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एब्यूज़िव लैंग्वेज का यूज़, युवाओं को क्यों लगता है कूल? (Why do young people think using abusive language is cool?)

आज का युवा हमारे कल का भविष्य है. ज़ाहिर है हम चाहेंगे हमारा और हमारे देश का भविष्य उज्जवल हो और सुरक्षित हाथों में हो. हमारे देश के यंगस्टर्स काफ़ी होनहार भी हैं, लेकिन कुछ नौजवान ऐसे भी हैं जो भटक रहे हैं और ग़लत चीज़ें सीख रहे हैं, उनमें से एक है एब्यूज़िव लैंग्वेज यानी गाली-गलौज का नॉर्मलाइज़ेशन.

 

आज के कई युवा इस तरह से एब्यूज़िव लैंग्वेज का इस्तेमाल करते हैं जैसे यह कोई सामान्य सी बात हो. आख़िर उनकी इस सोच के पीछे क्या वजह है, आज यही जानने का प्रयास करेंगे.

* पीयर प्रेशर एक बड़ी वजह है. अगर कॉलेज में ग्रुप का हिस्सा बनना है, तो उनकी तरह ही बोलना होगा, उनकी ही तरह बर्ताव करना होगा, वरना बच्चे ख़ुद को अलग-थलग महसूस करेंगे, इसलिए यंगस्टर्स ऐसी चीज़ों को जल्दी अडॉप्ट कर लेते हैं.
* सोशल मीडिया एक बहुत बड़ी वजह है, क्योंकि यहां पैरेंट्स को भी नहीं पता होता कि बच्चे क्या देख रहे हैं और क्या सीख रहे हैं. सोशल मीडिया युवाओं के लिए एक फैंसी दुनिया है, जहां वो ख़ुद को फ्री फील करते हैं. उनको लगता है यहां कोई पाबंदी नहीं है, रोक-टोक नहीं है और यहां सब हमारे ही जैसे हैं जो हमें अपने पैरेंट्स से बेहतर समझते हैं.
* ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने एब्यूज़िव लैंग्वेज को जिस तरह से नॉर्मलाइज़ किया है उतना किसी और ने नहीं किया. वेब सीरीज़ और रियलिटी शोज़ में जिस तरह से गाली-गलौज का इस्तेमाल होता है, उससे ज़्यादा कहीं और नहीं होता. इनमें पॉज़िटिव कैरेक्टर्स यानी हीरो भी धड़ल्ले से गाली का इस्तेमाल करता नज़र आता है, जिससे यंगस्टर्स उससे ख़ुद को कनेक्ट करने लगते हैं.

 

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* बोल्ड और स्ट्रॉन्ग दिखने की ख़्वाहिश में भी युवा ऐसा करते हैं. ये उम्र ऐसी ही होती है जहां बच्चे ख़ुद को बच्चे नहीं बड़े दिखाना चाहते हैं और उनको लगता है गाली-गलौज वाली भाषा का इस्तेमाल करने से वो बोल्ड और स्ट्रॉन्ग नज़र आएंगे.
* स्टैंड अप कॉमेडियन और पॉप्युलर यूट्यूबर्स आजकल जिस तरीके से खुलेआम बड़े आराम से गालियों का इस्तेमाल करते हैं, उससे यंगस्टर्स काफ़ी प्रभावित होते हैं और उनको ये लगता है कि हमारी जनरेशन का कल्चर यही है जो हमें मॉडर्न, कूल और ओपन माइंडेड दिखाता है.

 

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* एग्रेशन दिखाने और अपनी बात मनवाने के लिए भी युवा ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि उनको लगता है कि गुस्सा दिखाने का सबसे सटीक तरीका यही है, क्योंकि इसका असर सामनेवाले पर जल्दी होता है.
* अपशब्दों का इस्तेमाल युवाओं को एक पावर और कंट्रोल का एहसास कराता है. उनको लगता है इसी तरह की भाषा से हम सामनेवाले को झुका सकते हैं.
* कूल और मैच्योर दिखने की कोशिश में भी युवा ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं.
* कभी-कभी अपशब्दों का इस्तेमाल परिपक्वता, आज़ादी या सत्ता के ख़िलाफ़ बगावत के तौर पर भी किया जाता है. इसका ताज़ा उदाहरण हाल ही में दिल्ली के जंतर मंतर पर ज़ेन ज़ी द्वारा किया गया आंदोलन है, जिसमें लड़कों को तो छोड़ ही दें, लड़कियों ने भी बेहद अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया था. देश के प्रधानमंत्री और उनकी दिवंगत मां के लिए बेहद शर्मनाक और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया था.
* हालांकि कई युवा गाली-गलौज का इस्तेमाल किसी का अपमान या दिल दुखाने के लिए नहीं करते, बल्कि उनको ये सब ब्रो और यो कल्चर की तरह नॉर्मल लगता है. बुज़ुर्गों को बुड्ढा कहना, मां-बहन की गाली देना, उन्हें इसमें कुछ भी ग़लत नहीं लगता.
* कभी-कभी अपना स्ट्रेस रिलीज़ करने के लिए भी ये लोग एब्यूज़िव लैंग्वेज का सहारा लेते हैं.
* लड़कियों को इम्प्रेस करने के लिए भी अक्सर लड़के ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं. उनको लगता है इससे वो मज़बूत, मैच्योर और कूल लगेंगे.
* युवाओं को यह भाषा ग़लत या अभद्र लगने की बजाय बेबाकी और ईमानदारी का प्रतीक लगती है. उनको लगता है हमारा मन साफ़ है और गाली देना कोई क्राइम तो नहीं है.

 

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कैसे बचाएं बच्चों को इस लैंग्वेज कल्चर से?
* सबसे पहले तो घर का माहौल ऐसा हो कि बच्चे बड़ों को भी गाली देते या ज़ोर से बोलते न देखें, बल्कि अदब से बात करते दिखें.
* इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि अगर बच्चे ने गाली दे भी दी, तो उस पर आपका हार्श रिएक्शन न आए, क्योंकि इससे उन्हें यह मैसेज जाएगा कि इस भाषा में तो बड़ी ताक़त है, उनको यह पावर फुल होने का एहसास कराएगा.
* शांति और प्यार से समझाएं. सबके सामने नहीं अकेले में बताएं.
* उन्हें इस बात का ज़रूर मज़बूती से एहसास कराएं कि आपके घर-परिवार में ऐसी अभद्र भाषा नहीं चलेगी. उनकी सीमाएं तय करें और उन्हें उन सीमाओं को समझना ही होगा, यह संदेश भी ज़रूर दें.
* उनके स्ट्रेस को समझें और वो किस तरह से बिना एब्यूज़िव लैंग्वेज के इसे दूर कर सकते हैं, इसके पॉज़िटिव तरी़के बताएं.
* बड़ों का सम्मान करना सिखाएं, क्योंकि एक दिन वो भी उम्र के इस दौर से गुज़रेंगे, इसलिए जवानी के जोश में होश न खोएं.
* हमारी संस्कृति और कल्चर से उन्हें जोड़ें और बताएं कि अपने कल्चर का मज़ाक़ उड़ाने की बजाय उस पर गर्व करना चाहिए, क्योंकि यही उनको कूल और मैच्योर बनाएगा.
* गाली देकर सड़क छाप दिखने की बजाय सभ्य भाषा में बात करना ज़्यादा प्रभावी होता है.
* उन पर नज़र रखें कि वो क्या देखते हैं और किस तरह के दोस्तों में उठते-बैठते हैं. उनके दोस्तों को घर पर बुलाकर आप भी दोस्ती करें.
* उनको घर में ऐसा माहौल दें कि वो डर या संकोच की बजाय खुलकर अपनी बात रख सकें.
* घर में थोड़ा धार्मिक माहौल रखें और उनको भी अपने धर्म से जोड़ें, परिवार और रिश्तेदारों से भी कनेक्टेड रखें.
* ऐसा न हो कि आप ख़ुद ही रील्स बनाने में लगे हों और बच्चों को भी वही सिखाएं, क्योंकि बच्चे बाहर जाकर जैसी बातें करेंगे, उसको उनकी परवरिश से ही जोड़कर देखा जाएगा.
– गीता शर्मा

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