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कहानी- तिरस्कृत प्रेमी (Short Story- Triskrit Premi)

भावनगर से लगभग सत्तर किलोमीटर दूर समुद्र तट पर स्थित गोपनाथ मंदिर की धर्मशाला में नवोदित लेखकों–कवियों के लिए एक शिविर चल रहा था. संचालक पाठकजी बोल रहे थे और बारह युवक तथा आठ युवतियां ध्यानपूर्वक सुन रही थीं.

“कहानी लिखते समय बिल्कुल सरल भाषा में घटनाओं की बुनावट करो, तभी वह पढ़ी जाएगी. तुम्हारे पास शब्द हैं. पात्र खोजो, उनके पास कान लगा कर उनकी कहानी सुनो. हर व्यक्ति के पास एक कहानी होती है."

सबके लिए चाय आ गई तो पाठकजी रुक गए. लगभग बीस शिविरार्थियों की ओर देखकर उन्होंने सुझाव दिया, “कल सुबह की बैठक हाल में नहीं होगी. अपने-अपने समूह के साथ चाहो तो तहना तक घूम आओ और साथ ही कहानी के लिए कोई पात्र खोजना. शाम के सत्र में हर समूह से कोई एक बोलेगा. अपने पात्र के जीवन के प्रसंगों से कहानी कैसे बन सकती है, उस पर चर्चा करेंगे.”

“हम सब लड़कियां तहना जाएंगी."

उषा की कविताएं नियमित रूप से प्रकाशित होती थीं, इसलिए वही युवतियों की नेता थीं.

“बहुत अच्छा." पाठकजी मुस्कुराए.

“इन भाइयों में से भी कोई जाना चाहे तो साथ ले जाना.”

“पात्र खोजने के बहाने बहनों ने शॉपिंग का प्लान बना लिया है." राजेंद्र ने कहा तो सब हंस पड़े.

राजेंद्र, अशोक और विभाकर इन तीनों की कहानियों के कारण शिविर में उनका ख़ास मान था.

अगले दिन सुबह चाय–नाश्ता निपटा कर वे तीनों बाहर निकल पड़. गोपनाथ एकदम शांत जगह थी. मंदिर के बाहर चाय की दुकान थी. तीनों चाय के शौकीन थे. उन्हें देख कर गणेश ने भट्ठी की आंच तेज करते हुए पूछा, “आज पढ़ाई नहीं है क्या?”

“आज तेरी कहानी लिखनी है.” अशोक ने कहा।

“जल्दी से अपनी कहानी शुरू कर.” गणेश हंस पड़ा.

“मेरी कहानी कौन पढ़ेगा?”

फिर उसे कुछ अचानक याद आया तो उत्साह से बोला, “अगर सच में स्टोरी लिखनी हो तो लाइटहाउस के पास जाओ. दो–ढाई साल से एक पागल सा आदमी वहां पड़ा रहता है. दिन में दो वक़्त मंदिर में आकर खा लेता है, बाकी वहीं बैठा रहता है. कभी-कभी मांग कर चाय पी लेता है. तुम चाय ले कर जाओगे तो राज़ी हो जाएगा.”

बीस मिनट चल कर वे लोग लाइटहाउस पहुंचे. अंग्रेज़ों द्वारा बनाई गई वह लाइटहाउस अब खंडहर बन चुकी थी. उसके पीछे चबूतरे पर लगभग तीस वर्ष का एक युवक लंबा हो कर सोया था. कभी बहुत सुंदर और हष्टपुष्ट रहा होगा, पर अब वह असमय वृद्ध जैसा दिखता था. तीनों को देख कर वह चौंक कर उठ बैठा.

“गुड मार्निंग!" कहते हुए अशोक उसके पास बैठ गया और प्लास्टिक की थैली से चाय निकाल कर कप उसकी ओर बढ़ाया.

“हम लेखक हैं, इसलिए चायवाले गणेश ने आपसे मिलने को कहा है."

उसने चाय का कप लिया और तीनों को देखा.

“मेरी कहानी?” फीकी मुस्कान के साथ बोला, “गणेश दयालु है. चाय अच्छी बनाता है, लेकिन लोगों को बेवकूफ़ भी बना देता है. आज पता चला."

तीनों एक-दूसरे की ओर देखने लगे, यह आदमी चालाक है, शब्दों का खेल जानता है.

“यहां अकेले बोर नहीं होते?”

राजेंद्र ने विषय बदलते हुए पूछा.

“मैं कहां अकेला हूं?” उसने समुद्र की ओर हाथ बढ़ाया, “यह पूरा समुद्र मेरा है. यह रेत, मछलियां, केकड़े, चांद, सूरज, तारे, सब मेरे हैं. दगाबाज इंसानों से तो इनकी संगत बेहतर है.”

आगे बोलते समय उसकी आवाज़ में पीड़ा घुल गई, "ज़िंदगी मस्त चल रही थी, लेकिन एक झलक ने मेरी पूरी ज़िंदगी बर्बाद कर दी.”

वह उस बिंदु पर आ गया.

“भाग कर यहां आने के बाद आज पहली बार मुंह खोल रहा हूं.”

उसने पैर फैला दिए. उसकी निगाह समुद्र पर टिक गई.

“मेरा नाम रज़ाक है. पांच भाई-बहनों में सब से बड़ा. घर की हालत ऐसी थी कि स्कूल में पहला आता था, फिर भी आठवीं के बाद कमाने के लिए अलंग चला गया. वहां मजदूरी करते-करते वेल्डिंग में महारत हासिल कर ली. फिर भावनगर लौट कर एक फैक्ट्री में नौकरी करने लगा. लेकिन एक लड़की के चक्कर में सब बर्बाद हो गया. खुदा की क़सम आज तक उसका नाम भी नहीं जानता."

उलझे बालों में उंगलियां फेरते हुए उसने याद किया, “फैक्ट्री के गेट के पास बैठ कर वेल्डिंग करता था, तभी वह सामने से आई. जैसे बरसों से जानती हो, हैरानी से आंखें फैला कर मुझे देखने लगी. माशाअल्लाह, क़यामत ढाने वाला उसका रूप और पागल कर देने वाली आंखें.

हाथ में किताबें थीं, लगा कॉलेज में पढ़ती होगी. चली गई, लेकिन मेरी नींद साथ ले गई. रात को सपनों में उसका चेहरा दिखता. अगले दिन भी उसी समय वह मेरे पास से गुज़री और वैसे ही देखती रही. तीसरे दिन मैं सज-धजकर उसका इंतज़ार करने लगा. आप मानेंगे साहब? उसने मुझे देख कर मुस्कुरा दिया. उस पल तो नाचने का मन कर रहा था.”

गहरी सांस ले कर वह रुका. तीनों श्रोता उत्सुकता से उसे देख रहे थे.

“फिर तो रोज़ वह मुस्कुराती. मुझे जन्नत का एहसास होता. दो महीने यही सिलसिला चला. फिर हिम्मत बढ़ी, मैं भी मुस्कुरा दिया. वह चौंकी, पर फिर मुस्कुराकर चली गई. पूरा बदन सिहर उठा.

मैंने ख़ुद को समझाया कि ‘रजाक, आग यहीं रोक दे. वह कॉलेज में पढ़ने वाली हिंदू लड़की है और तू आठवीं पास गरीब मुसलमान.’

लेकिन आग रोकना मेरे बस में नहीं था. घमंड नहीं, पर उस वक़्त मैं ऋषि कपूर जैसा दिखता था, इसलिए उम्मीद थी कि बात आगे बढ़ेगी.

पांच महीने सब्र रखा. केवल मुस्कान से बात आगे नहीं बढ़ी. रविवार को हिम्मत करके प्रेमपत्र लिखा, घोघा सर्कल की एक होटल में मिलने का लिखा. सोमवार को वह आई तो मैं खड़ा हो गया और काग़ज़ बढ़ाया.

"यह क्या है?" उसने तेवर बदलकर पूछा.

"प्रेमपत्र, घर जा कर पढ़ना और शाम को आ जाना." वह बेवकूफी से चीख पड़ी. पिछले कई दिनों से मेरा सेठ मुझे देख रहा था और आसपास के दुकानदारों को भी मेरे बारे में बता चुका था. उसके चीखते ही सब दौड़ आए. पास की दुकान वाले दरबान ने मेरे हाथ से पत्र छीन कर सबके सामने पढ़ दिया. बीस लोगों की भीड़ में मैं घिर गया और वह लड़की खिसक गई.

"अब यहां दिखा तो मार डालेंगे!" यह धमकी दे कर सब मुझ पर टूट पड़े. जब तक थक नहीं गए, मारते रहे. लहूलुहान हालत में पांच घंटे सड़क पर पड़ा रहा. दिमाग़ समझ ही नहीं पा रहा था कि यह क्या हो गया. किसी तरह उठा. एक ठेलेवाले को दया आ गई. उसी के साथ यहां आ गया. सोचा कि मैं कहां आ गया."

थोड़ा रुक कर उसने तीनों को देखा.

“उस परी के मन में क्या था, आज भी समझ नहीं आया. कोई गुनाह नहीं किया, फिर भी सज़ा मिली. ज़िंदा लाश की तरह दिन काट रहा हूं.” इतना कह कर उसने हाथ जोड़ दिए, “मेरी कहानी लिखो तो उससे ज़रूर पूछना कि उसने ऐसा क्यों किया? रज़ाक का कसूर क्या था? अब मेरा दिमाग़ भारी हो गया है, प्लीज़ आप लोग यहां से चले जाइए."

तीनों उठे और लौट आए. शाम की बैठक में पाठकजी ने पूछना शुरू किया, "लेडीज़ फर्स्ट, तहना में आपने क्या किया उषाजी?”

उषा खड़ी हुईं.

“मेरे बाद सब समूह बोलेंगे, इसलिए मैं संक्षेप में कहूंगी. हम तहना के बाज़ार में एक चूड़ी की दुकान पर गए थे. वहीं उसका परिचय हुआ. उस युवती की शादी छह महीने पहले ही हुई थी. उसका मायका भावनगर में है. अगले हफ़्ते रक्षाबंधन था, इसलिए दुकान पर राखियों का काउंटर भी लगा था.

दुकानदार जब दूसरे ग्राहक को राखी दिखा रहा था तो उस युवती को भी दिखाई. तभी उसकी आंखें भर आईं. यह देख कर हमने उससे बात शुरू की."

“हम से बात करते समय उसकी भीगी आवाज़ में गहरी पछतावे की पीड़ा थी. पूरी बात बताते-बताते वह रो पड़ी.

‘मेरा एक ही भाई था." उसने कहा.

दिखने में ऋषि कपूर जैसा सुंदर मेरा भाई बाइक दुर्घटना में मर गया था. उसके सदमे से मैं डिप्रेशन में चली गई. उसी दौरान कॉलेज से लौटते समय मेरी नज़र एक युवक पर पड़ी,‌ जो वेल्डिंग कर रहा था, बिल्कुल मेरे भाई जैसा. हूबहू वही चेहरा देख कर मेरा दिमाग़ घूम गया. मैं उसे आश्चर्य से देखने लगी. दिल में अजीब सी भावना उठी. भाई जैसा दिखने वाला उस युवक को देख कर मैं ख़ुशी से मुस्कुरा दी.”

“फिर तो रोज़ कॉलेज से लौटते समय मैं उसे देख कर मुस्कुराने लगी. जैसे मेरा सगा भाई लौट आया हो. पांच-छह महीनों में इस रोज़ की मुस्कान से मेरी उदासी दूर हो गई.

लेकिन मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा हो जाएगा. ऋषि कपूर जैसा वह युवक समझ बैठा कि मैं उस पर फ़िदा हूं. उसने प्रेमपत्र दे कर होटल में मिलने के लिए बुला लिया.

मैं तो चीख पड़ी. दुर्भाग्य से वह लड़का मुसलमान था, इसलिए आसपास के लोगों ने बात को दूसरा रंग दे दिया और उसे सड़क पर मार-मारकर अधमरा कर दिया. जान से मारने की धमकी के डर से वह गांव छोड़ कर भाग गया.”

थोड़ा रुक कर उषा ने सब की ओर देखा. अब उसकी आवाज़ में भी नमी थी.

“इस बात को आज ढाई साल हो गए, फिर भी उस बेचारे का कोई पता नहीं चला. आज वह युवती अपार पीड़ा और पछतावे के साथ अपनी भूल समझती है.

अगर उस दिन वह केवल दो मिनट रुक कर लोगों के सामने सच कह देती कि यह लड़का भ्रम में है, इसमें उसका कोई दोष नहीं, ग़लती मेरी है, मैंने ही मुस्कुरा कर स्थिति पैदा की तो उस बेचारे को जानलेवा मार खा कर बदनामी ओढ़ कर भागना नहीं पड़ता.”

उषा बोलती रही. सब शांति से सुनते रहे.

राजेंद्र, अशोक और विभाकर एक-दूसरे की ओर देखते रह गए.

- वीरेंद्र बहादुर सिंह 

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Photo Courtesy: Freepik

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