ुशी घर से निकलने लगी तो उसकी दादी ने प्यार भरा आशीर्वाद दिया कि बिटिया अपने पैरों पर खड़ी हो गई है तो अब इसके विवाह की तैयारी भी शुरू करो."

ख़ुशी हंसते हुए बोली,‌ "दादी अभी कहां… अब तो मेरे एंजॉय करने के दिन आए हैं." ख़ुशी और उसके पापा दिल्ली के‌लिए रवाना हुए.

ख़ुशी के पापा ने उससे ट्रेन में पूछा, "बेटा, मुझे भी तुम्हारे विवाह के बारे मे कुछ बात करनी थी.!क्या तुम विवाह के लिए तैयार हो? कोई तुम्हारा बॉयफ्रेंड है?"

ख़ुशी बोली, "पापा मेरा कोई दोस्त नहीं है. आप जहां तय करेंगे मैं वहाँ रिश्ता कर लूंगी. लेकिन छह महीने बाद. आप मेरे रिश्ते की बात करना."

समय पंख लगा कर उड़ता‌ गया छह महीने गुज़र गए. पापा ने ख़ुशी के लिए एक रिश्ता ढूंढ़ा.

लड़का ख़ुशी की तरह ही बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी करता था. संपन्न परिवार था. लड़के का नाम सुयश था. सुयश की मां की एक आंख नहीं थी. पता चला वो जन्मजात ही ऐसी थीं. ख़ुशी के पापा ने सुयश के पिता से बात करके ख़ुशी और सुयश की बात करवा दी थी और दोनों ने एक दूसरे को पसंद भी कर लिया था.

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ख़ुशी ने बातों ही बातों में सुयश को बताया कि उसे त्वचा संबंधी समस्या है, जिससे उसके हाथ-पैर थोड़े खुरदरे होने लगते हैं. सुयश ने कहा, "मुझे कोई दिक्क़त नहीं है, क्योंकि मुझे पता है कि कोई भी शारीरिक समस्या, हमारे हाथ में नहीं‌‌

होती. दोनों की बातों में सामंजस्य होने लगा तो बात को आगे बढ़ाते हुए यह निश्चित हुआ कि सुयश के माता-पिता भी ख़ुशी को देख लें.

ख़ुशी शालीनता से सुयश के मां-पिता के सामने आकर बैठ गई. थोड़ी देर बाद सुयश की मां ने ख़ुशी के हाथ-पैर गौर से देखें और कहा, "बेटा ये क्या हुआ है?"

ख़ुशी ने कहा, "जी मुझे ये त्वचा सबंधी परेशानी है. ये मौसम के साथ कम, ज़्यादा होती रहती है." सुयश की मां ने कहा, "इलाज़ नहीं कराया?" ख़ुशी ने कहा, "जी करवाया तो था. डॉक्टर ने कहा कि कोई ख़ास बीमारी नहीं है, ये एलर्जी है." सुयश की मां ख़ुशी के हाथ-पैर को घूरकर देख रही थीं. उन्होंने कोई ज़वाब नहीं दिया.

ख़ुशी के पापा ने उनसे फोन से पूछा, तो उन्होंने कहा कि हम डॉक्टर को दिखा कर ही जवाब देंगे. यदि इलाज़ संभव हुआ तो आप इलाज़ करने के बाद ही विवाह की बात करना ख़ुशी के पापा ने उदास होकर घर में सबको बताया.

ख़ुशी ने थोड़ा सोचकर कहा, "मुझे ये विवाह नहीं करना है. उनके जवाब के पहले ही मैं अपना निर्णय दे रही हूं. मैं इंसान हूं… कोई धातु नहीं जिसे कसौटी पर परखा जाएगा. आज वो स्वयं विकलांग होते हुए भी शारीरिक कमी को नहीं समझ पा रही हैं. विकलांगता उनके शरीर में नहीं, बल्कि उनकी मानसिकता में है.

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ऐसे लोगों के साथ मैं रिश्ता नहीं कर सकती और उनका बेटा भी अपने मां पिता के साथ विकलांग ही है, जो अपनी बात कहने में ही सक्षम नहीं. मैं सुयश को पसंद हूं, लेकिन वो अपनी मां की विकलांग सोच को नहीं समझ सकता."

थोड़ी देर पहले आए सुयश की मां के फोन से कमज़ोर हुए ख़ुशी के पापा, अपनी बेटी के शानदार फ़ैसले से मज़बूत महसूस करने लगे. उन्हें अपनी परवरिश पर गर्व हुआ. उन्होंने ख़ुशी को गले लगाकर कहा, "मेरी बेटी के मज़बूत फ़ैसले पर हज़ारों सुयश क़ुर्बान हैं. बड़े ही विकलांग हैं वो लोग, जो ऐसे हीरे को नहीं परख पाए."

- रश्मि वैभव

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Photo Courtesy: Freepik

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