एक धुंधली-सी याद है, जब वह पहली बार मेरे घर आए थे. तब मैंने अपने जीवन के उन्नीसवें बसंत में कदम रखा था. भइया ने उनसे मेरा परिचय करवाया. उन्होंने मुझसे पढ़ाई, रुचियां वगैरह के बारे में पूछा, मैं संक्षिप्त जवाब देती रही. बातचीत के दौरान ही पता चला कि उन्होंने भौतिकी से स्नाकोत्तर किया है और वे गोल्ड मेडलिस्ट भी हैं. परंतु राजनीति में उन्हें बेहद रुचि है, इसलिए वे अपनी पूरी ज़िंदगी राजनीति को ही समर्पित करना चाहते हैं, कुछ देर बात वह तो चले गए, पर उनके प्रभावशाली व्यक्तित्त्व, दिलकश आवाज़ और सांवले रंग पर मैं मोहित हो गई.
कुछ दिनों बाद भइया के पास उनका पत्र आया, उनकी लिखावट भी मोतियों जैसी थीं. उसी दिन पता चला कि वे कविताएं भी लिखते हैं. धीरे-धीरे उनकी अनेक ख़ूबियों के बारे में जानकारी मिलती रही तथा वे मुझे और भी ज़्यादा प्रभावित करते गए. कभी-कभी भइया से मिलने घर आ जाते तो मुलाक़ात भी हो जाती या भइया के लिए उनका फोन आता तो रिसीव करने की वजह से मेरी भी थोड़ी बातचीत हो जाती और मैं उनकी आवाज़ की कशिश में डूब जाती.
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इसी बीच मेरा ग्रेजुएशन पूरा हो गया और मैं उच्च शिक्षा के लिए एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय में चली गई. वहां हॉस्टल की ज़िंदगी और पढ़ाई के व्यस्त माहौल के बीच में उन्हें भूल सी गई थी. काफ़ी समय बाद मेरी चचेरी बहन की शादी में मेरा घर आना हुआ. जयमाल की रस्म के समय स्टेज पर से मेरी नज़र एकाएक उन पर पड़ी. दिल धक् से रह गया, कितनी बातें सोची थीं कि शादी में ख़ूब मौज-मस्ती करूंगी. पर उन्हें देखते ही मेरी सारी चंचलता न जाने कहां गुम हो गई. रातभर मैं बेचैन व अशांत सी रही.
मेरी सहेलियां मुझे परेशान करती रहीं कि तुम एकाएक इतनी ख़ामोश क्यों हो गई हो? क्या हो गया है तुम्हें? पर उन्हें क्या बताती, मुझे तो ख़ुद भी पता नहीं था कि मुझे क्या हो गया है. सुबह जब वह जाने लगे, मेरी आंखों में आंसू आ गए. जाने कब फिर मुलाक़ात हो. उस दिन उनकी आंखों में भी अजीब सी बेचैनी देखी मैंने.
उसके दो दिन बाद ही मेरे यहां उनकी तरफ़ से मेरे लिए शादी का प्रस्ताव आया. पापा ने मम्मी से कहा, "गुड़िया से पूछ लो, अगर उसे पसंद हो तो हमें कोई ऐतराज़ नहीं." मेरी समझ में तो कुछ भी नहीं आ रहा था. सब कुछ तो बिना मांगे ही मिल गया था. दुआ तक की ज़रूरत नहीं पड़ी. इंकार का तो सवाल ही नहीं था.
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परीक्षाएं नज़दीक थीं इसलिए जल्दी ही हॉस्टल चली गई. लेकिन जब भी पढ़ाई करने बैठती तो उनके ही ख़्याल आते. हर वक़्त आंखों के सामने उनका ही चेहरा घूमता रहता. जैसे-तैसे परीक्षाएं ख़त्म होते ही मैं घर वापस आ गई. लेकिन घर आकर पता चला कि पिताजी ने शादी से इन्कार कर दिया है, क्योंकि वे हमेशा राजनीति में रहना चाहते थे और पिताजी को राजनीति से कोई लगाव नहीं था. वे अपने दामाद को किसी अच्छे पद पर देखना चाहते थे.
मेरी तो समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि मेरे साथ इतना भद्दा मज़ाक क्यों किया जा रहा है? अगर उनसे शादी नहीं करनी थी, तो पिताजी को मुझसे मेरी पसंद पुछवाने की क्या ज़रूरत थी? मुझे सपने क्यों दिखाए गए? क्या मेरी पसंद कोई मायने नहीं रखती? फिर भी उन्होंने दो वर्ष तक मेरा इंतज़ार किया कि शायद पिताजी मान जाएं, पर एक तरफ़ पिताजी की ज़िद और दूसरी तरफ़ उनके घरवालों का दबाव बढ़ता चला जा रहा था. अंततः उन्हें किसी और लड़की से कुछ दिन पूर्व शादी करनी पड़ी. और मैं अंदर ही अंदर घुटती रही, रोती रही, पर कुछ कह न सकी. कहती तो तब न जब उन्होंने मुझसे प्यार का इज़हार किया होता, कोई वायदा किया होता. लेकिन वह तो सीधे पिताजी से ही मेरा हाथ मांगना चाहते थे. अब तो मेरी हर इच्छा मर गई है. जीवन के प्रति कोई उत्साह नहीं रह गया है. सारी उमंगें उनकी शादी की अग्नि में स्वाहा हो गई हैं.
पिताजी मेरे लिए योग्य वर की तलाश कर रहे हैं. पर मेरे दिल पर जिस शख़्स की अमिट छाप बन चुकी है, क्या उसे मिटाना इतना आसान है?
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जानती हूं कि अब वह मेरे नहीं हो सकते, लेकिन तब भी दिन-पर-दिन उनके प्रति मेरी चाहत बढ़ती ही जा रही है. किसी से शिकायत भी क्या करूं? सिर्फ़ इसी बात का अफ़सोस है-
गैरों से कहा तुमने, गैरों से सुना हमने कुछ हमसे कहा होता, कुछ हमसे सुना होता...
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