“इतना बड़ा फ़ैसला मुझसे पूछे बिना?” रिंकी कांप गई. रिंकी कुछ बुदबुदाती तो कहते, “मेरा पैसा था. मैंने कमाया मैंने गंवाया तुम्हें क्या?” गुप्ता जी ने बात ख़त्म कर दी.
“इस बार भी प्रमोशन नहीं मिला!”
गुप्ता जी ने घर में कदम रखते ही बैग सोफे पर पटका और रिंकी पर बरस पड़े.
“घर में कभी शांति रहती है? सब अस्त-व्यस्त रहता है. आदमी बाहर का तनाव झेले या घर का?”
रिंकी ने एक पल उनकी ओर देखा. सुबह पांच बजे से स्कूल, बच्चों की पढ़ाई, घर का ख़र्च, राशन, बिजली के बिल- सब कुछ तो वह अपने वेतन से संभालती थी. फिर भी हर असफलता की दोषी वही ठहराई जाती.
पहले वह जवाब देती थी, तर्क करती थी, रोती भी थी. लेकिन बच्चों के बड़े होते-होते उसने चुप रहना सीख लिया था.
सेवानिवृत्ति के बाद एक दिन उसे पता चला कि गुप्ता जी ने अपनी सारी जमा-पूंजी किसी ज़मीन में लगा दी है.
“इतना बड़ा फ़ैसला मुझसे पूछे बिना?” रिंकी कांप गई.
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रिंकी कुछ बुदबुदाती तो कहते, “मेरा पैसा था. मैंने कमाया मैंने गंवाया तुम्हें क्या?” गुप्ता जी ने बात ख़त्म कर दी.
वर्षों बीत गए. न ज़मीन बिकी, न उसका कोई लाभ मिला. पैसा जैसे मिट्टी में दफ़न हो गया.
एक शाम गुप्ता जी चिंतित बैठे थे. दवाइयों का ख़र्च बढ़ गया था. बैंक खाते लगभग खाली थे.
रिंकी चुपचाप आलमारी से फाइल निकाल लाई. उसमें सावधि जमा, बचत योजनाओं और निवेश के काग़ज़ थे.
“ये सब क्या है?” गुप्ता जी ने आश्चर्य से पूछा.
“घर चलाते-चलाते जो बचा सकी, उसे संभालती रही.”
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गुप्ता जी की आंखें फैल गईं- पश्चाताप, अहंकार सब घुल गया था उनमें.
रिंकी मुस्कराई. वर्षों की पीड़ा उस मुस्कान में थी, “मेरा पैसा था. मैंने कमाया, मैंने बचाया. आपको क्या?”
नील मणि
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