“देखो थंगम,” वह कहते, “यह कर्ज़ नहीं है, यह मेरा ‘निवेश’ है. एक दिन यह ज़रूर वापस आएगा." थंगम आह भरती, “तुम्हारा यह निवेश मिट्टी में मिल जाएगा. अब तुम बूढ़े हो गए हो, अब कौन वापस आने वाला है?”
ये कहानी साठ वर्षीय दक्षिण भारतीय पेरियासामी की है, जो व्यक्ति विशेष तो नही थे परंतु उनकी सोच बहुत विशाल थी. वे हर रोज़ सुबह 6 बजे मदुरै, मीनाक्षी मंदिर के प्रवेश द्वार के सामने एक छोटा सा कपड़ा बिछाते, जिस पर पेन, पेंसिल, रबर और कंपास बॉक्स जैसी चीज़ें सजी होतीं. एक फुटपाथ की दुकान, लेकिन ख़ास कोई धंधा नहीं.
पेरियासामी का एक नियम था. जब भी कोई बच्चा पेन मांगने आता, तो वह पहले पूछते:
“बेटा, क्या परीक्षा देने जा रहे हो?”
“हां दादा. आज गणित का पेपर है. मैं पेन भूल गया हूं.”
तुरंत पेरियासामी एक अच्छी पेन चुनकर उसे देते.
“ये लो. यह लकी पेन है. जाओ, 100 में से 100 नंबर लाना."
“कितने पैसे हुए दादा?”
“पैसे बाद में. पहले परीक्षा देकर आओ. फिर वापस आकर अपने नंबर बताना, तब पैसे देना.”
बच्चे हंसते हुए दौड़ जाते. वे कभी वापस नहीं आते और पेरियासामी ने कभी किसी से पूछा भी नहीं.
उनकी पत्नी थंगम उन्हें डांटती, “क्या आप पागल हो गए हैं..? एक पेन दस रुपए की आती है. अगर आप ऐसे मुफ़्त में देते रहोगे, तो हम क्या खाएंगे? घर का किराया कौन देगा?”
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पेरियासामी एक पुरानी डायरी निकालते. उसमें उन्होंने तारीख़ के अनुसार नोट लिखा था-
12.03.2010 – रमेश – गणित की परीक्षा – पेन – बाकी
05.06.2011 – सुमति – हिंदी की परीक्षा – पेन – बाकी
18.09.2013 – मुरुगन – 10वीं बोर्ड परीक्षा – पेन – बाकी...
पूरी डायरी ऐसे ‘बाकी’ हिसाबों से भरी थी. गिनती की तो लगभग 3000 पेन. तीस हजार रुपए.
“देखो थंगम,” वह कहते, “यह कर्ज़ नहीं है, यह मेरा ‘निवेश’ है. एक दिन यह ज़रूर वापस आएगा."
थंगम आह भरती, “तुम्हारा यह निवेश मिट्टी में मिल जाएगा. अब तुम बूढ़े हो गए हो, अब कौन वापस आने वाला है?”
बीस साल बीत गए. पेरियासामी अब 80 वर्ष के हो चुके थे. आंखों से धुंधला दिखता था और सुनाई भी कम देता था.
फिर भी आज भी वही मंदिर का दरवाज़ा, वहीं कपड़ा बिछाकर बैठते थे. लेकिन अब बच्चे जेल पेन और ऑनलाइन चीज़ें इस्तेमाल करते थे, इसलिए उनका धंधा बिल्कुल बंद था.
एक सुबह मंदिर के दरवाज़े पर एक बड़ी गाड़ी आकर रुकी. लगभग 35 साल का एक आदमी बाहर निकला, सूट-बूट पहने, हाथ में फूलों का गुलदस्ता.
वह सीधे पेरियासामी के पास गया और उनके चरण छुए.
“दादा... मुझे पहचाना?”
पेरियासामी ने आंखें सिकोड़कर देखने की कोशिश की.
“बेटा... मैं अब बूढ़ा हो गया हूं. मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता.”
“दादा... 18 साल पहले... 10वीं बोर्ड की परीक्षा थी. गणित का पेपर. उस सुबह मैं रोता हुआ आया था. मेरी पेन टूट गई थी और मेरे पास पैसे नहीं थे. आपने मुझे एक पेन दी थी और कहा था- यह लकी पेन है, जाओ 100 नंबर लाना... आपने पैसे नहीं लिए थे.”
पेरियासामी को धुंधली याद आई.
“बेटा... तू...”
“मैं मुरुगन हूं दादा. मैंने उसी पेन से परीक्षा लिखी और 98 नंबर लाया. मैं पास हुआ, कॉलेज गया और आज मेरी अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी है. मेरी ज़िंदगी आपकी उस पेन से शुरू हुई थी.”
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थंगम दरवाज़े पर खड़ी यह सब सुन रही थी. उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे.
मुरुगन ने एक लिफ़ाफ़ा निकाला.
“दादा... उस दिन मुझे आपको 10 रुपए देने थे. आज मैं ब्याज सहित वापस देता हूं."
अंदर दस लाख रुपए का चेक था.
पेरियासामी के हाथ कांपने लगे.
“बेटा... मुझे पैसे नहीं चाहिए. तू सफल हुआ, वही बहुत है.”
“नहीं दादा, यह पैसे नहीं हैं. यह आपका निवेश है, जो मुनाफे के साथ वापस आया है. अब आपको इस फुटपाथ पर बैठने की ज़रूरत नहीं. मैं आप दोनों की ज़िम्मेदारी लेता हूं.”
अगले दिन अख़बार में हेडलाइन थी- सॉफ्टवेयर उद्योगपति ने फुटपाथ पर बैठने वाले दादा को 10 लाख की गुरुदक्षिणा दी!
यह ख़बर पढ़कर दूसरे दिन दूसरी गाड़ी आई.
“दादा, मैं सुमति हूं. मैंने आपकी दुकान से हिंदी परीक्षा के लिए पेन ली थी. आज मैं हिंदी की शिक्षिका हूं.”
फिर रमेश आया.
“दादा, मैं आज ऑडिटर हूं. मेरी ज़िंदगी की पहली बैलेंस शीट आपकी पेन से लिखी गई थी.”
एक हफ़्ते में तो मंदिर के दरवाज़े पर जैसे शादी का माहौल बन गया. डॉक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर, पुलिस अफसर- सब लाइन में आए, पेरियासामी के पैर छुए और फूल, फल और लिफ़ाफ़े भेंट में दिए.
थंगम ने पुरानी डायरी निकाली. 3000 एंट्री थीं, 30,000 रुपए बाकी थे।व. लेकिन आज जो वापस आया था उसकी क़ीमत 3 करोड़ से भी ज़्यादा थी.
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पेरियासामी रो पड़े और बोले, “थंगम... मैंने तुमसे कहा था न, यह कर्ज़ नहीं था. यह तो बीज थे. मैंने इन्हें बोया था और आज यह एक बड़ा जंगल बन गए हैं.”
आज मीनाक्षी मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक बड़ी दुकान है- पेरियासामी पेन स्टोर, जिसका कोई किराया नहीं है, क्योंकि मुरुगन ने वह दुकान ख़रीद ली है.
दुकान में एक बोर्ड लगा है- यहां परीक्षा देने जाने वाले विद्यार्थियों के लिए पेन मुफ़्त है. बस वापस आकर अपने नंबर बता देना. पैसे बाद में दे देना.”
उसके नीचे एक छोटी लाइन लिखी है- दस रुपए की एक पेन ज़िंदगी बदल सकती है, विश्वास रखिए!
और आपको पता है आज वह दुकान कौन चलाता है?
मुरुगन- वही सॉफ्टवेयर कंपनी का मालिक. हफ़्ते में दो बार वह अपना सूट उतारकर दुकान में बैठता है और बच्चों को पेन देता है.
“बेटा... यह लकी पेन है. जाओ, 100 में से 100 नंबर लाना."
आप जो देते हैं, वह सिर्फ़ पेन नहीं होती, वह एक आशा होती है.
एक दिन वही आशा लौटकर आपके चरणों में झुकेगी.
उस दिन आपको समझ आएगा कि आप कभी गरीब नहीं थे. आप सच में बहुत अमीर थे!
- पाठक
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