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कहानी- आमने सामने की बालकनियां (Short Story- Aamne Samne Ki Balkaniyan)

विनीता राहुरीकर

 

“जीवन की गति भी कितनी अजीब होती है न, जब व्यस्तता होती है, तो इतनी अधिक होती है कि हम ़फुर्सत के एक पल के लिए तरस जाते हैं और जब फ़ुर्सत मिलती है तो इतना अकेला कर देती है इंसान को कि समय काटे नहीं कटता. हम दोनों इस गति के दो विपरीत छोर पर हैं. तुम अति व्यस्त, मैं अकेलेपन की सरहद पर…”

 

गीले कपड़ों से भरी बाल्टी लेकर ऋजुता बालकनी में गई और एक-एक कर कपड़े तार पर फैलाने लगी. कुर्ता फैलाते हुए अनायास ही सामने वाली बिल्डिंग की बालकनी पर नज़र चली गई. आज भी वह गुनगुनी धूप में बालकनी में लगे हुए हरे-भरे पौधों के बीच बैठी किसी मैगज़ीन के पन्ने पलट रही थी. उसके सामने रखे कॉफी टेबल पर दो-तीन किताबें और चाय का कप रखा था. मैगज़ीन का पन्ना पलट कर उसने चाय का कप उठाकर एक घूंट भरा. प्रेस किया हुआ कुर्ता, करीने से बंधे बाल, होंठों पर हल्की सी लिपस्टिक. कितनी व्यवस्थित और सुंदर लग रही थी.
एक आह भर कर ऋजुता दुबारा कपड़े झटक कर तार पर सुखाने लगी. कपड़े फैलाने के बाद उसने एक नज़र अपनी बालकनी पर डाली. एक तरफ़ तुलसी का पौधा रखा हुआ था छोटे से गमले में, उसे भी कहां नियमित पानी दे पाती है वह. कितना शौक है उसे पौधे लगाने का लेकिन…
वह तो अपना भी ध्यान नहीं रख पाती ठीक से. उंगलियों से बाल पीछे कर एक रबरबैंड में बांध लेती है. जिस दिन बाहर जाना हो, बस उस दिन बालों में कंघी हो पाती है. एक आह उठी मन में, काश कभी वो भी इस तरह निश्‍चिंत सी बालकनी में बैठ एक कप चाय पीते हुए कोई मैगज़ीन पढ़ सके. एक ठंडी सांस लेकर वह वापस भीतर आ गई. बाल्टी बाथरूम में रखी और कल के धुले कपड़ों को तहकर आलमारी में रख कर तेज़ी से घर में फैला समान समेटने लगी.
ड्रॉइंगरूम, डायनिंग टेबल, बेडरूम सब तरफ़ बच्चों के खिलौने, किताबें, विशाल का सामान बिखरा रहता है. सब करते हुए नज़रें बराबर घड़ी पर लगी रहती हैं. ठीक बारह बजते ही वह स्कूटी की चाबी लेकर, घर को ताला लगाकर दो मंज़िल सीढ़ियां उतर निनाद को लेने स्टॉप पर चली आई.
आधा किलोमीटर दूर मेन रोड पर बस उसे उतारती है, बारह बजकर दस मिनट पर. वह दो-चार मिनट पहले ही पहुंच कर खड़ी हो जाती है. नियत समय पर बस आ गई. निनाद के साथ दो-तीन बच्चे और उतरते हैं और अपनी मां या दादाजी के साथ चले जाते हैं. ऋजुता निनाद को लेकर घर आई. आते ही ़कैद से छूटे हुए निनाद की मस्ती शुरू हो गई. कभी सोफे पर कूदना, जूते-मोजे यहां वहां फेंकना. स्कूल की, साथियों की बातें बताना. ऋजुता उसकी बातें सुनते हुए तेज़ी से हाथ चलाकर उसके जूते-मोजे, स्कूल बैग जगह पर रखने लगी. टिफिन और वॉटर बॉटल किचन में रख आई. निनाद के हाथ-पैर धुलवाकर उसके कपड़े बदलवाए. इस बीच बातों ही बातों में उसने जान लिया कि आज उसे क्या-क्या होमवर्क मिला है. ठीक एक बजे वह दुबारा स्कूटी उठाकर स्टॉप पर चली आई. इस समय निनाद भी साथ था. बिटिया नीना सीनियर बस से आती है. ठीक समय पर नीना की बस आ गई. ऋजुता उसे लेकर घर आई.

 

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अब फिर वही सब, उसके जूते-मोजे, बैग जगह पर रखना, टिफिन और बॉटल किचन में रखना, आलमारी से उसके लिए कपड़े निकाल कर देना. फ़र्क़ बस इतना है कि नीना हाथ-पैर धोकर कपड़े ख़ुद बदल लेती है. तब तक उसने खाना गर्म कर डायनिंग टेबल पर तीन थालियां परोस दीं. आज तो बच्चों की पसंद की पनीर की सब्ज़ी और जीरा राइस बनाया था, इसलिए बिना नखरे के दोनों खाना खाने लगे. यदि वह किसी दिन बच्चों की पसंद का कुछ नहीं बना पाई, तो देर तक मिन्नतें करनी पड़ती हैं उनकी या दुबारा रसोईघर में घुसना पड़ता है कुछ बनाने के लिए.
खाना खाते ही निनाद की पलकें झपकने लगीं और वह सो गया. ऋजुता नीना का होमवर्क पूछने लगी.
“अभी तो स्कूल से आई हूं मां, थोड़ी देर तो चैन लेने दो. होमवर्क शाम को करूंगी.” नीना टीवी के सामने बैठ गई.
“शाम को तुम लोगों का खेलने का समय हो जाता है और रात में होमवर्क करने बैठते हो तो मैं खाना कब बनाऊं. दिखाओ मुझे क्या मिला है आज.” ऋजुता उसका बैग ले आई.
बहुत बेमन से नीना एक-एक सब्जेक्ट की कॉपी निकालने लगी. डेढ़ घंटे में उसका होमवर्क पूरा हुआ. वह वहीं सोफे पर सो गई. ऋजुता ने निनाद को उठाया और उसका होमवर्क कराने बैठी. पांच बजे तक बड़ी मुश्किल से उसे पढ़ाकर वह उठी और अपने लिए एक कप चाय और बच्चों के लिए दूध गर्म कर लाई. दूध पीकर दोनों नीचे ग्राउंड में खेलने चले गए.
ऋजुता बालकनी में सूखे कपड़े लेने चली आई. सामने वाली बालकनी में वह अब भी निश्‍चिंत सी बैठी थी. हाथ में चाय का कप, एक मोटी सी किताब हाथ में, आरामदायक कुर्सी पर बैठी हुई. एक गहरी सांस लेकर उसने कपड़े तार से उतारे और अंदर आ गई. हॉल के टेबल पर फैली दोनों की किताब-कॉपियां उठाकर उनकी बैग में डाली, कपड़े तहकर जगह पर रखे और जल्दी से किचन में चली आई.
अब रात के खाने की तैयारी के साथ ही सुबह बच्चों के टिफिन के बारे में भी सोचकर रखना पड़ता है उसे. बच्चों को तो तीनों समय की वैरायटी चाहिए खाने में. खाने की तैयारी के साथ ही बालकनी में जाकर वह नीचे झांककर बच्चों को भी देख आती है. साढ़े छह बजे बच्चों को लेने नीचे जाती है, तो दस-पंद्रह मिनट खुली हवा में वॉक कर लेती है. यही थोड़ा सा वक़्त उसे ख़ुद के लिए मिल पाता है. वो सामने की बालकनी वाली भी वॉक करती है उस समय. पास से गुज़रते हुए एक प्यारी सी स्माइल उसके चेहरे पर आ जाती है. उसे देख ऋजुता को ख़ुद की हालत पर शर्म आ जाती है. बिन कंघी किए क्लचर या रबरबैंड में बंधे बाल, अस्त व्यस्त कपड़े, जबकि उसके कपड़े हमेशा कड़क प्रेस किए हुए होते हैं. पास से गुज़रते ही परफ्यूम की ताज़गी भरी महक नथुनों में भर जाती है. ऋजुता को तो याद ही नहीं उसने कभी परफ्यूम लगाया होगा. कहीं बाहर जाते हुए भी दोनों बच्चों को तैयार करने और विशाल के आगे-पीछे दौड़ने में ही जाने का समय हो जाता है.
साढ़े छह बजे वह दोनों को लेकर ऊपर आती है, हाथ-मुंह धुलवाती है तब तक सात बजे विशाल ऑफिस से आ जाता है और वह विशाल की फ़रमाइश, रात के खाने, बच्चों के यूनिफॉर्म प्रेस करने, उन्हें खिलाने, सुलाने, सुबह के टिफिन की तैयारी करने में साढ़े दस-ग्यारह बजे तक चकरघिन्नी बनी रहती है.
सुबह साढ़े पांच बजे से वही भागदौड़ शुरू हो जाती है उसकी. नीना पांचवीं कक्षा में है. उसकी सीनियर बस ठीक पौने सात बजे स्टॉप पर आ जाती है. उसे तैयार कर वह स्टॉप पर छोड़ने जाते हुए निनाद को उठाकर जाती है. वापस आकर निनाद को तैयार करने में जुट जाती है और इस बीच विशाल का चाय-पानी. कितनी बार वह मिन्नत करती है कि कम से कम निनाद को वह बस में बिठा आया करे, तो उसके सुबह के बीस मिनट बच जाएंगे, लेकिन विशाल का एक ही उत्तर होता है, “दिनभर ऑफिस में थक जाता हूं! एक कप चाय तो चैन से पी लेने दिया करो. तुम तो सारा दिन घर पर ही रहती हो. दिन में सो लिया करो, काम ही क्या होता है दिनभर.”

ऋजुता मन मारकर रह जाती है. नहीं समझ पाएगा विशाल कभी भी कि उसे दिनभर क्या काम होते हैं. तीन साल बाद निनाद भी सीनियर बस से जाने लगेगा तब उसका एक चक्कर का समय तो कम से कम बचेगा. लेकिन अभी तो तीन साल और हैं.
घर आकर वह नाश्ता और खाना बनाने में लग गई. एक कप चाय काम करते हुए ही गटक लिया. साढ़े दस बजे विशाल नाश्ता करके, टिफिन लेकर चला गया. तब बाई से झाड़ू-पोंछा, बर्तन करवाकर वह नहाकर आई और धुले कपड़े बालकनी में तार पर फैलाने लगी.
वह पौधों को पानी दे रही थी. शायद गाने भी सुन रही थी. हल्की सी आवाज़ आ रही थी गानों की. ये बालकनी शायद उसका निजी स्पेस है. मुठ्ठी भर खुला आकाश, आंख भर हरियाली, चाय का कप और संगीत के साथ मनपसंद किताबें. ऋजुता को भी रेडियो पर गाने सुनने का कितना शौक था. पौधों का भी. पता नहीं जीवन में कब उसे उसका स्पेस मिल पाएगा.
दो-तीन दिन बाद ऋजुता बच्चों को लेने नीचे गई, तो उन्होंने कहा कि थोड़ी देर और खेलने दो. ऋजुता मान गई, क्योंकि दूसरे दिन छुट्टी थी, तो टिफिन और साढ़े पांच बजे उठने की चिंता नहीं थी. थोड़ी देर वॉक करके वह बेंच पर बैठ कर बच्चों का खेल देखने लगी. इसी बीच सामने की बालकनी वाली भी आकर उसी बेंच पर बैठ गई.
“बच्चों को बड़ा करने वाले ये साल मां की तपस्या और परीक्षा दोनों के साल होते हैं. फुल टाइम ड्यूटी होती है मां की.” वो बड़ी आत्मीयता से बोली.
“हमने एक दूसरे को देखा तो बहुत बार है, लेकिन पहचान नहीं हुई कभी. मेरा नाम अलका है.”
“मेरा नाम ऋजुता है. सच कहा आपने. फुल टाइम ड्यूटी है बच्चों को बड़ा करना.” ऋजुता मुस्कुराकर बोली.

 

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“मुझे तो सास-ससुर जी का बहुत साथ रहा. संयुक्त परिवार था, तो दोनों बच्चे कब बड़े हो गए पता ही नहीं चला. बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना होता था बस. उनकी पसंद के टिफिन बनाना हमेशा सासू मां का काम था और स्टॉप पर छोड़ना, लाना और दोपहर में होमवर्क करवाना ससुर जी का. मम्मीजी को कुकिंग का बहुत शौक था, तो किचन वो ही संभालती थीं. बच्चों के लिए तरह-तरह की डिशेस बनाती रहती थीं.” अलका बीते दिनों को याद करते हुए अपनी रौ में बोलती गई.
‘काश’ ऋजुता ने सोचा, उसे भी ऐसे सास-ससुर मिले होते. लेकिन दोनों ही इस दुनिया में नहीं हैं.
“मगर मैं देखती हूं कि बच्चों के लिए सारी भागदौड़ तुम अकेली ही करती हो. तुम्हारे तो सास-ससुर भी नहीं हैं न?” अलका ने अब उससे पूछा.
“नहीं न, कोई नहीं है. सारा दिन इन्हीं के पीछे निकल जाता है. बस ये पंद्रह मिनट ही होते हैं जब खुली हवा में थोड़ा घूम लेती हूं. कल तो छुट्टी है, तो दिनभर फ़रमाइशी किचन ही चलता रहेगा.” ऋजुता गहरी सांस लेकर बोली.
“समझ सकती हूं एक स्त्री और मां होने के नाते तुम्हारी व्यस्तता.” अलका सहानुभूति भरे स्वर में बोली.
“मेरे तो सास-ससुर की मृत्यु हो गई और दोनों बच्चे विदेश चले गए. पति बिज़नेस और अपने सोशल सर्कल में व्यस्त रहते हैं. घर एकदम खाली हो गया. तभी दिनभर बालकनी में बैठी रहती हूं. आते-जाते लोगों को देखते हुए मन का अकेलापन थोड़ा दूर हो जाता है.”
“आपको मैगज़ीन्स और किताबें पढ़ने का शौक है न, मुझे भी पढ़ना बहुत अच्छा लगता है.” ऋजुता अचानक बोल उठी.
“अरे वाह, मेरे पास नई-पुरानी बहुत सी मैगज़ीन्स और किताबें हैं. तुम आओ न कभी. ले जाना पढ़ने के लिए जो पसंद हो.” अलका उत्साह से बोली.
“धन्यवाद, लेकिन मुझे तो मिनट भर का समय भी नहीं मिलता. मैगज़ीन्स लेकर भी क्या करूं.” ऋजुता अफ़सोस से बोली.
“जीवन की गति भी कितनी अजीब होती है न, जब व्यस्तता होती है तो इतनी अधिक होती है कि हम ़फुर्सत के एक पल के लिए तरस जाते हैं और जब ़फुर्सत मिलती है, तो इतना अकेला कर देती है इंसान को कि समय काटे नहीं कटता. हम दोनों इस गति के दो विपरीत छोर पर हैं. तुम अति व्यस्त, मैं अकेलेपन की सरहद पर. एक वो दिन थे जब घर में दिनभर हंसी के ठहाके, गप्पे चलती रहती थीं और एक ये दिन हैं जब मैं घर की ख़ामोश दीवारों के बीच किसी की आवाज़ सुनने को तरस जाती हूं.” अलका एक गहरी सांस लेकर बोली.
“और एक मैं हूं, जो शांति के कुछ पलों के लिए, सुकून से एक कप चाय पीने के लिए, किसी मैगज़ीन के पन्ने पलटने तक के लिए तरस जाती हूं. पौधे मुझे बहुत पसंद हैं, लेकिन समय की कमी के कारण लगा ही नहीं पाती. ज़माना गुज़र गया किसी पौधे की पत्तियों को सहलाए हुए.” ऋजुता के स्वर में उदासी घुल गई थी.

“एक तरीक़ा है, जिससे तुम्हें कुछ समय की ़फुर्सत मिल जाएगी और मुझे साथ.” अलका ने कहा.
“वो क्या?” ऋजुता ने उत्साह से पूछा.
“तुम चार बजे से छह बजे तक बच्चों को मेरे पास छोड़ दिया करो. मैं उन्हें पढ़ा दिया करूंगी. इससे मेरा समय भी अच्छा कट जाएगा और तुम उन दो घंटों में रिलेक्स कर पाओगी. और मैं कोई फीस नहीं लूंगी, बच्चों की खिलखिलाहट और साथ ही मेरी फीस होगी.” अलका चहककर बोली.
“लेकिन बच्चे तैयार होंगे क्या?” ऋजुता शंकित थी.
“तुम बस कल बच्चों को लेकर मेरे घर आ जाना. बाकी मुझ पर छोड़ दो.” अलका बोली.
दूसरे दिन ऋजुता बड़ी मुश्किल से बच्चों को मना कर अलका के यहां ले गई. अलका ने बड़े प्रेम से उनका स्वागत किया. उसने बच्चों के लिए मनपसंद ब्राउनी और चॉकलेट केक बनाकर रखा था. जल्दी ही बच्चे उससे घुलमिल गए. दो-तीन दिन ऋजुता बच्चों के साथ गई. फिर बच्चे ख़ुद ही अलका के यहां जाने लग गए. जल्दी ही उन्हें वहां अच्छा लगने लगा. अलका पढ़ाती भी अच्छा थी और बच्चों को रोज़ उनकी पसंद का कुछ खिलाती भी.
छह महीने बीत गए थे. निनाद और नीना के साथ ही चार और बच्चे भी अलका के यहां पढ़ने जाने लगे. दोपहर के दो-ढाई घंटे उसके उनकी खिलखिलाहट और पढ़ाई में कब निकल जाते पता ही नहीं चलता.

 

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ऋजुता की बालकनी ढेर सारे हरे भरे पौधों से भर गई थी. अब वह गुनगुनाते हुए पौधों को पानी देती, मैगज़ीन के पन्ने पलटते हुए चाय का आनंद लेती. उसका पुराना रेडियो भी वापस गाने लगा था. अब आमने सामने की दोनों बालकनियां ख़ुश थीं.

 

 

 

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