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लघुकथा- दर्द (Short Story- Dard)

“… पता नहीं क्यों लोग चुनाव के समय कर्मठ प्रत्याशी नहीं चुनते हैं.. जो धरातल पर काम करें.. उस समय तो उन्हें पैसा, शराब अपनी जातवाला दिखता है. और वही लोग चुनाव के बाद अपनी ज़रूरत के लिए सड़क पर उतर आते हैं…”

सुधा किचन में काम कर रही थी तभी किसी ने घंटी बजाई. वह साड़ी के पल्लू से हाथ पोंछती हुई खिड़की में से झांक कर देखा तो उसका पति विनोद घायल था और साथ में उसको सहारा दिए हुए दो पुलिस वाले थे.

पति को ऐसे हालात में देखकर एक बार तो सुधा घबरा गई और जल्दी से दरवाज़ा खोला.

दोनों सिपाहियों ने सहारा देकर विनोद को बैठक में सोफे पर लिटा दिया और उसकी दवाइयां देकर चले गए. विनोद सिपाही था, उसकी वर्दी खून से तरबतर थी.

उसकी हालत देखकर सुधा रोने लगी तो विनोद ने उसे शांत करते हुए कहा, “मैं ठीक हूं परेशान मत हो.”

लेकिन सुधा पत्नी थी, उसे कैसे संतोष होता उसका पति इतनी घायल अवस्था में था. उसने विनोद के कपड़े बदलवाते हुए पूछा, “इतना चोट कैसे लग गया प्रदर्शन तो शांतिपूर्ण था?”

तो विनोद बोला, “लोग कब ऊपद्रव करने पर आमादा हो जाए.. कुछ कहा नहीं जा सकता है .. आज भी वही हुआ लोग अपना आपा खो बैठे और पुलिस वालों पर ही हमला करने लगे..

पता नहीं क्यों लोग चुनाव के समय कर्मठ प्रत्याशी नहीं चुनते हैं.. जो धरातल पर काम करें.. उस समय तो उन्हें पैसा, शराब अपनी जातवाला दिखता है. और वही लोग चुनाव के बाद अपनी ज़रूरत के लिए सड़क पर उतर आते हैं.

अरे जब भ्रष्टाचारी और करप्ट विधायक ख़ुद चुनते हैं तो किस मुंह से यह प्रोटेस्ट करते हैं.. लालच ख़ुद करते हैं और बीच में पुलिस को पिसना पड़ता है!”

सुधा विनोद की बातें सुनकर अपने पति से ज़्यादा पुलिस का दर्द महसूस कर रही थी.

– रेखा शाह आरबी 

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