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कहानी- अपराधबोध (Short Story- Apradhbodh)

“हममें से ज़्यादातर लोग दिवंगतों से नहीं, अपने अपराधबोध से प्रेम करते हैं. मरने के बाद अचानक प्रेम कहां से उमड़ पड़ता है. जीते जी जिनके लिए समय नहीं निकालते, उनके जाने के बाद पूरे विधि-विधान से प्रेम जताते हैं.”

राहुल ने कहा, “सिया, कल पिताजी का श्राद्ध है. पंडित जी आएंगे. खीर, पूरी और उनकी पसंद की सब्ज़ी बना लेना.”

सिया कुछ पल चुप रही.

फिर बोली, “बना दूंगी… लेकिन एक बात पूछूं?”

“क्या?”

“जब पिताजी जीवित थे, तब उनके पास बैठकर किसी दिन, दस मिनट भी बात की थी..?”

राहुल असहज हो उठा.

सिया ने धीमे स्वर में कहा, “हममें से ज़्यादातर लोग दिवंगतों से नहीं, अपने अपराधबोध से प्रेम करते हैं. मरने के बाद अचानक प्रेम कहां से उमड़ पड़ता है. जीते जी जिनके लिए समय नहीं निकालते, उनके जाने के बाद पूरे विधि-विधान से प्रेम जताते हैं.”

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राहुल की आंखें झुक गईं.

अगले दिन श्राद्ध का भोजन बनने के बाद राहुल ने मां के पास बैठकर कहा, “मां, आज से खाना साथ खाएंगे..!”

सिया मुस्कुरा दी.

राहुल को महसूस हुआ-श्राद्ध का सबसे बड़ा तर्पण पिंडदान नहीं, जीवित रिश्तों को समय देना होता है.

नील मणि

नील मणि

कहानी- अपराधबोध

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Photo Courtesy: freepik

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