
मीनू त्रिपाठी
बैंक मैनेजर की मेज़ पर रखे काग़ज़ात पर चिपकी अपनी ही तस्वीर पर उसकी नज़रें अटकी रहीं. कैसे कहती, यही तो वह असल में है. इसी को तो वह पहचानती है. उस दिन घर आकर उसने अपना चेहरा ध्यान से शीशे में देखा तो वह अपरिचित सा लगा.
“अनु, बैंक चलोगी? बस आधे घंटे का काम है.” सुधीर ने लगभग चिरौरी करते हुए पत्नी से पूछा.
“कहीं जाना हो, तो पहले से बताया करो. ये नहीं कि आराम करने बैठूं और तुम बैंक चलने को कह दो...”
कुछ ऐसा ही छाया के मुंह से सुनने का अंदेशा था, पर आश्चर्य आज उसकी प्रतिक्रिया आशा के विपरीत थी. एक पल सोचा और दूसरे ही पल सिर हिलाकर सहमति देते हुए पूछ लिया, “कब चलना है?”
“अभी, चल सकती हो क्या?” आशंकित मन से उसने पूछा. जानता है, ये समय छाया के लिए घर छोड़ने के लिए कतई मुफ़ीद नहीं है, कारण- सवा दो बज रहे हैं और शाम चार-साढ़े चार के बीच मेड आ जाएगी. अभी दो दिन पहले ही बैंक के लिए इसी समय वो लोग निकले थे. वहां समय लग गया और उस बीच उसके चार फोन आ गए.
“दीदी, जल्दी आओ, इंतज़ार नहीं कर सकती, पांच मिनट रुकती हूं, फिर चली जाऊंगी.”
वह हर दो मिनट में फोन करके छाया को धमकाती रही और छाया का सारा ग़ुस्सा सुधीर पर बरसता रहा.
“तुम्हें यही समय मिलता है बैंक जाने के लिए, जब जानते हो कि ये समय मेड के आने का है तो क्यों नहीं जल्दी निकले.”
बैंक से घर तक का दस मिनट का सफ़र छाया की बड़बड़ाहट में ही निकला. मेड को बहला-फुसलाकर रोके रखने का मिशन किसी तरह सफलता को प्राप्त हुआ तब जाकर राहत की सांस ली. उस दिन छाया ने सख़्त ताकीद कर दी कि कहीं आना-जाना हो, तो पहले से बताया जाए. मेड के आने के समय का ध्यान रखा जाए.
आज दो दिन बाद कमोबेश वही समय और परिस्थितियां... पर छाया की प्रतिक्रिया बेहद अलग. शांत भाव से वह बोल रही थी, “थोड़ा समय दो, तैयार होती हूं.”
छाया की ध्यान मुद्रा और चेहरे की तनावरहित भावभंगिमा देख सुधीर के विस्मय का पारावर न रहा. वह तो सोचे बैठा था समय को लेकर वह खीझकर कहेगी, “आज फिर! ये भी कोई समय है...” पर न! वह तो दो-तीन मिनट विचार मुद्रा में बैठने के बाद इत्मीनान से उठकर चल दी.
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उसकी सदाशयता सुधीर के मन को छू गई और उसने राहत की सांस ली.
वह जानता है, छाया को तैयार होने में दो मिनट का भी समय नहीं लगता. ख़ासकर, जब बैंक जाना हो. हैंगर में इकट्ठी टंगी वो दो-तीन कुर्तियां, जो अक्सर इस्तेमाल के बाद, धुलाई-प्रेस से पहले थोड़ा और पहन लेने की गरज से टंगी होती हैं, उन्हीं में से कोई एक निकालकर वह पहन लेगी. कभी-कभार तो ठीक-ठाक हालत वाले घर के ही कपड़ों में मैचिंग दुपट्टा डालकर चल देती है.
सुधीर बैठक में आकर बैठ गया और छाया का इंतज़ार करने लगा. घड़ी की पल-पल की टिक-टिक उसके मन को धड़का रही थी. बैंक मैनेजर ने कहा तो था कि बस हस्ताक्षर ही करने हैं, पर बैंक का क्या भरोसा... कौन जाने कब भीड़ हो जाए या बैंक मैनेजर ही व्यस्त हो जाएं. छाया के हस्ताक्षर अगर घर पर ही वो ले सकता तो ले लेता, पर बैंक के कुछ नियम होते हैं. कुछ औपचारिकताओं के लिए प्रत्यक्ष उपस्थिति आवश्यक है.
आजकल बैंक के आए दिन चक्कर लग रहे हैं. सेवानिवृत्ति के समय मिले आर्थिक लाभ और की गई बचत सीनियर सिटीजन सेविंग स्कीम, एस.आई. पी. और म्युचल फंड्स में निवेश हेतु बैंक में आना-जाना लगा रहता है, इसी सिलसिले में कई बार छाया को भी ले जाना पड़ा.
बैंक में जाकर बैठना छाया को सबसे बोरिंग काम लगता है. वह बेमन से वहां जाती है, यह वह भली प्रकार जानता है, इसीलिए अमूमन पहले ही बैंक में जाकर वो औपचारिकताएं पूरी कर लेता, जिसमें छाया की आवश्यकता नहीं है. यदि छाया के हस्ताक्षर आदि की ज़रूरत होती है, तब दोबारा घर आकर उसे बैंक ले जाता, ताकि उसे बैंक में कम से कम रुकना पड़े. चूंकि बैंक घर से ज़्यादा दूर नहीं है, इसलिए ये कवायद संभव हो पाती है.
सुधीर ने घड़ी देखी, तीन बजने को थे. उसे थोड़ा विस्मय हुआ, छाया तो बमुश्किल दो मिनट का समय तैयार होने में लेती है, पर आज पूरे बीस मिनट हो गए. रसोई में झांका, तो देखा बर्तन धुलने के लिए पड़े थे. उसे चिंता हुई कहीं आज भी मेड का चक्कर पड़ गया, तो चार बजे के बाद मेड के आने की तलवार टंगी होगी, ऐसे में समय से बैंक से वापस आ पाना संभव होगा या नहीं... इसी उहापोह के बीच छाया का स्वर सुनाई दिया, “चलना नहीं है क्या?”
“अं हां...” सुधीर ने उसे अविश्वास से देखा. नीली रंग की शिफॉन साड़ी, मोतियों की माला और हल्के मेकअप में वह बहुत सुंदर लग रही थी.
हैरत से उसे ताकते देख छाया झेंपकर बोली, “कई दिनों से ये साड़ी पहनने की सोच रही थी. सोचा, आज पहन लूं.”
“पर हम बैंक ही तो जा रहे हैं!”
“तो किसने कहा बैंक में साड़ी नहीं पहन सकते.”
“साड़ी तो पहन सकते हैं पर अभी!”
“उतार दूं क्या...”
उसकी झुंझलाहट में धमकी छिपी देख सुधीर अचकचाया, “अरे नहीं! अच्छी लग रही हो, बहुत अच्छी.” सुनते ही छाया ने चाभी उठाई और दरवाज़ा बंद किया.
कड़ी धूप में सहसा बरस आई बूंदों के पीछे के रहस्य को जानने की छटपटाहट झटककर सुधीर गाड़ी की ओर बढ़ गया. रास्ते भर रह-रहकर वह कनखियों से उसे देखता रहा. बैंक के लिए बिना ना-नुकुर के तैयार होना. तिस पर इतना तैयार होना, मानो कैंडिल लाइट डिनर पर निकले हों, थोड़ा अजीब पर बहुत सुखद था.
बैंक में सबकी नज़रें छाया पर ठहर रही थीं. भीड़ काफ़ी कम थी, फिर भी वह जल्दी-जल्दी काम निपटवाने की हड़बड़ी में था, अलबत्ता छाया बेहद शांत थी. चार बजने को हो आए थे. इस समय तक तो वह व्यग्रता से मोबाइल देखने लगती थी पर आज... उसके चेहरे पर इत्मीनान देख सुधीर ने पूछा, “मेड को देर से आने के लिए बोल दिया है क्या?”
“न... बोला तो नहीं. तुम यहां का काम देख लो, मैं मैनेज कर लूंगी.”
ये छाया का दिया दूसरा झटका था कि तभी मैनेजर ने उसे बुला लिया. बैंक मैनेजर छाया को पहचानती थी.
“हेलो मैडम, कैसी हैं?” मैनेजर बहुत व्यवहार कुशल है. अपने सभी क्लाइंट को महत्व देना उसकी पहचान है. उसने हमेशा की तरह छाया पर सरसरी नज़र दौड़ाई, पर आज नज़रें उस पर अटक गईं, और फिर बार-बार अटकीं. उसकी नज़रों का स्वयं पर यों अटकना छाया को भाया, पर सुधीर को असहज कर गया.
बैंक में सभी अनौपचारिक साधारण वेशभूषा में ही थे, ऐसे में उनके होने न होने को कोई नोटिस नहीं कर रहा था, पर छाया सबका ध्यान खींच रही थी. एकदम रईसी अंदाज़ में मुस्कुराती हुई वह आत्मविश्वास के साथ बैंक मैनेजर के सामने वाली कुर्सी पर बैठी मुस्कुरा रही थी. छाया और बैंक में मुस्कुराए, ये भला कब होना था! बैंक में उबी सी बैठी रहने वाली छाया आज जैसे बैंक में अपनी ही उपस्थिति का आनंद ले रही थी.
ई-केवाईसी के बाद कई काग़ज़ों में हस्ताक्षर और फिर उनके मिलान के बाद जब स्टैम्प लगाकर काम सम्पन्न हुआ तब बैंक मैनेजर ने छाया पर भरपूर नज़र डालकर कहा, “आज तो आप पहचान में ही नहीं आ रही हैं. बहुत सुंदर लग रही हैं. कहीं जा रही हैं क्या?”
“जी...”
तभी बैंक मैनेजर ने सिर हिलाते हुए सूक्ष्म प्रतिक्रिया दी, तो छाया मुस्कुरा दी, पर सुधीर चकरा गया. ‘कहां जाना है उसे तो पता ही नहीं...’ फिर छाया का अनपेक्षित व्यवहार...पहले तो कभी बैंक मैनेजर से ऐसी केमेस्ट्री नहीं दिखी... बैंक मैनेजर स्त्री होने के नाते छाया के इस नए अवतार से शायद प्रभावित थी. वैसे भी छाया ढंग से तैयार हो और उसे कोई नोटिस में न ले, यह संभव नहीं.
बैंक से निकलकर कार में बैठते समय तक छाया के होंठों पर मुस्कुराहट बनी रही. सुधीर कुछ पूछता या कहता उससे पहले ही वह बोली, “सुनो, इतना तैयार हुई हूं, तो कहीं घूमकर आते हैं. चलो, कॉफी ही पी आते हैं.”
“और मेड!”
“तुम्हें क्या लगता है, इंतज़ार में बैठी होगी वो... मैंने मैसेज दे दिया है. सुबह जल्दी आकर काम कर जाएगी. बर्तन उठाकर रख दूंगी. अब इतनी अच्छी साड़ी पहनकर उतार दूं स़िर्फ इसलिए कि बर्तन धोने हैं. न बाबा कहीं घूमकर आते हैं.”
उसने कहा और सुधीर ने झट से गाड़ी घुमा ली. बहुत कम ही होता है जब छाया कहीं घूम आने की बात करे, ख़ासकर रिटायरमेंट के बाद वह तो अक्सर कहता है, “रिटायरमेंट का यही तो फ़ायदा है, जब मन किया कहीं निकल लिए...” पर ऐसा कहां हो पाता है.
“आज आलमारी की सफ़ाई करनी है, आज अलाना-फलाना काम निकाला है...” और नहीं तो मेड... उसके सुबह-शाम आने की टाईमिंग तो कहीं आने-जाने में बहुत बड़ी अड़चन है. पर आज कितनी उदारता से छाया ने मेड के मुद्दे को दरकिनार कर कैफे का रुख किया.
गाड़ी रुकी तो छाया साड़ी संभालती हुई कैफे के भीतर गई... ये वो कैफे था, जिसमें अमूमन वह ख़ास मौ़के पर आते हैं. कोने वाली उनकी पसंदीदा जगह आज भरी थी, इसलिए दोनों सेंटर वाली मेज़ पर आ बैठे. सॉफ्ट पॉप म्यूज़िक के बीच मनपसंद कॉफी ऑर्डर करने के बाद सुधीर ने गहरी नज़र से छाया को देखकर कहा, “आज कोई ख़ास दिन तो नहीं है न? मतलब, कोई ऐसा दिन, जिसे मैं भूल रहा हूं. अगर है तो याद दिला दो.”
“ऐसा क्यों कहा तुमने...”
“और क्या... आज बैंक जाने में तुमने कोई ना-नुकुर नहीं की. इतनी अच्छी तरह से तैयार हुई.”
“हम जिस उम्र में हैं न सुधीर... हमें अच्छे से ही तैयार होना चाहिए.” उसने संजीदगी से कहा तो सुधीर चौंका, “आज अचानक ये ज्ञान कैसे!”
“ज्ञान तो अचानक ही आता है. तुम भी ढंग से तैयार हुआ करो. एक कमीज़ जाने कितनी बार पहन लेते हो. जींस टी-शर्ट पहना करो, यंग लगते हो.” कहते हुए वह धीरे से हंसी तो सुधीर ने झेंपकर कहा, “बढ़ती उम्र का अपना ग्रेस है.”
“हां मानती हूं... वो ग्रेस बना रहे, इसके लिए कुछ जोड़तोड़ यानी ज़िम्मेदारी निभा लें तो ग़लत क्या है.”
“मतलब?” सुधीर उसकी बातों में उलझ गया.
“जब हम जवां थे तब अपने चेहरे-मोहरे और शरीर को देखकर फील गुड फैक्टर अनायास ही होता था. अब सप्रयास लाना होगा. उम्र हमारे हाथों में नहीं है, पर पहनना-ओढ़ना तो हाथों में है. कपड़े अच्छे होंगे तो चेहरा खिल उठेगा. बुढ़ापे में चेहरा और कपड़े दोनों मुसे हुए अच्छे नहीं लगते...” कहते हुए छाया ने जिस अदा से पल्लू संभाला, सुधीर एकटक देखता रह गया.
“क्या हुआ?” छाया ने टोका तो वह बोला, “बहुत अच्छी लग रही हो...”
“एक बिंदास हंसी और मुस्कान भी झुर्रियों भरे चेहरे को सुंदर बनाती है. यक़ीनन... मुस्कुराते रहो.”
“तुम खिली-खिली रहो, तो मुस्कुराने की वजह मिल जाएगी.” सुधीर थोड़ा सा रूमानी हुए तो छाया भरपूर मुस्कुराई. देर तक वह दोनों कॉफी हाउस में बैठे रहे. वहां से निकलकर आसपास की दुकानों में विंडो शॉपिंग करके डिनर किया और तब घर का रुख किया.
ख़ुशनुमा समय साथ व्यतीत करके प्रफुल्लित भाव से घर आते समय सुधीर बोल ही पड़े, “आज बड़े दिन बाद दिन ख़ुशगवार निकला. इसका सारा श्रेय तुम्हें जाता है छाया, शुक्रिया.”
“शुक्रिया बैंक का अदा करो, न बैंक आना होता न हम इतना घूमते.”
“भला बताओ, कौन सोच सकता है कि जिस जगह जाने से तुम सबसे ज़्यादा बचती हो, आज उसी जगह को मौक़ा बना लिया. आज बैंक मैनेजर को देखा था. तुम्हारे चेहरे से नज़र ही नहीं हट रही थी.”
सुधीर उत्साह के अतिरेक में बोले, तो छाया की आंखें बरबस ही गाड़ी के व्यू मिरर पर अटक गईं. ख़ुद को उसने ध्यान से देखा, आज इतना घूमने के बाद बेशक थकान थी, फिर भी, होंठ गुलाब की पंखुड़ियों के मानिंद तरोताज़ा थे. काजल की रेखा से आंखें मुस्कुराती प्रतीत होती थीं, माथे पर बड़ी सी बिंदी की आभा से चेहरा खिला हुआ गोया कि सब परफेक्ट...
सुधीर की नज़रें अब सड़क पर थीं और उसकी नज़रें ख़ुद पर. मन के चश्मे से वह अपनी मनः स्थिति को टटोल रही थी. आज उसके यों बन-ठन कर आने का कारण सुधीर बेशक उसके मूड को दें, पर वह जानती है कि उसकी सजधज के पीछे छिपा वह वाकया है जो पिछली मर्तबा बैंक में घटा था.
दो दिन पहले वह बैंक मैनेजर के ठीक सामने बैठी थी. कुछ काग़ज़ों में हस्ताक्षर करने थे सो कर दिए गए थे. बैंक मैनेजर ने पासपोर्ट साइज़ के फोटो मांगे, तो सुधीर ने एक नन्हें से पैकेट से कुछ तस्वीरें निकालकर मेज़ पर रख दीं. नीली बालूचरी साड़ी वाली तस्वीर देख मैनेजर के मुंह से सहसा निकला, “अरे, कितनी सुंदर तस्वीर है. आप तो इसमें पहचान में ही नहीं आ रही हैं.”
बैंक मैनेजर की टिप्पणी पर वह झेंप गई और नज़र अनायास ख़ुुद पर चली गई. बैंक ही तो जाना है, यह सोच उसने बड़ा झल्ला सा सादा सा सूट पहन लिया, बालों को बांधकर पोनीटेल बना ली. न आंखों में काजल था न होंठों पर लिपस्टिक.
वह ख़ुद को स्कैन कर ही रही थी कि बैंक मैनेजर उसकी तस्वीर को देख फिर बोलीं, “इसमें तो आप अस्सी-नब्बे के दशक में दूरदर्शन में आने वाली न्यूज़ रीडर की तरह लग रही हैं.” सुधीर उसकी तारीफ़ पर मुस्कुराए, वह भी मुस्कुराई, पर उस मुस्कान में दर्प नहीं, अपितु खिसियाहट सी थी. मन में मलाल हुआ, कुछ ढंग से तैयार हो जाती. बैंक मैनेजर ने जिस तरह से फोटो पर विस्मित नज़रें डालकर, “पहचान में ही नहीं आ रही हैं.” कहते हुए उसके चेहरे पर सरसरी हैरान नज़रें डालीं, मन में कुछ चुभ गया.
“लिपस्टिक नहीं लगाई...” यों तो सुधीर अमूमन उसे टोक देते हैं, पर आजकल वह नहीं टोकते. “बैंक ही तो जाना है... सब्ज़ी ही तो लेने जा रही हूं... पास ही तो जाना है...” जैसे तर्क वह आए दिन देने लगी है, तो उन्होंने भी पूछना छोड़ दिया. पर यह सच है कि सुधीर को उसके होंठों पर लिपस्टिक अच्छी लगती है.
“लिपस्टिक लगाने से तुम्हारा चेहरा चार सौ वाट की तरह खिल जाता है.” सुधीर जब- तब कहते. वह स्वयं भी महसूस करती है. लिपस्टिक, काजल और ढंग से संवारे खुले बाल उसके चेहरे में ख़ासा आकर्षण ला देते हैं. पर उस दिन घर से निकलते समय उसने स्वयं के प्रति इतना उपेक्षित रवैया अपनाया कि उसकी पहचान ही गुम हो गई.
बैंक मैनेजर की मेज़ पर रखे काग़ज़ात पर चिपकी अपनी ही तस्वीर पर उसकी नज़रें अटकी रहीं. कैसे कहती, यही तो वह असल में है. इसी को तो वह पहचानती है. उस दिन घर आकर उसने अपना चेहरा ध्यान से शीशे में देखा, तो वह अपरिचित सा लगा. ख़ुद के ही रखरखाव के प्रति मन में क्षोभ उत्पन्न हुआ. महसूस हुआ, इन दिनों उसने ख़ुद पर ध्यान देना बिल्कुल छोड़ दिया है. आलमारियों में अच्छे कपड़े रखे ही रह जाते हैं, तिस पर जो कभी कोई कपड़ा निकाला भी तो उसे क्यों ही मुसने की हालत तक इस्तेमाल करने की विवशता होती है.
सुधीर नहीं जानते, पर वह जानती है कि आज बन-ठन कर बैंक आना महज़ इत्तेफ़ाक या मूड की बात नहीं. यह तो अपनी पहचान जताने की एक सोची-समझी रणनीति थी. बालूचरी नीली साड़ी वाली तस्वीर उसी की है... यह यक़ीन न केवल बैंक मैनेजर को अपितु स्वयं को भी दिलाना चाहती थी.
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ख़ुद को उसने ध्यान से देखा, आज इतना घूमने के बाद बेशक थकान थी, फिर भी, होंठ गुलाब की पंखुड़ियों के मानिंद तरोताज़ा थे. काजल की रेखा से आंखें मुस्कुराती प्रतीत होती थीं, माथे पर बड़ी सी बिंदी की आभा से चेहरा खिला हुआ गोया कि सब परफेक्ट...
मन के चश्मे से वह अपनी मनः स्थिति को टटोल रही थी. आज उसके यों बन-ठन कर आने का कारण सुधीर बेशक उसके मूड को दें, पर वह जानती है कि उसकी सजधज के पीछे छिपा वह वाकया है जो पिछली मर्तबा बैंक में घटा था.

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