
पुष्पा भाटिया
तो सरस्वती अभी खोई नहीं है. कहीं न कहीं उसका वजूद अभी भी है. शायद सुरभि की मां की तरह उनका वजूद दूसरों के मन में भी विराजमान हो, जो बचपन में उनके साथी रहे हैं? क्या उसी सरस्वती को फिर से पा सकेंगी वो? शायद उनका अचेतन मन इसी उपहार को चाह रहा था.
सरस्वती जी ने सामने रखे फॉर्म पर एक सरसरी निगाह डाली. अन्यमयस्क हाथों में पेन पकड़ा, फिर वापस रखकर सामने बैठे बेटे से बोलीं, “आशीष मुझसे नहीं होगा, तू ही भर दे.”
“क्या मां, एक मामूली सा फॉर्म आप नहीं भर सकतीं?”
“मैंने तो पहले ही कहा था तुम्हारी मां के बस की बात नहीं है. ऐसा कर, तू ही फॉर्म भर दे. कुछ ग़लत हो गया, तो दोबारा से पूरी प्रक्रिया करनी पड़ेगी.” सेवानिवृत्त प्रोफेसर गोपाल जी ने तंज कसा, तो सरस्वती जी के हाथों में पकड़ा पेन लुढ़क कर ज़मीन पर गिर पड़ा. आशीष ने ज़मीन से पेन उठाकर एक बार फिर मां के हाथ में पकड़ाया. फिर फॉर्म के उस कॉलम पर उंगली रखकर बोला, “अच्छा, यहां अपना नाम लिखिए.”
“अपना नाम लिखूं?” अचंभित होकर बोल उठीं वो. स्वाभाविक ही था, अपना नाम लिखना तो दूर, नाम को सुने हुए भी अरसा बीत गया था.
“हां मां.”
“क्या लिखूं?” खोई हुई सी बोलीं सरस्वती जी.
“आपको नानाजी क्या कहकर बुलाते हैं, सरस्वती बिटिया न... तो लिखिए, सरस्वती देवी.” मेज़ पर झुक कर बड़ी कठिनाई से उन्होंने फॉर्म के उस कॉलम पर अपना नाम लिख दिया.
“अब अपनी डेट ऑफ बर्थ बताइए.”
“क्या बताऊं?”
“डेट ऑफ बर्थ, माने जन्मदिन.” आशीष संयत स्वर में बोला.
परेशान हो गईं वो. अच्छी भली धूप में बैठी मटर चुन रही थीं कि हमेशा की तरह उतावला सा आशीष आया और हाथ पकड़ कर उन्हें उठा दिया.
एलडीए हाउसिंग सोसाइटी ने अपनी नई स्कीम की घोषणा की थी. उसी सिलसिले में पेपर में इश्तहार प्रकाशित हुए थे. प्रत्याशियों को, फॉर्म भरकर निश्चित तिथि तक एलडीए के ऑफिस में जमा करवाने थे.
सरस्वती जी निश्चिंत बैठी सोच रही थीं कि गोपाल जी और दोनों बेटे हमेशा की तरह जो कुछ करना होगा ख़ुद ही कर लेंगे. लेकिन जब आशीष ने उन्हें पेन और फॉर्म पकड़ाया, तो घबरा गईं.
प्रोफेसर साहब ने असलियत समझाई, “करने को तो हम तीनों में से कोई भी फॉर्म भर सकता था. लेकिन मैं तो रिटायर हो चुका हूं. इन दोनों को लोन तो मिल जाएगा, पर भयंकर टैक्स पड़ जाएगा, इसीलिए सरस्वती जी आपको कष्ट दिया जा रहा है.”
लेकिन सरस्वती जी को इस समय गैस पर चढ़े कुकर की सीटियों की आवाज़ के अलावा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. आठ बजे का व़क्त हाउसवाइफ को दम मारने की ़फुर्सत नहीं होती. समय से नाश्ता नहीं तैयार हुआ, तो सब भूखे ही चले जाएंगे. बच्चों के टिफिन की तैयारी करनी थी. गुड़िया छोटी है. उसे भी तैयार सरस्वती जी को ही करना पड़ता है. उन्हें याद आया, सोनू ने कल रात चीज़ सैंडविच की फ़रमाइश की थी. सुबह दूधवाले को वॉट्सएप करना भूल गई थीं. अब दो ही विकल्प बचे थे या तो दुकान पर जाकर ब्रेड ख़ुद ही ले आएं या फिर कोई और नाश्ता सोनू की पसंद की बना दें, नहीं तो बच्चा भूखा ही रह जाएगा.
सरस्वती जी ने अपने दिमाग़ पर ज़ोर डाला. उन दिनों बच्चों का जन्मदिन तो मनाया नहीं जाता था, इसीलिए उन्हें अपनी जन्म तिथि मुंह ज़ुबानी तो याद नहीं थी. उनकी मां अक्सर बताया करतीं थीं कि वसंत पंचमी से एक दिन पहले उनका जन्म हुआ था. आशीष ने इंटरनेट का सहारा लिया. निर्णय निकला 55 साल पहले वसंत पंचमी की तारीख़ पांच फ़रवरी थी. यानी सरस्वती जी का जन्मदिन चार फरवरी होना चाहिए.
“चार फरवरी...” आशीष उछल कर बोला, “यानी कि कल. कल आप का जन्मदिन है मां. हमें तो पता ही नहीं था कि आपका जन्मदिन चार फ़रवरी को होता है.” सरस्वती जी ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. लेकिन आशीष ने पूरे घर में शोर मचा दिया, “कल हमारी मॉम का जन्मदिन है. कल हम अपनी मॉम का बर्थडे धूमधाम से मनाएंगे.”
“चुप रह. मैं क्या छोटी बच्ची हूं कि मेरा जन्मदिन मनाया जाएगा.” किसी तरह फॉर्म पर हस्ताक्षर करके वो रसोई में आकर जुट गई थीं. किसी का पोहा, किसी का ब्रेड सैंडविच, किसी का दलिया. टेबल पर घर के सभी सदस्य नाश्ते के इंतज़ार में पहले ही बैठ चुके थे. बच्चों के स्वर उनके कानों से टकरा रहे थे.
“कल दादी मां का जन्मदिन है. मैं दादी मां के लिए केक लाऊंगी.” अजय की बड़ी बेटी पीहू बोली.
“वेनिला या चॉकलेट.” चार वर्षीय सोनू की उत्कंठा भी अपने चरम पर थी.
“हम सबको मां के लिए कुछ न कुछ गिफ्ट लाना चाहिए.” अजय की पत्नी शालिनी ने अपनी तरफ़ से मशविरा दिया.
“पापा, आप क्या लाएंगे.” छोटे बेटे आशीष ने पूछा.
गोपाल जी ने अख़बार से सिर ऊपर उठाया, दो पल सोचा फिर गर्वित स्वर में बोले, “भई मैं तो अपनी पूरी पेंशन ही सरस्वती जी को दे देता हूं, जो मर्ज़ी ले लें. फिर भी तुम बच्चे जैसा कहोगे वैसा कर लूंगा.” अब पति की इस दरियादिली के आगे सरस्वती जी नतमस्तक होकर उन्हें धन्यवाद देतीं या बर्थडे गिफ्ट की उम्मीद करतीं? ये क्या बात हुई कि बच्चे कहेंगे, तो गिफ्ट दिया जाएगा. गिफ्ट तो अपने मन से दिया जाता है. लेकिन चुप रहीं. वैसे भी वे अपने विद्वान प्रोफेसर पति के आगे ज़्यादा नहीं बोलती थीं. झगड़ा तो बहुत दूर की बात है. ये बात सच है कि गोपालजी अपनी पेंशन की पूरी रकम सरस्वती जी के हाथ पर रख देते थे. ये उनकी समझदारी के ऊपर निर्भर करता था कि वो सारे रुपए चाहे सब्ज़ी, राशन और दूध के बिल, मेड की तनख़्वाह और कपड़ों की ड्राई क्लीनिंग पर ख़र्च करें या अपने लिए साड़ी, गहने या उपहार ख़रीदें. कभी हज़ार, पांच सौ बचा भी लेतीं, तो वो पैसे, अचानक आए मेहमान (जो गोपाल जी के विशाल हृदय होने के कारण अक्सर घर की रौनक़ बने ही रहते हैं) की आवभगत और शादी-ब्याह जैसे अवसरों पर लेन-देन पर ख़र्च हो जाते. समझदार पति की तरह गोपाल जी घर-गृहस्थी के मामलों में कभी दख़ल नहीं देते थे. और फिर पत्नी के जन्मदिन मनाने का ख़्याल इससे पहले उनके मन में कभी आया भी तो नहीं. हां, शुरू-शुरू में शादी की सालगिरह वाले दिन वो सरस्वती जी के साथ मंदिर ज़रूर चले जाया करते थे, लेकिन जब से बच्चे बड़े हुए, मारे संकोच के वो सब भी छोड़ दिया.
अगले दिन की सुबह और दिनों की तरह ही थी. सूर्योदय की लाली धीरे-धीरे पूर्वी आकाश पर फैलती जा रही थी. आज वो लाली सरस्वती जी को और दिनों की अपेक्षा अधिक चटख और चमकीली लगी. यही नहीं, सामने लगे नीम के पेड़ पर जो असंख्य चिड़ियों का शोर सुनाई देता था, आज उनके उस शोर में भी संगीत सुनाई दे रहा था. प्रकृति की छटा निहारते हुए सरस्वती जी के होंठों पर भी रहस्य-रोमांच की पंक्तियां उभरने लगी थीं. अपनी यह मनोदशा उन्हें ख़ुद ही अनजानी सी लग रही थी. सोच रही थीं, सुबह तो रोज़ ही होती है, आसपास का परिवेश भी लगभग ऐसा ही होता है, फिर आज ही ये सब उन्हें क्यों इतना सुखद लग रहा है?
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पूरी तरह सामान्य रहने की भरपूर कोशिश करने के बावजूद जन्मदिन का ख़्याल जब तब आकर अनजाने भाव से उन्हें गुदगुदा जा रहा था.
“मम्मा चाय.” छोटी बहू सुरभि चाय का बड़ा सा मग लेकर उनके सामने खड़ी थी. सरस्वती जी ख़्यालों की दुनिया से निकलकर यथार्थ की दुनिया में आ गईं. सुबह सवेरे, बालकनी में इत्मीनान से बैठकर बड़े से मग में चाय पीना सरस्वती जी का एकमात्र शौक रहा है. पहले ख़ुद बनानी पड़ती थी, अब बनी बनाई मिल जाती है. तब मन पुलक से भर उठता है. ये सुख भी उन्हें अभी दो महीने पहले ही मिला है जब से उनकी छोटी बहू सुरभि इस घर में बहू बन कर आई है.
बड़ी बहू शालिनी ने तो कभी चौके में जाने की कोशिश ही नहीं की. आर्किटेक्ट है. समय भी कम ही मिलता है. फिर भी अगर मन हो, तो समय निकाला जा सकता है. कंपनी अपनी है. अधिकर्ता सहकर्ता, पति-पत्नी ख़ुद ही हैं. कॉलेज से निकले ही थ,े तभी अजय ने शालिनी के साथ प्रेम विवाह करके सरस्वती जी को उनकी इस ज़िम्मेदारी से मुक्त कर दिया था. छोटे बेटे आशीष के लिए कई जगह से रिश्ते आए. लड़कियों के फोटो के साथ-साथ उनके घरवालों ने अपनी बेटियों के बायोडेटा भी संलग्न करके भेजे थे. उन्हीं में से एक बायोडेटा पर उनकी नज़र ठहर गई थी- सुरभि गौतम. अब तक लड़की का चेहरा उन्होंने देखा नहीं था. जन्म स्थान हमीरपुर उन्हें जाना-पहचाना लगा. आगे शैक्षणिक योग्यता में सबसे ऊपर लिखे कॉलेज का नाम देखकर वो चौंक पड़ीं, महिला कॉलेज, हमीरपुर. उसके बाद उन्होंने और कुछ नहीं देखा. किसी से सलाह-मशविरा किए बिना ही उन्होंने तुरंत हामी भर दी थी. सभी आश्चर्य में पड़ गए. एक साधारण से नाक नक्श वाली ग्रेजुएट लड़की को सरस्वतीजी ने अपने होनहार चार्टेड अकाउंटेंट बेटे के लिए कैसे पसंद कर लिया? गोपाल जी ने तो पूरा दिन अन्न का एक दाना भी हलक से नहीं उतारा था. कोई कुछ खाने को कहता, तो भड़क उठते, “न लड़की देखी, न परिवार वालों से मिलीं. मात्र कॉलेज का नाम देखकर रिश्ता तय करना कहां की बुद्धिमत्ता है.”
बड़ा बेटा अजय शुरू से अंतर्मुखी था. हमेशा अपने ही दायरे में रहता. बहू शालिनी ने अपनी तरफ़ से गोपाल जी को शांत करने की कोशिश की, “पापा, अगर आशीष राज़ी है, तो आप हम क्यों परेशान हों.”
“कौन जानता है आशीष राज़ी भी है या नहीं?” गोपाल जी दहाड़े. “पूरा मां का भक्त है. अगर वो उसे बिजली के खंभे पर भी पैर धरने को कहेंगी न तो भी वो उफ़्फ़ नहीं करेगा.”
“ये भी तो हो सकता है न पापा कि लड़की वालों ने यूं ही बायोडेटा भेज दिया हो. रिश्ता हो जाने की उम्मीद उन्हें भी न हो.” बड़ी बहू शालिनी ने अपनी तरह से गोपाल जी को समझाने की कोशिश की.
“आंखें मूंद कर भावुकता में निर्णय लेने वाला हमेशा ठगा जाता है.”
“निश्चिंत रहिए पापा.” न जाने कहां से हंसता-मुस्कुराता आशीष कमरे में पहुंच गया था. अगर तक़दीर मेरी मम्मा ने लिखी है न, तो मेरी क़िस्मत में कभी भी दर्द का नामोनिशान नहीं होगा. उन्होंने तो कभी मेरे बाल तक बिखरने नहीं दिए, ज़िंदगी कैसे बिगड़ने देंगी.”
पसोपेश में तो स्वयं सरस्वती जी भी थीं. हालांकि इस कॉलेज से उनकी कई इंद्रधनुषी यादें जुड़ी हुई थीं. वो ख़ुद भी इस कॉलेज की छात्रा रह चुकी थीं. लेकिन मात्र कॉलेज का नाम जानकर तो कोई अपने बेटे का रिश्ता नहीं करेगा न. इस ज़माने में तो कदापि नहीं, जब लड़के-लड़कियां, महीनों चैटिंग करते हैं, मीटिंग तय की जाती है और जब दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह समझ लेते हैं तब कहीं जाकर शादी के लिए हामी भरते हैं. ये बात तो सरस्वती जी भी अच्छी तरह समझती थीं, इसीलिए उन्होंने अपने मन की बात किसी पर ज़ाहिर नहीं होने दी थी. गोपाल जी पर भी नहीं, स्वयं सुरभि को भी कहां पता था कि उसके घर में आने की वजह क्या है. वो तो इसे अपना भाग्य और संयोग ही मान रही थी.
रातभर सरस्वती जी जुगाली करती रही थीं. कहां मायके की उन्मुक्त आबोहवा और कहां विवाह के बाद ससुराल का दबा घुटा वातावरण! अपने विचारों को छंद बद्ध करके काग़ज़ पर अक्षर या कैनवास पर चित्रों में विस्तृत फलक की तलाश करने की बजाय, जब तीनों प्रहर चौके में जाकर कलछुल जैसे नए अस्त्र को साधना पड़ा, तो मन में उबाल सा उठता. बाहर निकलने को भी जी मचलता, किंतु पीहर से मिले संस्कारों तथा अपनी सहृदयता एवं संयम के ठंडे छींटें पाकर धीरे-धीरे शांत भी हो जाता.
गोपाल जी सदैव अपने रिश्तेदारों का ही पक्ष लेते. ़
“जमाना चाहे कितना भी बदल गया हो, आज भी यह कोई अनहोनी बात नहीं है कि लड़की की योग्यता का मापदंड ही रसोई में उनकी गृहस्थी में कुशलता की माप का क्षेत्र होता है. तुम्हारे जैसी, पढ़ी-लिखी एवं प्रतिभाशाली बहू से रिश्तेदारों की अपेक्षाएं भी तो उसी अनुपात में होंगी न.”
और फिर अड़ोस-पड़ोस, नाते-रिश्तेदारों की बहू-बेटियों के वो इतने उदाहरण प्रस्तुत करते कि सरस्वती जी समझ जातीं कि एक स्त्री का समर्पण उसकी पसंद के समक्ष होता है. इसके बाद समझौता ही एकमात्र विकल्प होता है ख़ुद से, समाज से और ज़िंदगी से.
नए संबंधों की ऊष्मा में समय पंख लगाकर उड़ने लगा. अंतस में चाहे कितनी उथल-पुथल मची हो, चेहरे की ऊपरी सतह समतल ही रहती. हमेशा चहकने वाली, खिल-खिलकर हंसने वाली सरस्वती जी के इस धीर गंभीर बेहद अंतर्मुखी शांत रूप को देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि सरस्वती जी पत्थर, धातु, लकड़ी आदि से त्रिविमयी आकृतियां बनाया करती थीं.
कॉलेज में वाद-विवाद प्रतियोगिता में धारा प्रवाह बोलती थीं या तानपुरे पर भीमपलासी और मालकौंस की तान छेड़तीं, तो ऑडिटेरियम में श्रोता गण “वंस मोर, वंस मोर” की गुहार लगाते नहीं थकते थे. बेहद प्रतिभाशाली सरस्वती जी पूरे कॉलेज में लोकप्रिय थीं. शिक्षिकाएं उनकी प्रशंसा करते नहीं थकती थीं. एक बार पेंटिंग प्रतियोगिता में उनके बनाए चित्रों को पूरे राज्य में प्रथम पुरस्कार मिला, तो पूरे विद्यालय में उनके नाम की धूम मच गई.
उनके रूप गुण की ख्याति का ही नतीज़ा था कि घर बैठे ही गोपाल जी के घरवाले बिना दान-दहेज के ख़ुद उनका हाथ मांगने गए थे. और ईश्वर का वरदान मानकर ग्रेजुएशन करते ही उनके माता-पिता ने उनका कन्यादान भी कर दिया था.
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आशीष-सुरभि के विवाह को डेढ़ महीना बीत चुका था, लेकिन अंतर्मुखी सरस्वती जी अभी तक सुरभि से खुलकर बात नहीं कर पाती थीं. ऐसा नहीं था कि सुरभि उनसे दूरी बरतती थी, बल्कि वो तो अधिक से अधिक उनके आसपास रहने की कोशिश करती थी. फिर भी दोनों के बीच एक प्रकार की अदृश्य दूरी अभी तक बनी हुई थी. अपने पति के माध्यम से ही सुरभि ने उनकी पसंद नापसंद की पूरी जानकारी प्राप्त कर ली थी. सुबह उनके उठने से पहले ही गैस पर चाय का पानी चढ़ा देती. चौके में जाकर वो किसी काम को हाथ लगातीं, तो दो सुंदर, सलोने और सुघड़ हाथ उनकी सहायता के लिए आगे बढ़ जाते.
कभी-कभी मन में एक शंका भी जागती कि उनके महा शरारती, बातूनी और लापरवाह बेटे के साथ ये शांत, चुप्पी साधे लड़की निभा पाएगी भी या नहीं? किंतु आशीष या सुरभि के चेहरे पर किसी प्रकार की रेखा न पाकर वो आश्वस्त हो जातीं.
आज भी वो रोज़ की तरह ही आकर अपने काम में लग गई थीं. रोज़ की तरह सभी तैयार होकर अपने-अपने काम पर निकल गए. किसी ने उपहार का ज़िक्र तक नहीं किया. धीरे-धीरे उनके मन से भी ये बात उतरने लगी कि आज कोई ख़ास दिन है. उन्होंने सोचा कि कल मज़ाक़ ही मज़ाक़ में किसी ने कह दिया होगा, फिर भूल गए होंगे. वैसे भी, उनकी उम्र कोई जन्मदिन मनाने की थोड़े ही है.
आज तक उनके जन्मदिन को कभी किसी ने इतना महत्व दिया भी तो नहीं था. जन्मदिन तो क्या किसी ने आज तक उनकी भावनाओं की ही कद्र नहीं की थी, गोपाल जी ने भी नहीं. वो तो सुबह बच्चों ने उपहार की बात की, तो उनका मन एक अनाम सी उत्कंठा भरी पुलक से भर उठा था. अन्य दिनों की अपेक्षा वो बेचैनी से शाम की प्रतीक्षा करने लगीं. प्राइवेट कंपनियों में काम करनेवाले युवक-युवतियां शाम ढलने के बाद ही घर पहुंचते हैं, ये जानते बूझते हुए भी नज़र बार-बार दीवार पर टंगी घड़ी पर ठहर जाती थी.
कभी खिड़की से झांकतीं कभी दरवाज़े पर आकर खड़ी हो जातीं. तभी शोर मचाता हुआ आशीष कमरे में दाख़िल हुआ. साथ में सुरभि भी थी.
“बार बार दिन ये आए, बार बार दिल ये गाए, तुम जियो हज़ारों साल साल के दिन हों पचास हज़ार...” मधुर स्वर में सुरभि ने जैसे ही उन्हें गले लगाया, सरस्वती जी की आंखें नम हो आईं.
“तो आज आपका जन्मदिन है...” आशीष ने शरारत से मां की आंखों में झांका.
“ऐसा कुछ नहीं है.” उन्होंने धीमे से कहा. “है कैसे नहीं? आज हम सब अच्छी अच्छी डिशेज़ का स्वाद चखेंगे.”
“बोलो, क्या खाओगे? तुरंत चौके में जाकर तैयारी शुरू करती हूं.”
“आप कहीं नहीं जाएंगी. हम रेस्टोरेंट से ऑर्डर देकर मंगवाएंगे.”
“क्यों बेकार में पैसे फूंक रहे हो? घर में सब कुछ आधे दाम पर बन जाएगा.”
“लेकिन बर्थडे गर्ल का कितना पसीना बहेगा, इस बात का अंदाज़ा है मुझे मां.” अजय ने सरस्वती जी को गले से लगा कर कहा. “सुरभि भी तो मदद करेगी न. जब से ब्याह करके आई ह,ै मुझे करने ही कहां देती है ये कुछ भी. अब तो लगता है शरीर के जोड़ों में जंग लगती जा रही है.”
सुरभि मां-बेटे की बातें सुनकर मंद-मंद मुस्कुराती रही. थोड़ी ही देर में गोपाल जी भी पहुंच गए. अजय ने एक पैकेट उन्हें थमा दिया, तो हंस कर बोले, “क्यों रे, जन्मदिन तेरी मां का है और उपहार मुझे दे रहा है.”
“धीमे बोलिए पापा, ये पश्मीना की शॉल मैं मां के लिए लाया हूं, आप अपनी तरफ़ से उन्हें प्रेजेंट कर दीजिए.”
“मैं मैं... क्यों कर दूं, तू ही क्यों नहीं कर देता?”
“मम्मा को ख़ुश करने के लिए आप ज़रा सा झूठ नहीं बोल सकते?” गोपाल जी बुरी तरह झेंप गए. पर आशीष का अपने माता-पिता से बात करने का यही अंदाज़ था. किसी भी बात को सीधे सादे ढंग से कहना उसके स्वभाव के विरुद्ध था.
उसी व़क्त अजय और शालिनी भी आ गए. दोनों के हाथों में ख़ूबसूरत डिब्बे थे. साथ में एक ख़ूबसूरत फूलों का बुके और केक भी था. सरस्वती जी अचंभित रह गईं. इतने उपहार कैसे संभालें? उधर सुरभि ने उन्हें रसोई से भी छुट्टी दे दी थी. अकेली न जाने क्या-क्या बनाने में जुटी हुई थी. अनमनी सी सरस्वती जी आकर सबके बीच बैठ गईं. सामने रखे हुए गिफ्ट पैक खोलने में उन्हें संकोच हो रहा था. उनकी पोती ने ही कूदते फांदते, शोर मचाते हुए दोनों पैकेट खोल दिए.
शालिनी बोली, “ये देखिए मम्मा मैं आपके लिए क्या लेकर आयी हूं. एयर फ्रायर, इसमें बिना घी-तेल के खाना पक जाता है. आपके और पापा की सेहत के लिए अच्छा है. मैं कब से लाने की सोच रही थी. इससे अच्छा मौक़ा कब मिलेगा.” सरस्वती जी अपलक देखती रहीं एयर फ्रायर को. तब तक शालिनी ने दूसरा पैकेट खोला. अपनी सेल्स गर्ल सरीखी पेशेवर विनम्रता से बोली, “और ये है न्यूट्री बुलेट. इसमें आप नए-नए स्वाद की स्मूदी बना सकती हैं. ये आपके बेटे ने पसंद किया है. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, सेहत के लिए अपनी डायट पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी हो जाता है.”
सरस्वती जी ने सहमति से सिर हिला दिया. वो समझ गई थीं कि ये दोनों चीज़ें शालिनी ने ही पसंद की होंगी. आमतौर पर पुरुष तो इस तरह का उपहार पसंद नहीं करते. जो भी हो उन्हें दोनों ही उपहार सुंदर और सदुपयोगी लगे. आश्वस्त भी थीं कि उनकी नौकरीपेशा बहू भले ही कामकाज में हाथ न बंटाए, पर उनकी सुविधा-असुविधा का ध्यान तो रखती है, इसीलिए तो सही मौक़ा देखकर इतना मंहगा गिफ्ट लेकर आई है.
सरस्वती जी को ख़ुश होना चाहिए था, पर वो ख़ुश नहीं थीं. ऐसा लग रहा था कि सुबह से मन में जो उम्मीद संजोए हुए थीं, वो टूटती जा रही है. पुलक भी खोती जा रही हैं. मन की गहराइयों में कोई स्तब्धता छाती जा रही है. ये जानते हुए भी कि अब वो सोलह साल की बच्ची नहीं हैं, जो किसी से शुभकामना कार्ड या फूलों का गुलदस्ता की उम्मीद करें, फिर भी मन का एक कोना रिक्त सा था. हर बार मन को समझातीं कि ये उपहार एक गृहिणी के लिए हो सकते हैं, मां के लिए हो सकते हैं, पर सरस्वती जी के लिए नहीं हो सकते. फिर सोच के बीच एक पुरज़ोर स्वर उभरता, इसमें बच्चों का क्या दोष? उन्होंने तो अपनी मां को जब भी देखा है, रसोई में काम करते हुए ही देखा है. इसके अलावा वो मां के किसी और रूप से सर्वथा अनजान ही हैं.
अपने अंतर्मुखी स्वभाव के कारण वो अपने बचपन की बातें पति से या बच्चों से कभी शेयर करती भी तो नहीं थीं. शाम ढलते-ढलते सरस्वती जी को अपना सिर थोड़ा भारी सा महसूस हो रहा था. गोपाल जी खाना खाने के बाद टहलने चले गए. बाकी सब अपने कमरे में टीवी देखने बैठ गए. वर्ल्ड कप फाइनल चल रहा था. इतना महत्वपूर्ण मौक़ा परिवार का कोई भी सदस्य कभी नहीं चूकता. थोड़ी देर खुले में बैठने की इच्छा से वो बरामदे में आकर चुपचाप बैठ गईं. गोद में रखे पश्मीना शॉल की गर्माहट वो अभी भी महसूस कर रही थीं. एयर फ्रायर और न्यूट्री बुलेट को किचन के स्लैब पर रखना है या आलमारी में रखना है? किस सामान को हटाना है, किसे ज़रा खिसकाना है, इसी उधेड़बुन में बरामदे की बत्ती भी नहीं जलाई. आसमान में धुंधला सा चांद निकल आया था. उसकी हल्की रोशनी उनके चेहरे की कोमलता को स्पर्श कर रही थी. आंखें बंद करके वो मन को एकाग्र करने का प्रयत्न कर रही थीं कि हाथों को किसी ने हल्के से स्पर्श किया. साथ ही मीठे स्वर में किसी ने कानों में मीठा स्वर घोल दिया, “मम्मा...”
चौंक पड़ी सरस्वती जी उनके सामने सुरभि अपने हाथों में कुछ छिपाए हुए बोली, “यहां अकेली क्यों बैठी हैं?”
“बस यूं ही.” सुरभि थोड़े संकोच में खड़ी रही, जैसे किसी उलझन में पड़ी हो. फिर बेहद धीमे स्वर में बोली, “मैं आपके लिए कुछ लाई हूं.” वो कुछ नहीं बोलीं. बस सुरभि को चुपचाप देखती रहीं. धीर-धीरे सुरभि ने अपने पल्लू में छिपाई हुई वस्तु बाहर निकाली और बहुत हिम्मत बटोर कर बोली, “सबने आपको इतने सुंदर-सुंदर उपहार दिए हैं. आप मां हैं सबकी. परंतु यह सब मैं केवल मां के लिए नहीं, बल्कि लेखिका सरस्वती शर्मा जी के लिए लाई हूं.”
चिंहुक उठीं सरस्वती जी. सुरभि अपने हाथों में लाल जिल्द में एक किताब थामे सकुचाई सी खड़ी थी. उसके ऊपर रखा था एक आई पैड. सरस्वती जी किताब के पन्ने पलटने लगीं.
नारी सम्मान वो स़िर्फ रिश्तों को नहीं निभाती, अपने सपनों को भी सहेजती है. हर दर्द को मुस्कान बना कर, दुनिया को रोशनी देती है... सरस्वती जी ने पन्ना पलटा अगले पृष्ठ पर लिखा था, नारी है वो- ना कमज़ोर, न बेबस, वो ख़ुद में ही एक पूरी कायनात है, सम्मान दो हर उस कदम पर, जहां वो अपने अस्तित्व की बात करती है... बेहद आश्चर्यचकित होती हुई बोलीं वो, “ये कविताएं मैंने पढ़ी हैं.” ़
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“ज़रूर पढ़ी होंगी. आप भी तो बहुत अच्छी लेखिका हैं. कई पुरस्कार भी मिले हैं. ये देखिए, आपकी रचनाओं को ही संग्रहित करके मैंने ये किताब छपवाई है.” सोच में पड़ गईं सरस्वती जी. वो उस सरस्वती को तो स्वयं भी भूल चुकी हैं, जो चित्र बनाया करती थी, कविताएं रचा करती थीं, झरने की तरह कल कल हंसती रहती थीं, मैना की तरह बोलती थीं और कोयल की तरह गाती थीं. फिर जुम्मा-जुम्मा चार दिन पहले इस घर में आई ये लड़की उनके बारे में इतना सब कुछ कैसे जानती है? बोलीं, “इतना सब कुछ तुम मेरे बारे में कैसे जानती हो?”
“जब से होश संभाला, अपनी मां से आपके बारे में ही तो सुनती आई हूं. वो आपके साथ ही पढ़ती थीं. अक्सर कहा करतीं थीं कि मेरे साथ एक सरस्वती नाम की लड़की पढ़ा करती थी. वो बहुत ही सुंदर और प्रतिभाशाली थी.” सन्न रह गईं सरस्वती जी. कानों में मधुर संगीत बज उठा. सुरभि के शब्द बार-बार कानों में बज उठते थे. तो सरस्वती अभी खोई नहीं है. कहीं न कहीं उसका वजूद अभी भी है. शायद सुरभि की मां की तरह उनका वजूद दूसरों के मन में भी विराजमान हो, जो बचपन में उनके साथी रहे हैं? क्या उसी सरस्वती को फिर से पा सकेंगी वो? शायद उनका अचेतन मन इसी उपहार को चाह रहा था.
फिर भी तसल्ली के लिए पूछा उन्होंने, “तुम्हारी मां मुझे पहले से ही जानती थीं.”
“जी मम्मा. जब मेरी शादी तय हुई तो उनके आनंद का ठिकाना नहीं था. मुझसे बोलीं, ‘भाग खुल गए तेरे सुरभि. तेरी सास जैसी नारी विधाता बार-बार नहीं गढ़ता. सरस्वती जी बहुत अच्छी हैं.’ सच कहूं तो मुझे आशीष से पहले आपसे मिलने की उत्सुकता थी.” सुरभि की बचकानी बात पर सरस्वती जी हंस पड़ीं.
“तो पहले कभी बताया क्यों नहीं?”
“कैसे बताती? मैं तो आपके इस धीर गंभीर रूप में उस चंचल हंसमुख सरस्वती को ही ढूंढ़ती रही इतने दिन.”
“वो सरस्वती अब कहां रही सुरभि? कब की पीछे छूट गई. सारा जीवन घर-गृहस्थी को सुचारू रूप से चलाने और अपने बच्चों की परवरिश में ही निकल गया. न कोई चित्र बनाया, न कोई कविता ही लिखी.”
“कौन कहता है कि आपका जीवन यूं ही बीत गया मां?” कहते हुए सुरभि उनका हाथ थामकर वहीं फ़र्श पर बैठ गई. फिर धीमे पर स्पष्ट स्वर में एक-एक शब्द पर ज़ोर देती हुई बोली, “आपका यह सजीव घर-संसार भी निर्जीव चित्र से अधिक सुंदर है, किसी भी कविता से अधिक मूल्यवान है, मुखर है, जीवंत है.”
“वो तो सबका रहता है, मेरा अपना अस्तित्व क्या है?” सरस्वती जी ने उदास होकर कहा. सरस्वती जी पहली बार सुरभि से खुलकर बात कर रही थीं. सुरभि का संकोच भी दूर हो गया. इस लड़की की आत्मीयता ने उनके मन के तारों को झंकृत कर दिया. वो प्रसन्न हो उठी थीं. सुरभि भी मुखर हो गई. बोली, “इंसान ख़ुद को बंधन में बांधकर अपना अस्तित्व ख़ुद गंवाता है, आपने भी ऐसा ही किया है. ज़िम्मेदारियों को निभाते-निभाते आप अपनी पहचान को ही भूल गईं. मैं तो उस दिन ये देखकर हैरान रह गई कि आपको अपना नाम, यहां तक कि अपनी जन्म तिथि तक याद नहीं थी.” सुरभि ने विस्फारित दृष्टि से सरस्वती जी को देखा.
नए ज़माने की लड़की है न, इसीलिए निडर होकर बोल रही है, पर हम तो डरते ही रहते थे. कभी सास-ससुर से, कभी पति से और अब बच्चों से. सरस्वती जी हंस दीं. उनकी आंखों में वर्षों पहले की हंसमुख सरस्वती झांक उठी. अपनी हंसी दबाते हुए बोलीं, “नटखट लड़की, इतना खुलकर बात करने में क्या तुझे डर नहीं लगता?”
“डर कैसा, आंगन के पशु पक्षी तक तो आपसे डरते नहीं. आपको देखकर लॉन में लगे मकई के खेत के न तोते उड़ते हैं, न ही फूलों को चबाता हुआ खरगोश भागता है. और तो और, रोज़ आंगन में जाने कितने कबूतर आकर दाना खाते हैं, उनकी कटोरी में पानी भरना तक आप नहीं भूलतीं. इतना सुंदर घर-संसार और किसका है? क्या अन्य किसी चित्रकार की तूलिका ऐसा सजीव चित्र बना सकती है. आप तो इतनी प्रतिभाशाली हैं, अब भी चाहें तो कितने ही चित्र बना सकती हैं? कितनी ही रचनाएं लिख सकती हैं.”
“बहुत देर हो गई सुरभि... न पहले वाला दम रहा, न ही मनोबल. अब अगर हाथ में तूलिका पकड़ कर किसी चित्र को अंकित करने की कोशिश भी की या सितार पर कोई धुन छेड़ने की कोशिश की, तो उंगलियां कांप जाएंगी. घर गृहस्थी बिखर जाएगी.”
“हवा चाहे जैसी भी हो उड़ान ख़ुद को ही तय करनी होती है मां. गृहिणी की कुशलता समायोजन और संतुलन की धुरी पर टिकी होती है. लेकिन किस परिस्थिति में कब, कहां और कितना समायोजन होना चाहिए, यह बात कुशल गृहिणी को स्वयं ही समझना पड़ता है. सुघड़ता से तात्पर्य ऐसी जीवनशैली से है जिसे अपनाकर सहज ही कार्य संपन्न हो जाए.”
“ये सब किताबी बातें हैं सुरभि.” सरस्वती जी के शब्दों में साफ़ विवशता झलक रही थी.
“मां, स़िर्फ पेड़ होना काफ़ी नहीं है, उसे घना और विशाल भी होना पड़ता है एक वृक्ष को सम्मान पाने के लिए. नदी तब तक नदी नहीं मानी जाती जब तक उसके प्रवाह में उफान न हो और न ही शीतलता. आप इतनी प्रतिभाशाली हैं, अब भी चाहें तो कितनी ही कहानियां लिख सकती हैं.” अभिभूत हो उठीं सरस्वती जी.
कौन कहता है भावुक व्यक्ति हमेशा ठगा जाता है, भावुकता में निर्णय नहीं लेना चाहिए. उन्हें तो उनकी भावुकता ने ही ऐसा दुर्लभ रत्न थमा दिया. सुरभि न होती, तो क्या वो वर्षों पूर्व छूट गई सरस्वती को फिर पा सकती थीं? उसके लाए आई पैड को उन्होंने ममत्व से भरकर सहलाया, फिर नन्हें अबोध बालक की तरह सुरभि से पूछा, “इस पर टाइप कैसे करूंगी? मुझे तो इसे चलाना नहीं आता.”
“मैं सिखाऊंगी आपको. देखिएगा कितनी सहजता से आप अपनी रचनाएं लिखेंगी और फिर मेल भी कर पाएंगी.”
सरस्वती जी को लगा सही मायनों में उनका जन्मदिन आज है. सुरभि उठकर खड़ी हो गई. अक्टूबर का आख़िरी सप्ताह. हवा में नर्म सी ठंडक महसूस हो रही थी. हौले से उसने पश्मीना का शॉल सरस्वती जी के ईदगिर्द लपेट दिया. अंदर ही अंदर अपनी तृप्ति का, संपूर्णता का एहसास वो नए सिरे से महसूस करने लगीं. संबंधों की उष्णता से मन तरल हो गया. भरी भरी आंखें और हरा भरा मन लिए हुए वो सुरभि का हाथ थाम कर खड़ी हो गईं. एक नए उत्साह एक नए संकल्प के साथ. ऐसा लगा जैसे आसमान में उगे हुए उस धुंधले हंसिए के आकार के चांद में पूर्णमासी का पूर्ण चांद आकर समा गया. झर-झर करके चांदनी आशीर्वाद स्वरूप उस पवित्र आंगन में उनके ऊपर बरस रहीं.

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