वो सुरमई शाम
जब मेरे शब्द
बिखरते चले गए थे
तुम्हारे आसपास
समंदर का किनारा
और लहरों के चक्रव्यूह
जिनसे विचारों के झंझावात
जूझ रहे थे
मैं जानती थी कि
तुम्हारे भीतर भी
जज़्बातों का सागर
लहराता है
मगर तुम्हारी ख़ामोशी
मुझे भावशून्य कर जाती थी
मैं कुछ कहना चाहती थी
मगर निःशब्द होकर रह जाती थी
और तुम्हारा अहं
तुम्हें कुछ कहने से रोकता था
समय बीत रहा था
और जब
शब्दों के सिरे पकड़ में आए
तुम जा रहे थे
दूर बहुत दूर
गीली रेत पर
अपने कदमों के निशां छोड़ते
और शाम ढल चुकी थी...
- बिन्नी पंत

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