बच्चे मन के सच्चे, मासूम, भोले-भाले होते हैं. हर कोई उन्हें प्यार-दुलार करता है. लेकिन स्थिति तब सोचनीय हो जाती है जब बच्चा की समस्या से ग्रस्त हो जाता है. ऐसे में जहां बच्चे के लिए इससे पार होना संघर्षपूर्ण रहता है तो वहीं अभिभावकों के लिए भी यह किसी चुनौती से कम नहीं होता. ऐसा ही होता रहा है आटिज़्मग्रस्त बच्चों और उनके पैरेंट्स के साथ.

ऑटिस्टिक बच्चों के पैरेंट्स किस तरह बच्चे, परिवार, समाज, संघर्ष, चुनौतियों से गुज़रते हैं, को जानने के लिए देखें-सुनें मेरी सहेली का यह पॉडकास्ट, जहां दो मांओं ने अपने आटिज़्म ग्रस्त बच्चे को लेकर खुलकर बात की है, जिससे उनकी स्थिति को गहराई से समझने का मौक़ा मिलता है. पूरा पॉडकास्ट देखने के लिए लिंक पर क्लिक करें-
एक समय था जब भारत में ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों की संख्या ना के बराबर थी. लेकिन व़क्त के साथ इसमें बढ़ोतरी होती गई. यह भी देखा गया है कि पहले इसे लेकर न ही उतनी सुविधा थी और ना ही लोगों में जागरूकता. लेकिन आज तस्वीर बदल गई है. अब लोग इसके बारे में जानने-समझने लगे हैं. साथ ही ऐसे बच्चों के माता-पिता भी काफ़ी आशावान होने लगे हैं.
मेरी सहेली द्वारा ऑटिज़्म को लेकर किए गए इस पॉडकास्ट में हमने ऐसी दो मांओं की स्ट्रगल लाइफ को बताने की कोशिश की है, जिन्होंने तमाम उतार-चढ़ाव के बाद भी हार नहीं मानी. हां, एक समय ऐसा भी आया कि वे पूरी तरह से नाउम्मीद हो गईं. ख़ुद के साथ अहित करने का भी ख़्याल आया. लेकिन कहते हैं ना जाको राखे साइयां, मार सके ना कोय... यही चमत्कार उनके साथ भी हुआ.
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कहां एक व़क्त ऐसा था कि अपने बच्चे की परवरिश को लेकर निराशा से घिर गई थीं, पर आज न केवल वे अपने ऑटिस्टिक बच्चे की अच्छी तरह से परवरिश कर रही हैं, बल्कि दर्शना जी के बेटे ने तो मल्टी टैलेंटेड संभावनाओं को दिखाते हुए कई उपलब्धियां हासिल कीं.
ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों के पैरेंट्स को समझना होगा कि यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि डिसऑर्डर है. यदि वे इसे धैर्य और आशावादी होकर डिल करते हैं तो इसके कई सकारात्मक परिणाम आते हैं. हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हर मां के लिए उसका बच्चा दुनिया का सबसे प्यारा बच्चा होता है. इसलिए यहां पर मां की भावनाओं को समझने के साथ-साथ बच्चे की मनःस्थिति को समझना और स्वीकारना होगा.
अभिनेता अनुपम खेर ने ऑटिस्टिक बच्ची पर फिल्म बनाई थी, ‘तन्वी- दि ग्रेट...’ इस फिल्म की दुनियाभर में सराहना हुई. उन्होंने दिखाया कि कैसे एक बेटी अपने पिता के सपने को पूरा करने के लिए न केवल तमाम कोशिशें करती है, बल्कि अपने साहस से सफल भी होती है. अनुपमजी ने बताया कि उनकी भतीजी जो ऑटिस्टिक है के व्यवहार और जज़्बे को देख कर ही उन्हें इस पर फिल्म बनाने की प्रेरणा मिली. इस तरह के स्पेशल बच्चों के पैरेेंट्स को यह फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए. जहां एक अकेली मां का संघर्ष, दादा-पोती की नोक-झोंक दिलों को भावविभोर कर देती है.
जब हम ऑटिस्टिक बच्चों के साथ काम करते हैं, तब हमें सबसे पहले यह ध्यान में रखना चाहिए कि उनसे वह अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिए, जो हम एक न्यूरोटिपिकल यानी आम सामान्य बच्चे के साथ रखते हैं. अगर हम किसी व्यक्ति के साथ काम कर रहे हैं, जो देख नहीं पाते हैं, तो हम उनसे यह अपेक्षा थोड़ी रखते हैं कि एक दिन वह देख पाएंगे? इसी तरह से हमें उनके साथ यह अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिए कि वह न्यूरोटिपिकल बन जाएंगे.
साथ ही हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि बच्चों को क्या पसंद है. इन बच्चों में मोटिवेशन बहुत ही कम होता है. इसलिए जो भी चीज़ उनको पसंद है, भले ही वह दूसरे बच्चों को जो पसंद है वह नहीं हो, उस चीज़ के साथ हमें उनके साथ काम करना है. उन्हें लगातार प्रोत्साहित करते रहना है. इससे उनका मोटिवेशन बढ़ेगा और वह काम करना पसंद करेंगे.
ऑटिस्टिक बच्चों के मेंटल हेल्थ को ठीक रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कभी भी हमें उन्हें यह महसूस नहीं होने देना है कि वह हम से कम हैं. वह अलग ज़रूर हो सकते हैं, लेकिन कम नहीं है. उनमें कोई कमी का एहसास उन्हें हमें कभी महसूस नहीं होने देना चाहिए. इससे उनका मेंटल हेल्थ अच्छा रहेगा. उन्हें जो पसंद है, उसी को ध्यान में रखकर उनके साथ काम करना चाहिए. उनकी जो हॉबी है, उसे बढ़ानी चाहिए.
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कई इस तरह के बच्चे हैं, जिन्होंने उनके शौक को लेकर करियर बनाया और बेहद कामयाब भी हुए. इसलिए उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए. उनकी मानसिक स्थिति को बनाए रखना चाहिए. उन्हें यह कभी महसूस नहीं करने देना चाहिए कि उनमें कोई कमी है. इसकी बजाय उनके जो अच्छे पॉइंट है, उस पर ध्यान देना चाहिए. उन्हें उनके बारे में बताना चाहिए और उनकी मुश्किलों पर काम करना चाहिए. इसी तरह से हम उनकी मानसिक स्थिति को बेहतर बनाए रख सकते हैं.
पैरेंट्स कहते हैं- हमारे घर में जो वातावरण है वह बहुत ही ख़ुशनुमा है. हम सब हंसते-खेलते हैं, बहुत ही ख़ुश हैं. हां पहले-पहले बच्चे की अवस्था को लेकर तनाव होता रहता था, हम बहुत परेशान होते रहते थे. लेकिन धीरे-धीरे हमने सब संभाल लिया. अब हमारे घर का वातावरण ख़ुशनुमा है.
पैरेंट्स ध्यान दें कि यदि आप हर वक़्त उदास रहेंगे, हर समय तनाव में रहेंगे, तो यह एंग्जाइटी आपके बच्चों पर आएगी. वह अच्छी तरह से सीख नहीं पाएंगे. आपका टेंेशन उनके ऊपर आ जाएगा. तो इसकी बजाय आप अपने बच्चा को लेकर ख़ुश रहना सीखें. उसके साथ काम करना सीखें. धीरे-धीरे आप देखेंगे कि आपका बच्चा ना केवल अच्छी तरह से सीख पाएगा, बल्कि वह बहुत ख़ुश भी रहेगा. यही तो सभी पैरेंट्स अपने बच्चों के लिए चाहते हैं.
आज बस ज़रूरत है ऑटिज़्म को सहजता से लेने और बच्चों की मानसिक स्थिति को सब्र के साथ समझने की. एक तरह से इसे नए सिरे से देखने-समझने की. फिर देखिएगा धीरे-धीरे सब कुछ ख़ुशगवार होता चला जाएगा.
- ऊषा गुप्ता

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