Close

कहानी- भइया का मुखौटा (Short Story- Bhaiya Ka Mukhota)

“… इस घर में बहुत पैसा नहीं था, लेकिन महेश की ज़िंदादिली और कहकहों की आवाज़ से इस घर का कोना-कोना चहकता था. फिर वो चाहें बहनों की शादी का कर्ज़ा हो, चाहें मां-बाबूजी के जाने का दर्द.. सब कुछ अपने सीने में जब्त कर लिया था उन्होंने. उन्हें उदास चेहरे पसंद नहीं थे…”

 

“जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ, बहुत काम हैं अभी. अरे सुरेश, तुमसे फूल माला लाने को कहा था! ले आए?”

“बस भाभी अभी लाया.”

“ठीक है तुम लेकर आओ, तब तक मैं लड्डू बना लेती हूं.”

“भाभीजी, केक आ गया.”

“ठीक है सुवर्णा, मेज़ पर रख दो और तुम भी तैयार हो जाओ.”

सुवर्णा कुछ महीने पहले ही सुरेश की बीवी बन कर इस घर में आई थी.

आज से पांच साल पहले सुरेश के बड़े भाई महेशकी एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. आज उनके जन्मदिन पर अपनी जेठानी के फैलाए हुए इस ताम-झाम को देखकर सुवर्णा परेशान थी.

यह भी पढ़ें: कैसे मैनेज करें रिश्तों में छोटी छोटी शिकायतें? (How to manage small Complains in the relationship)

 

तभी बहुत ख़ूबसूरत‌ सी फूल माला लेकर आते सुरेश से उसने कहा, “मरे हुए इंसान का जन्मदिन कोई इस तरह मनाता है भला.”

“तुम चुप रहो सुवर्णा, भाभी ने सुन लिया तो बहुत दुख होगा उन्हें.”

“दुख! किस बात का दुख सुरेश, सुबह से गुनगुना रही हैं तुम्हारी भाभी. दुख में कोई इस तरह का आयोजन करता है!”

“सुवर्णा!” भाभी की आवाज़ सुनकर दोनों चौंक गए.

“सुरेश, जाओ बाहर मेहमान आ गए हैं. मैं अभी सुवर्णा के साथ आती हूं.”

कहीं भाभी ने सब सुन तो नहीं लिया. सुवर्णा इस‌ उधेड़बुन में फंसी थी कि भाभी बोलीं, “सुवर्णा अठ्ठारह साल की थी मैं जब इस घर में बहू बन कर आई थी और महेश बाइस साल के. ज़िंदगी के पन्द्रह साल हमने साथ गुज़ारे. मेरी शादी में सुरेश बस सात साल का था.

इस घर में बहुत पैसा नहीं था, लेकिन महेश की ज़िंदादिली और कहकहों की आवाज़ से इस घर का कोना-कोना चहकता था. फिर वो चाहें बहनों की शादी का कर्ज़ा हो, चाहें मां-बाबूजी के जाने का दर्द. सब कुछ अपने सीने में जब्त कर लिया था उन्होंने. उन्हें उदास चेहरे पसंद नहीं थे.

उनके जाने के बाद जीवन की परिभाषा ही ख़त्म हो गई थी मेरे लिए. कोई त्योहार, कोई ख़ुशी किसी भी चीज़ का कोई मतलब नहीं रह गया था. दो साल तक एक एक पल सिर्फ़ अपनी मौत की दुआ मांगती थी. फिर एक दिन सपने में महेश को रोता देखा. मैंने उनसे पूछा क्यों रो रहे हैं? तो वो बोले, क्योंकि तुम हंसना भूल गई हो! क्या बना दिया तुमने मेरे घर को!..

यह भी पढ़ें: क्या आपका अतीत आपको आगे नहीं बढ़ने दे रहा है? बीते कल के इमोशनल बैगेज से ऐसे छुटकारा पाएं (Is Your Emotional Baggage Holding You Back? 10 Hacks To Get Rid Of Emotional Baggage)

बस उसी के बाद से मैंने महेश का मुखौटा अपने चेहरे पर पर लगा लिया. अब तुम बताओ, कुछ ग़लत कर रही हूं मैं!”

सुवर्णा को लगा जैसे भाभी के चेहरे में भइया मुस्कुरा रहे हों और भाभी की आंखों की उदासी ख़ुद उसकी आंखों से बरस रही थी.

पल्लवी विनोद

पल्लवी विनोद

अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES

Photo Courtesy: Freepik

Share this article