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कहानी- औरत‌ (Short Story- Aurat)

"कितने संगदिल हो तुम. मैंने तुम्हारे बेटे को सीने से लगा लिया, मगर तुम मेरे बेटे के सिर पर स्नेह का हाथ भी न रख सके." यह कहकर नाजिया ने नवेद को उठाया और कमरे से बाहर निकल गई.

ना जिया सजी हुई सेज पर घूंघट निकाले, सिर झुकाए बैठी थी, लेकिन उसके जज़्बात सर्द थे. उसे न कोई ग़म था न ख़ुशी और न ही उसे आने वाले का बेकरारी से इंतज़ार था. वह अपनी सोचों में डूबी हुई थी कि अचानक कदमों की चाप सुनाई दी. आने वाला पलंग पर बैठ गया. वह उसी तरह आंखें बंद किए बैठी रही कि उसके कानों से आवाज़ टकराई.

"देखो, इंसान को रहम दिल होना चाहिए और दूसरों की ग़लतियां माफ़ कर देनी चाहिए. मैंने... मैंने..." अहमद ने हिचकिचाते हुए कहा, "मैंने शादी अपने लिए नहीं, बल्कि अपने बेटे इरफ़ान के लिए की है."

यह कहते हुए उसने तीन साल के इरफान को उसकी गोद में डाल दिया. एक लम्हे को तो उसका दिमाग़ जड़ हो गया, मगर दूसरे ही लम्हे वह कुदरत के इस मज़ाक पर मुस्कुरा उठी और उसने हंस कर इरफ़ान का माथा चूम लिया. यह देख कर अहमद ख़ुश हो गया.

"मुझे यकीन था कि तुम उसे मां का प्यार ज़रुर दोगी. मैंने जो झूठ तुम से और तुम्हारे घरवालों से बोला, उसके लिए मुझे माफ़... कर दो." अहमद ने क्षमा मांगी.

नाजिया ने मुस्कुरा कर उसकी तरफ़ देखा और सिर झुका लिया.

दूसरे दिन अहमद अपने कमरे में गया तो देखा नाजिया इरफ़ान और एक अन्य बच्चे से बातें कर रही थी.

"लगता है, तुम्हें बच्चो से बहुत प्यार है?"

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"बच्चों से भला किसे प्यार नहीं होता." अहमद ने इरफ़ान को प्यार करते हुए दूसरे बच्चे की तरफ़ इशारा किया, "यह किस का बेटा है?"

अहमद ने ज़ेहन पर जोर दिया- यह बच्चा उसके भाई-बहनों में से किसी का न था. उसने इरफ़ान को अपने पास बिठाया और दूसरे बच्चे की तरफ़ हाथ बढ़ाते हुए बोला, "मेरा मतलब है, यह बेटा किसका है?"

"मैंने कहा न कि यह भी हमारा ही बेटा है?" नाजिया बोली.

अब वह चौंक सा गया और उसके बच्चे की तरफ़ बढ़े हुए हाथ रुक गए.

"मतलब यह कि जिस तरह इरफ़ान आपका बेटा है, उसी तरह नवेद मेरा बेटा है." नाजिया ने बात को स्पष्ट कर दिया.

"नहीं, नहीं, यह नहीं हो सकता." वह एकदम पलंग से उतर कर खड़ा हो गया.

"तुम ने मेरे साथ फ्रॉड किया है."

"आप ने भी तो मेरे साथ फ्रॉड किया है. हिसाब बराबर हो गया." नाजिया ने मुस्कुराते हुए कहा.

"मैं यह सब कुछ बर्दाश्त नहीं कर सकता. तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?"

"आप ने भी तो पहले नहीं बताया था."

"तुम इसके होते हुए मेरे बेटे को मां का प्यार नहीं दे सकतीं."

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"यह आपकी ग़लतफ़हमी है."

"तुम उसको अपने मां-बाप के घर भेज दो."

"मेरे होते हुए मेरा बेटा ननिहाल में क्यों रहे?" अब नाजिया को भी ग़ुस्सा आ गया.

"तो फिर उसको बोर्डिंग हाउस में एडमिट करा दो." अहमद ने कुछ सोचते हुए कहा.

"नहीं, वहां जा कर बच्चे हीनभावना के शिकार हो जाते हैं."

"कोई नहीं होता हीनभावना का शिकार-विकार." उसने झुंझला कर कहा.

"ठीक है, फिर इरफ़ान और नवेद दोनों को एक साथ एडमिट करा देते हैं."

"नहीं, मेरा बेटा बोर्डिंग हाउस में नहीं जाएगा उसने इरफान को गोद में उठाते हुए कहा.

"तो फिर मेरा बेटा भी नहीं जाएगा." नाजिया भी ग़ुस्से से बोली.

"तो फिर तुम दोनों इस घर से निकल जाओ. मुझे तुम्हारी ज़रुरत नहीं. मैं अपने बेटे की परवरिश ख़ुद कर लूंगा."

"कितने संगदिल हो तुम. मैंने तुम्हारे बेटे को सीने से लगा लिया, मगर तुम मेरे बेटे के सिर पर स्नेह का हाथ भी न रख सके." यह कहकर नाजिया ने नवेद को उठाया और कमरे से बाहर निकल गई. वह अपने मां-बाप के घर पहुंच गई. जिसने सुना, उसी पर इल्ज़ाम लगाया. सब ने उसे ही बुरा-भला कहा. मगर वह चुप रही.

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दूसरे हफ़्ते तलाक़ के काग़ज़ात उसको मिल गए. तलाक़ के काग़ज़ात हाथ में पकड़े उसको अपनी क़िस्मत पर रोना आ गया और वह अपने खुदा से शिकायत कर बैठी, "या खुदा, मेरा कुसूर क्या है? दो बार सुहागिन बनी, दोनों बार मर्द के हाथों धोखा खाया. पहले शौहर ने इसलिए तलाक़ दे दी कि मैंने उसके भाइयों के लिए बार-बार मां-बाप से पैसा लाने से इंकार कर दिया. दूसरे शौहर ने बेटे की वजह से तलाक़ दे दिया और अब मुझे फिर एक मर्द की परवरिश करनी है. एक बच्चे को पाल कर मर्द बनाना है. या खुदा तूने औरत को इतना मजबूर क्यों बनाया है? क्यों बनाया है? वह जिस के हाथों लुटती है, उसी को परवान चढ़ाती है."

- जेनब हमीरानी

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