मैं समझ नहीं पाती थी कि मां को क्या ख़राब लगता है? भाभी का पर्स लटकाना, ग़लत बात पर जवाब देना या 'मास्टरनी' होना? घर के काम करती हैं, सबका ध्यान रखती हैं, फिर भी?..
मैं और पिताजी चुपचाप मां का दैनिक प्रवचन सुन रहे थे.
"आप हमेशा उसका पक्ष लेते हैं. विनोद से क्या कहें, वो तो है ही बीवी का ग़ुलाम! एक काम ढंग से नहीं करती, बस पर्स लटकाया और चल दी स्कूल. हर बात पर जवाब देती है. बहुत तेज़ है मास्टरनी!"
मैं समझ नहीं पाती थी कि मां को क्या ख़राब लगता है? भाभी का पर्स लटकाना, ग़लत बात पर जवाब देना या 'मास्टरनी' होना? घर के काम करती हैं, सबका ध्यान रखती हैं, फिर भी?..
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शाम को लगभग चार बजे घंटी बजी. भाभी ने जाली वाला दरवाज़ा खोला.
"हम लोग भारत गैस से आए हैं, आपके गैस चूल्हे के मरम्मत के लिए. ये सेवा चुनिंदा ग्राहकों को मुफ़्त दी जाती है, ये देखिए आई-कार्ड."
"लेकिन हमने तो इसके लिए कोई फोन नहीं किया."
भाभी आश्वस्त नहीं लग रही थीं.
तब तक मां शुरू हो गईं, "देखा, अब उनसे बहस कर रही है. जब पैसा नहीं ले रहे हैं तो काहे नहीं आने दे रही है..."
मांजी की बात अधूरी रह गई.
भाभी दहाड़ रही थीं, "नकली आई-कार्ड दिखाकर बेवकूफ़ बनाते हो! रुको अभी पुलिस बुलाती हूं... भाग क्यों रहे हो... दिन-दहाड़े तुम लोग लूट-पाट..."
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मैंने छज्जे से झांककर देखा, वो लोग भाग चुके थे.
पूरी बात समझते ही मां थर-थर कांपने लगीं, पिताजी ने उन्हें सहारा देकर बैठाया और मुस्कुराते हुए बोले, "कितना बड़ा हादसा टल गया! तुम सही कहती हो; बहुत तेज़ है अपनी मास्टरनी!"
- लकी राजीव

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Photo Courtesy: Frepik
