“देखो भैया पूंछ वाले बीज, इन बीजों को पूंछ निकल आई है.” चेरी एक जार की ओर इशारा करके बोली.
“अरे हां, इन बीजों को तो पूंछ है मामाजी. यह पूंछ वाले बीज किस पौधे के हैं?” आदित्य ने पूछा.
स्कूल से घर आते ही चेरी और आदित्य का सबसे पहले काम होता था ऊपर दौड़ लगाकर मामा जी की प्रयोगशाला में पहुंच जाना. बड़ी मुश्किल से मां उन्हें कुछ खिला पिला कर कपड़े बदलवा पाती. आज भी दोनों जैसे ही घर पहुंचे अपना बैग कमरे में रखकर ऊपर जाने लगे.
“पहले दूध पी लो फल खा लो तब मामाजी के पास जाना. मैं दूध गर्म कर रही हूं तब तक दोनों हाथ मुंह धो कर कपड़े बदल लो नहीं तो दो घंटे तक नीचे ही नहीं आओगे.” मां ने उन्हें दबे पांव सीढ़ियों की ओर जाते देखा तो टोका.
दोनों मन मार कर कमरे में गए और मुंह हाथ धोकर कपड़े बदल आए. मां ने फल और दूध तैयार रखे थे दोनों के लिए. दोनों ने दूध और फल ख़त्म किया और तेजी से सीढ़ियां चढ़कर ऊपर वाली मंज़िल पर आ गए.
ऊपर एक कमरा मामाजी के रहने का था और एक बड़ा सा हॉल था, जिसमें मामाजी की प्रयोगशाला थी. मामाजी कॉलेज में वनस्पति शास्त्र के प्रोफेसर थे. वह विविध शोध भी करते रहते थे, कभी पेट्रिडिश में रंग बिरंगी फंगस उगाते तो कभी टेस्ट ट्यूब में उनके स्पेसिमेन तैयार कर किसी कॉलेज में शोधार्थियों के अध्ययन के लिए भेजते, कभी आलू या जिलेटिन में रसायन मिलाकर कल्चर मीडियम बनाते.
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कांच के पलड़ों वाली एक आलमारी में तरह-तरह के रंग बिरंगे रसायनों से भरी कांच की बोतले रखी थी. इस आलमारी को मामाजी हमेशा ताला लगा कर रखते थे. दूसरी आलमारी में पेट्रिडिश, टेस्ट ट्यूब, बीकर, स्लाइड्स आदि रखे हुए थे. दोनों को मामाजी की प्रयोगशाला में आना बहुत अच्छा लगता था, क्योंकि यहां पर उन्हें बहुत सी मज़ेदार बातों की जानकारी मिलती थी जिसे सुनना दोनों को ही बहुत पसंद था.
आज जब दोनों प्रयोगशाला में पहुंचे तो देखा की रोज़ की तरह ही आज भी मामाजी नाक पर चश्मा चढ़ाए किसी शोध में जुटे हुए थे. एक टेबल पर बहुत सी पेट्रिडिश रखी, बीकर, कुछ रसायन की बोतले रखी थी.
मामाजी काम करते हुए टेबल पर रखी एक पुस्तक से कुछ पढ़ते भी जा रहे थे. दोनों चुपचाप उनके पीछे जाकर खड़े हो गए.
“आ गए तुम दोनों स्कूल से.” मामाजी ने बिना पीछे देखे ही पूछा.
“हम तो आपके पीछे खड़े हैं आपको कैसे पता चला कि हम हैं आपने तो हमें देखा भी नहीं.” चेरी ने आश्चर्य से पूछा.
“देखा नहीं मगर सुनी तो सही तुम्हारे आने के बाद तुम्हारी और दीदी की बातें. फिर इस समय ऊपर तो तुम दोनों ही आ सकते हो.” मामाजी हंसते हुए बोले.
वह एक टेस्ट ट्यूब में बोतल से कोई रसायन डाल रहे थे.
सामने टेबल पर अलग अलग पेट्रिडिश में कई तरह के बीज रखे हुए थे.
“देखो भैया पूंछ वाले बीज, इन बीजों को पूंछ निकल आई है.” चेरी एक जार की ओर इशारा करके बोली.
“अरे हां, इन बीजों को तो पूंछ है मामाजी. यह पूंछ वाले बीज किस पौधे के हैं?” आदित्य ने पूछा.
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मामाजी ज़ोर से हंसे, “यह पूंछ नहीं है अंकुर है.”
“मतलब?” नन्ही चेरी कुछ समझ नहीं पाई.
“जब बीज में से पौधा उगता है तो पहले एक नन्हा अंकुर निकलता है. इन बीजों से अंकुर निकलते हैं, जो आगे जाकर पेड़ बनेगा.” मामजी ने बताया.
“लेकिन बीजों को तो मिट्टी में बोते हैं तभी वह अंकुरित होते हैं तो आपने इन्हें यहां क्यों अंकुरित किया है?” आदित्य ने सवाल किया.
“हां, तुमने ठीक कहा कि बीज मिट्टी में नमी की उपस्थिति में अंकुरित होकर पौधा बनते हैं लेकिन कुछ बीज अंकुरित होने में अधिक समय लेते हैं इसलिए उन्हें पानी में या कुछ रसायनों में भिगोकर अंकुरित कर लिया जाता है और फिर मिट्टी में बोया जाता है, ताकि वह जल्दी से पौधे के रूप में बढ़ सकें.” मामाजी ने समझाया.
“लेकिन कुछ बीज अंकुरित होने में अधिक समय क्यों लेते है?” अबकी बार चेरी ने पूछा.
“क्योंकि कई बार कुछ बीज मिट्टी में अंकुरित हो ही नहीं पाते. उन्हें पानी में भिगोने से अंकुरण का अनुपात बढ़ जाता है. इस तरह से पौधे उगाने की संभावना बढ़ जाती है. कई बीजों पर रक्षात्मक आवरण बहुत कठोर होता है और यह कई बार मिट्टी में दो से तीन महीने बाद या कभी कभी साल भर बाद अंकुरित हो पाते हैं, लेकिन भिगोने से आवरण नरम हो जाता है और चार से आठ दिनों में ही अंकुर निकल आता है, तब हमें पौधा जल्दी मिल जाता है.” मामाजी ने चेरी को बताया.
“कौन से बीजों को भिगोना पड़ता है?” इस बार सवाल आदित्य का था.
“लगभग सभी बीजों को पहले भिगोया जा सकता है. कुछ को कम देर पानी में रखना पड़ता है, कुछ को थोड़ी अधिक देर फिर उन्हें पानी से निकालकर प्रकाश वाले स्थान पर रखते हैं ताकि अंकुर अर्थात पूंछ निकल आए.” मामाजी हंसकर बोले.
“फसलों में सोयाबीन, मटर, चुकंदर, खीरा, मक्का, कद्दू के बीजों को भिगो लेने से फसल जल्दी मिल सकती है. इसका एक फ़ायदा यह भी होता है कि जो बीज अंकुरित नहीं होते उन्हें खाने में या दूसरे कामों में लिया जा सकता है.” मामाजी ने बीजों से भरे एक जार में पानी के साथ ही कुछ रसायन भी मिलाया.
“यह आप क्या मिला रहे हो पानी में, क्या इससे बीजों की पूंछ जल्दी निकलेगी?” चेरी को अभी भी अंकुर पूंछ ही लग रहे थे.
“हां कुछ रसायन जैसे नाइट्रेट्स आदि कुछ बीजों में पूंछ को तेजी से निकलने में मदद करते हैं. इसके साथ ही कई बार बीजों को भिगोते समय पानी में कवकनाशक और कीटनाशक दवाइयां मिलाने से वह रोगों से बचे रहते हैं. इसके अलावा ऑक्सीजन तथा पर्याप्त प्रकाश भी पूंछ निकालने में सहायक होते हैं.” मामाजी ने उसी की भाषा में उत्तर दिया.
“मैं यही शोध कर रहा हूं कि कौन से बीजों में कौन सा रसायन कितनी मात्रा में मिलाने से वह जल्दी अंकुरित होंगे.”
“मगर इससे क्या होगा?” आदित्य ने पूछा.
“बड़े पैमाने पर खेती करने के लिए यदि पहले से अंकुरित बीज लिए जाएं तो फसल जल्दी और हर बीज से पौधा मिलने से बीज की खपत भी कम होगी। इससे किसान के समय और बीज दोनों की बचत होगी, किंतु फसल अधिक मिलेगी. साथ ही जो बीज अंकुरित नहीं हुए उनका किसी अन्य कार्य में उपयोग किया जा सकता है.” मामाजी ने बीजों से भरे जार को खिड़की के पास धूप में रखते हुए बताया.
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दोनों कुछ और भी पूछना चाहते थे, लेकिन मामाजी ने पहले ही टोक दिया, “अब और सवाल नहीं शैतानों जाओ अब जाकर अपना होमवर्क करो नहीं तो दीदी मुझे डाटेंगी, और मुझे भी अपना काम करने दो.”
दोनों उन जारों और पेट्रिडिश की ओर कौतूहल से देखते हुए नीचे चले गए जिनमें विविध रंग रूप वाले पूंछ वाले बीज रखे हुए थे. कितना कुछ नया सीखा था उन्होंने आज मामाजी से बीजों के बारे में.

विनीता राहुरीकर
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