
पूर्ति खरे
अब्बू को यूं बोलता सुनकर चारों बेटियों की आंखें भर आईं. वे आगे बोले, “लेकिन एक बात मैं कभी नहीं भूलता…” उन्होंने बेटियों की ओर देखा. “जब मैं गिरने लगा था… तब इन चारों ने मुझे पकड़ लिया था.” हॉल में सन्नाटा था. लोग कहते हैं बेटियां पराई होती हैं. उनकी आवाज़ भर्रा गई. अगर ये पराई हैं… तो अपना कौन होता है? अब किसी की आंख सूखी नहीं थी.
छियासी वर्षीय सुहेल अहमद ने अपने जन्मदिन के केक पर लगी मोमबत्तियों को बुझाने से पहले एक बार फिर कमरे में बैठे लोगों को देखा. उनकी चारों बेटियां सामने खड़ी थीं. सना, हिना, राबिया और नजमा. रिश्तेदारों और परिचितों से भरा हॉल तालियों से गूंज रहा था, लेकिन सुहेल जी की आंखें केवल अपनी बेटियों को देख रही थीं. “अब्बू, मोमबत्तियां बुझाइए…”
सबसे छोटी बेटी नजमा ने मुस्कुराकर कहा. सुहेल साहब कुछ क्षण उसे देखते रहे. फिर अचानक पूछ बैठे, “तुम… मेरी बेटी हो न?”
एक पल को पूरा हॉल ख़ामोश हो गया. नजमा की आंखों में नमी उतर आई, लेकिन वह मुस्कुराई.
“हां अब्बू… आपकी ही बेटी हूं.” सुहेल जी ने उसका हाथ पकड़ लिया.
“अच्छा है… तुम लोग आती रहती हो… नहीं तो मैं रास्ता भूल जाता हूं.”
उनकी बात सुनकर कई लोग भावुक हो उठे. सुहेल जी की कहानी अब ज़िंदगी के उस मोड़ पर थी जहां आते-आते कई लोग रास्ता भूल जाते हैं, पर यह कहानी आज से नहीं, बल्कि जन्मदिन से छह साल पहले शुरू हुई थी.
80 वर्ष की उम्र में जब उनकी पत्नी समीना का निधन हुआ, तो सुहेल साहब का संसार जैसे एक झटके में खाली हो गया. उन दोनों का 55 वर्षों का साथ था. सुबह की चाय से लेकर रात की दवा तक, हर आदत में समीना शामिल थीं. उनके जाने के बाद घर तो वही रहा, मगर घर से घरपन चला गया.
शुरू-शुरू में बेटियां रोज़ फोन करतीं, मिलने आतीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि अब्बू बदल रहे हैं. वे गैस जलाकर भूल जाते. दवा खाकर दोबारा दवा खा लेते. कभी किसी बेटी को उसकी दिवंगत मां के नाम से पुकारते, तो कभी घंटों दरवाज़े के सामने खड़े होकर कहते, “समीना अभी बाज़ार से लौटेगी.”
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उनकी ऐसी हालत देखकर डॉक्टर ने जांच के बाद कहा, “यह स्मृतिभ्रंश की शुरुआत है. दवाएं हैं, लेकिन इनसे अधिक इन्हें अपनों की ज़रूरत है. इन्हें अकेला मत छोड़िए.”
चारों बेटियां एक-दूसरे को देखती रह गईं. कहना आसान था. करना नहीं. उन चारों के साथ कई ज़िम्मेदारियां थीं. किसी की बेटी बोर्ड परीक्षा में थी. किसी का पति नौकरी के कारण दूसरे शहर में रहता था. किसी की सास बीमार थी. किसी का अपना व्यवसाय था. फिर भी उस दिन चारों ने एक निर्णय लिया.
“जैसे अब्बू ने हमें मिलकर बड़ा किया था, वैसे ही अब हम मिलकर उनका बुढ़ापा संभालेंगे.” उसके बाद उनके जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ. उन्होंने एक समय-सारणी बनाई. हर बेटी कुछ सप्ताह पिता के साथ बिताती. कोई उन्हें डॉक्टर के पास ले जाती. कोई उनकी पसंद का खाना बनाती. कोई पुरानी तस्वीरों के एल्बम निकालकर बैठ जाती. कोई घंटों उनकी वही कहानी सुनती, जो वे दिन में पांच बार दोहराते थे. कई बार थकान होती. कई बार झुंझलाहट भी. लेकिन प्रेम हमेशा जीत जाता.
एक दिन सुहेल साहब पुराने ट्रंक में रखी डायरी पलट रहे थे. अचानक बोले, “मैंने सोचा था कि रिटायरमेंट के बाद पूरा भारत घूमूंगा… लेकिन समय ही नहीं मिला.”
यह सुनकर चारों बेटियां चुप हो गईं. उनकी आंखों में एक ही विचार कौंधा. अब्बू की यह इच्छा अधूरी नहीं रहेगी. और फिर शुरू हुई यात्राएं. वाराणसी के घाट. जयपुर के किले. ऊटी की पहाड़ियां, केरल की बैकवॉटर्स. कच्छ का रण. अमृतसर का स्वर्ण मंदिर. दिल्ली की कुतुबमीनार, कश्मीर की वादियां, कन्याकुमारी का समुद्र. हर यात्रा में बेटियां बारी-बारी से उनके साथ होतीं.

कभी सुहेल जी किसी जगह पहुंचकर कहते, “मैं यहां पहले भी आया हूं.” हालांकि वे कभी नहीं आए थे. कभी वे अपनी बेगम को खोजने लगते. कभी भूल जाते कि उनके सामने खड़ी महिला उनकी बेटी है. लेकिन कुछ पल ऐसे भी आते जब स्मृतियों का कोहरा हट जाता. वे बेटियों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहते, “तुम लोगों ने मेरी दुनिया बचा ली.” बस ऐसे ही कुछ वाक्य बेटियों की महीनों की थकान भुला देते.
समाज मगर कहां बदलता है? रिश्तेदार अक्सर तंज कसते.
“बेटियों पर इतना बोझ क्यों डाल रखा है?”
“कोई बेटा होता, तो सहारा बनता.”
“बेटियों के अपने परिवार हैं.”
लोगों की बातें सुनकर, चारों बेटियां मुस्कुराकर रह जातीं. उन्हें किसी को जवाब देने की आवश्यकता नहीं लगती थी. उनका जवाब उनके कर्म थे. इसीलिए आज वही लोग सुहेल जी के 86वें जन्मदिन पर उपस्थित थे.
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केक कट चुका था. दावत शुरू होने वाली थी. तभी सुहेल जी खड़े हो गए. नजमा ने उन्हें सहारा दिया. उन्होंने कांपते हाथों से माइक थामा. सब हैरान थे. क्योंकि कई बार उन्हें अपना नाम तक याद नहीं रहता था. उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “मुझे बहुत कुछ याद नहीं रहता.”
उनकी आवाज़ सुनकर हॉल शांत हो गया.
“कई बार मैं अपना घर भूल जाता हूं… अपनी उम्र भूल जाता हूं… कभी-कभी तो अपनी बेटियों के नाम भी भूल जाता हूं…”
अब्बू को यूं बोलता सुनकर चारों बेटियों की आंखें भर आईं.
वे आगे बोले, “लेकिन एक बात मैं कभी नहीं भूलता…” उन्होंने बेटियों की ओर देखा.
“जब मैं गिरने लगा था… तब इन चारों ने मुझे पकड़ लिया था.”
हॉल में सन्नाटा था.
“लोग कहते हैं बेटियां पराई होती हैं.” उनकी आवाज़ भर्रा गई.
“अगर ये पराई हैं… तो अपना कौन होता है?” अब किसी की आंख सूखी नहीं थी.
उन्होंने कांपते हाथों से चारों बेटियों को अपने पास बुलाया. चारों उनके गले लग गईं. सुहेल साहब मुस्कुराए.
“मैं अमीर नहीं हूं… मेरे पास कोई बड़ी जायदाद नहीं… लेकिन अल्लाह ने मुझे चार बेटियां दीं.” फिर थोड़ी देर रुककर बोले, “और मैं यक़ीन से कह सकता हूं कि मेरा बुढ़ापा दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत बुढ़ापा है.” उनके अल्फ़ाज़ के जादू से तालियां देर तक बजती रहीं. लेकिन उस दिन कुछ लोगों के भीतर और भी बहुत कुछ टूट रहा था- बेटियों को पराया समझने का अहंकार, बेटे-बेटी में भेद करने की सोच और रिश्तों को केवल ज़िम्मेदारियों के तराज़ू में तौलने की आदत.
उस रात जब सभी मेहमान चले गए, सुहेल जी बरामदे में बैठे आसमान देख रहे थे. नजमा उनके पास आकर बैठ गई. उन्होंने उसका हाथ पकड़ लिया. “बेटा… तुम्हारा नाम क्या है?” नजमा की आंखें भर आईं, “नजमा.”
सुहेल साहब मुस्कुराए.
“अच्छा नाम है…” फिर कुछ क्षण बाद बोले, “तुम मेरी बेटी हो न?”
नजमा ने उनका सिर अपने कंधे पर टिका लिया. “हां अब्बू, आपकी बेटी हूं.”
सुहेल जी ने आंखें मूंद लीं. शायद उन्हें उसका नाम याद नहीं था. लेकिन उसके हाथों की ऊष्मा वे पहचानते थे. और कभी-कभी प्रेम, स्मृतियों से भी अधिक स्थायी होता है.

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