शिवेन को बहू का इतनी रात बाहर रहना अच्छा नहीं लगा, लेकिन मेरा मन यहां की चहल-पहल से बहुत ख़ुश है इसीलिए सुबह से ही ख़ुद में छिपी चंचला को याद कर रही हूं.
जब से यहां आई हूं जाने क्यों मन बार बार पुराने दिनों में चला जा रहा है. ‘चंचला’ दादाजी ने यही नाम दिया था मुझे. अक्सर मां से कहते, “बहू इसका नाम शालिनी से बदलकर चंचला कर दो.”
तब मां कहती, “अरे पिताजी, इस नाम पर तो ये लड़की एक जगह नहीं ठहरती. चंचला कर दूं तो जाने क्या करेगी.”
पर शादी के बाद सास की घूरती नज़रों ने मेरी लगाम थाम ली थी. ननद की शादी में मेरे हाथों में नौ नौ चूड़ियां… पर सबके सामने नाचने पर उन्होंने जो हंगामा किया कि फिर पैर ही नहीं उठे. शिवेन ने भी उनका मौन समर्थन देकर मेरी हिम्मत तोड़ दी.
फिर सोचा बेटी होगी तो उससे अपने सारे शौक पूरे करूंगी. पर वो सुख मेरी क़िस्मत में ही नहीं था. दोनों बेटे भी शिवेन पर ही गए थे, शांत और स्थिर. कहीं शादी-ब्याह या नवरात्रि के पंडालों में लोगों को ठुमकते देखती तो एक हुक सी उठती थी.
फिर अचानक एक दिन सौम्य ने स्निग्धा की फोटो दिखाते हुए कहा, “मां, मैं इससे शादी करना चाहता हूं.”
मैं तो बरसों से बेटी के शौक बहू से पूरे करने के सपने देख रही थी. स्निग्धा को देख कर मन हुआ उसे अपने हृदय से लगा लूं, लेकिन रिश्तेदारों और सहेलियों की बहुओं के कड़वे अनुभव ने मुझे रोक दिया.
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शादी के दो हफ़्ते बाद ही स्निग्धा सौम्य के साथ मुंबई आ गई. सौम्य के बहुत ज़िद करने पर कल मैं और शिवेन भी यहां घूमने आए हैं. एयरपोर्ट से घर आते समय बड़ी-बड़ी अट्टलकाएं देख मुंबई देखने का सालों पुराना सपना सच हो रहा था.
घर आए तो पता चला, स्निग्धा घर में नहीं है. सौम्य ने सफ़ाई देते हुए कहा, “मां, यहां नवरात्रि में डांडिया और गरबा खेला जाता है. उसी की तैयारी के लिए नीचे गई होगी. बस अभी आ जाएगी.”
स्निग्धा तुरंत ही आ गई और बहुत ख़ुशी व आत्मीयता से मिली. शिवेन को बहू का इतनी रात बाहर रहना अच्छा नहीं लगा, लेकिन मेरा मन यहां की चहल-पहल से बहुत ख़ुश है इसीलिए सुबह से ही ख़ुद में छिपी चंचला को याद कर रही हूं.
“मम्मा, चलिए नीचे क्लब में चलते हैं.”
“मैं?”
“हां आप!”
“पर बेटा वहां जाकर, मैं क्या करूंगी.”
मुझे उठाते हुए वो बोली, “मम्मा यहां हर नवरात्रि पर सोसाइटी में डांडिया होती है. इस बार भी पांच अलग-अलग ग्रुप्स डांडिया और गरबा करेंगे. मेरे ग्रुप की प्रैक्टिस मैं करवा रही हूं.”
बात करते-करते हम लिफ्ट से नीचे आ चुके थे.
“फ्रेंड्स इनसे मिलो. ये मेरी मम्मा हैं, कल ही मिर्ज़ापुर से यहां आई हैं और मम्मा भी हमारे साथ डांडिया करेंगी.”
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“ओ वाओ यार, योर मम्मा इस सो क्यूट! वेलकम आंटी, वेलकम इन स्निग्धाज़ डांडिया ग्रुप!”
तब तक स्निग्धा ने मुझे डांडिया पकड़ाते हुए कहा, “मम्मा देखिए ऐसे करिए, वन, टू ,थ्री,फोर…”
पीछे से संगीत बज रहा था, हे शुभारंभ ओ शुभारंभ मंगल बेला आई…
और चंचला के जीवन में भी भीगी आंखों के साथ नई ख़ुशियों का शुभारंभ हो रहा था!
– पल्लवी विनोद
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